जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत मध्य-पूर्व में कितना बड़ा टर्निंग पॉइंट?

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ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की अमरीकी एयरस्ट्राइक में मौत हो गई है.

सुलेमानी ईरान के लिए कितने अहम थे इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी मौत की ख़बर के आने के फ़ौरन बाद ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के राष्ट्रीय झंडे की तस्वीर ट्वीट की.

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वहीं ईरान में तीन दिन का शोक घोषित करते हुए देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई ने कहा कि 'इस हमले के अपराधियों से गंभीर बदला' लेने का इंतज़ार है.

ईरान सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा है कि कुछ घंटे के बाद देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियां इस आपराधिक हमले को लेकर बैठक करेंगी.

वहीं ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने इसे 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' क़रार देते हुए अमरीका को इसका ख़ामियाज़ा भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है.

वहीं सुलेमानी की मौत के बाद अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने बयान दिया कि, "जनरल सुलेमानी और उनकी क़ुद्स फ़ोर्स सैकड़ों अमरीकियों और गठबंधन सहयोगियों के सदस्यों की मौत और हज़ारों अन्य लोगों को घायल करने की ज़िम्मेदार है."

इन सब के बीच मध्य-पूर्व में आए इस नए भूचाल के बाद वैश्विक तेल की क़ीमतों में भी चार फ़ीसदी इज़ाफ़ा हो गया.

जनरल क़ासिम सुलेमानी
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जनरल सुलेमानी का परिचय

जनरल सुलेमानी भले ही ईरान के एक बड़े सैन्यकर्मी और उभरते हुए नेता थे, अमरीका ने उन्हें और उनकी क़ुद्स फ़ोर्स को सैकड़ों अमरीकी नागरिकों की मौत का ज़िम्मेदार क़रार देते हुए 'आतंकवादी' घोषित कर रखा था.

सुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है. 1998 से सुलेमानी ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स का नेतृत्व कर रहे हैं.

वे ईरान की एक ख़ास शख़्सियत थे जिनकी क़ुद्स फ़ोर्स सीधे देश के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई को रिपोर्ट करती है. सुलेमानी की पहचान देश के वीर के रूप में थी. ख़मेनेई ने उन्हें 'अमर शहीद' का ख़िताब दिया है.

उनकी एक बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके.

सुलेमानी के नेतृत्व में ईरान की ख़ुफ़िया, आर्थिक और राजनीतिक पटल पर भी क़ुद्स फ़ोर्स का प्रभाव रहा है.

ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत किरमान के एक ग़रीब परिवार से आने वाले सुलेमानी ने 13 साल की आयु से अपने परिवार के भरण पोषण में लग गए. अपने ख़ाली समय में वे वेटलिफ्टिंग करते और ख़ामनेई की बातें सुनते थे.

फॉरेन पॉलिसी पत्रिका के मुताबिक़ सुलेमानी 1979 में ईरान की सेना में शामिल हुए और महज़ छह हफ़्ते की ट्रेनिंग के बाद पश्चिम अज़रबैजान के एक संघर्ष में शामिल हुए थे.

इराक़-ईरान युद्ध के दौरान इराक़ की सीमाओं पर अपने नेतृत्व की वजह से वे राष्ट्रीय हीरो के तौर पर उभरे थे.

सुलेमानी ने इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के मुक़ाबले कुर्द लड़ाकों और शिया मिलिशिया को एकजुट करने का काम किया.

हिज़बुल्लाह और हमास के साथ-साथ सीरिया की बशर अल-असद सरकार को भी सुलेमानी का समर्थन प्राप्त था.

दूसरी तरफ़ सुलेमानी को अमरीका अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक मानता था. अमरीका ने क़ुद्स फ़ोर्स को 25 अक्तूबर 2007 को ही आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था और इस संगठन के साथ किसी भी अमरीकी के लेनदेन किए जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया.

23 अक्तूबर 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी और इसकी क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था.

आयतोल्लाह ख़मेनई, जनरल क़ासिम सुलेमानी, Qasem Soleimani
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सद्दाम हुसैन के साम्राज्य के पतन के बाद 2005 में इराक़ की नई सरकार के गठन के बाद से प्रधानमंत्रियों इब्राहिम अल-जाफ़री और नूरी अल-मलिकी के कार्यकाल के दौरान वहां की राजनीति में सुलेमानी का प्रभाव बढ़ता गया. उसी दौरान वहां की शिया समर्थित बद्र गुट को सरकार का हिस्सा बना दिया गया. बद्र संगठन को इराक़ में ईरान की सबसे पुरानी प्रॉक्सी फ़ोर्स कहा जाता है.

2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ा तो सुलेमानी ने इराक़ के अपने इसी प्रॉक्सी फ़ोर्स को असद सरकार की मदद करने को कहा था जबकि अमरीका बशर अल-असद की सरकार को वहां से उखाड़ फेंकना चाहता था.

ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध और सऊदी अरब, यूएई और इसराइल की तरफ़ से दबाव किसी से छुपा नहीं है. और इतने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपने देश का प्रभाव बढ़ाने या यूं कहें कि बरक़रार रखने में जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका बेहद अहम थी और यही वजह थी कि वो अमरीका, सऊदी अरबऔर इसराइल की तिकड़ी की नज़रों में चढ़ गए थे. अमरीका ने तो उन्हें आतंकवादी भी घोषित कर रखा था.

रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स
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रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स

सुलेमानी का क़ुद्स फ़ोर्स इरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा हैं. 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उस वक़्त के ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह ख़ुमैनी के आदेश से रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का गठन हुआ था. इसका मक़सद देश की इस्लामिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त और नियमित सेना के साथ सत्ता का संतुलन बनाना था.

ईरान में शाह के पतन के बाद ईरान में नई हुकूमत आई तो सरकार को लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निज़ाम और क्रांति के मक़सद की हिफ़ाज़त कर सके.

ईरान के मौलवियों ने एक नए क़ानून का मसौदा तैयार किया जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का ज़िम्मा दिया गया और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को निज़ाम की हिफ़ाज़त का काम दिया गया.

लेकिन ज़मीन पर दोनों सेनाएं एक दूसरे के रास्ते में आती रही हैं. उदाहरण के लिए रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद करती हैं और सेना, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है.

वक्त के साथ-साथ रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई.

क़ुद्स फोर्स
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क़ुद्स फोर्स

ऊपर बताई गई ईरान की इसी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की स्पेशल आर्मी है क़ुद्स फ़ोर्स जो विदेशों में संवेदनशील मिशन को अंजाम देती है.

हिज़बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के क़रीबी सशस्त्र गुटों को हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुद्स फ़ोर्स का ही है.

माना जाता है कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है.

ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है. इसके दम पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में अच्छी सैलेरी पर धार्मिक नौजवानों की नियुक्ति की जाती है.

भले ही रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में सैनिकों की संख्या नियमित सेना के सैनिकों की संख्या के मामले में क़रीब तीन लाख कम है लेकिन इसे ईरान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के रूप में जाना जाता है.

ये भी कहा जाता है कि दुनिया भर में ईरान के दूतावासों में रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के जवान ख़ुफ़िया कामों के लिए तैनात किए जाते हैं.

ये विदेशों में ईरान के समर्थक सशस्त्र गुटों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया कराते हैं.

आयतोल्लाह ख़ामेनई के बेहद क़रीबी थे जनरल क़ासिम सुलेमानी
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लीस डुसेट का नज़रिया

बीबीसी की चीफ़ इंटरनेशनल रिपोर्टर लीस डुसेट के मुताबिक़ क़ासिम सुलेमानी को मध्य-पूर्व में ईरान की महत्वाकांक्षा के मास्टरमाइंड और बात जब युद्ध और शांति की हो तो वास्तविक विदेश मंत्री के रूप में देखा जाता था.

सुलेमानी सीरियाई संघर्ष में राष्ट्रपति बशर अल-असद के सलाहकार के रूप में भी देखे जाते थे. उन्हें इराक़ में चल रहे वर्तमान संघर्ष, इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ कई अन्य मोर्चे पर प्रमुख रणनीतिकार भी माना जाता था.

जहां सुलेमानी की मौत को एक निर्णायक टर्निंग पॉइंट के तौर पर देखा जा रहा है वहीं ईरान और अमरीका और इनके सहयोगियों के बीच इसे एक बड़े संकट के रूप में भी देखा जा रहा है.

इनके रिश्ते में और तल्ख़ी आएगी और जैसा कि ख़ामनेई के बयान से लगता है, बदला भी लिए जाने की प्रबल संभावना है. नई परिस्थितियां पहले से अस्थिर मध्य पूर्व के इस हिस्से में और भी संकट की स्थिति पैदा करेंगी.

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