कोरोना लॉकडाउन: ग़रीबों को कैश ट्रांसफ़र की योजना जारी रहनी चाहिए- मुख्य आर्थिक सलाहकार

भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन
इमेज कैप्शन, भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन
    • Author, जुगल आर. पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कहा है कि ग़रीबों को नक़द आर्थिक मदद की योजना ज़रूर जारी रखी जानी चाहिए. नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से ग़रीबों को कैश ट्रांसफ़र की नीति आगे भी जारी रखने का ये पहला बड़ा संकेत कहा जा सकता है. हालांकि, मुख्य आर्थिक सलाहकार के. सुब्रमण्यन ने कहा कि, नक़द भुगतान जारी रखने को लेकर ये उनकी 'निजी राय' है.

देश के ग़रीबों को नक़द आर्थिक मदद की शुरुआत, भारत में लॉकडाउन लागू होने के बाद हुई थी. कैश ट्रांसफ़र की ये योजना इस महीने के अंत में ख़त्म हो जाएगी.

जब हमने सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन से ये पूछा कि क्या सरकार द्वारा शुरू की गई कैश ट्रांसफ़र योजना को इस महीने के अंत में ख़त्म कर दिया जाना चाहिए. या फिर इस महीने के बाद भी इसे न सिर्फ़ जारी रखा जाना चाहिए. बल्कि, जैसा कि सरकार के कई आलोचकों ने माँग की है कि इसका दायरा और इसकी मात्रा बढ़ा दी जानी चाहिए.

इस सवाल के जवाब में सीईए के. सुब्रमण्यन ने कहा कि, 'हमारे पास जन धन आधार और मोबाइल के रूप में ग़रीबों की मदद का त्रिस्तरीय ढांचा है और इससे देश को लाभ हुआ है. हां, सरकार की ये कैश ट्रांसफ़र योजना इस महीने के अंत में ख़त्म हो रही है. लेकिन, मेरी राय ये है कि हमें इस रास्ते पर आगे चलते रहना चाहिए.'

इसी साल 26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना' के तहत ग़रीबों की मदद के कई उपायों का ऐलान किया था. सरकार के बयान में ख़ास तौर से कैश ट्रांसफ़र के रूप में ग़रीबों को 500 रुपए प्रति माह मदद दिए जाने की घोषणा की गई थी. ये मदद देश की 20.40 करोड़ महिला जन धन खाता धारकों को दी जानी थी.

मदद की ये रक़म तीन महीने तक सीधे उनके खाते में दी जानी थी. इसके अलावा आठ करोड़ ग़रीब परिवारों को अगले तीन महीने तक मुफ़्त गैस सिलेंडर भी दिए जाने का एलान किया गया था.

साथ ही साथ वित्त मंत्री ने देश की तीन करोड़ बुज़ुर्ग विधवाओं और दिव्यांगों को एक हज़ार रुपए प्रति महीने के हिसाब से अगले तीन महीने तक नक़द मदद देने का ऐलान किया गया था. इसी के साथ सरकार ने कम तनख़्वाह वाले नौकरीपेशा लोगों के प्रॉविडेंट फ़ंड के हिस्से का भी अगले तीन महीने तक ख़ुद भुगतान करने की घोषणा की थी.

अभी ये साफ़ नहीं है कि तीन महीने से चली आ रही नक़द भुगतान की इस योजना को लेकर सरकार अपनी आगे की नीति का ऐलान कब करेगी.

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, 'आत्मनिर्भर कोई आख़िरी लक्ष्य नहीं. हम समय और लोगों की माँग के अनुसार बदलाव करते रहेंगे.'

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
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आत्मनिर्भर पैकेज पर सवाल

पिछले महीने के मध्य में सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्म निर्भर स्टिमुलस पैकेज का ऐलान किया था. रेटिंग एजेंसी क्राइसिल ने, इसकी समीक्षा की थी. और ये बताया था कि इस पैकेज के अंतर्गत लोगों की मदद के लिए क़र्ज़ और प्रतिभूति के तौर पर जितनी रक़म का ऐलान किया गया है, वो देश की कुल जीडीपी का पाँच फ़ीसद है. यानी सरकार के आत्मनिर्भर आर्थिक पैकेज का आधा हिस्सा लोन और गारंटी के रूप में मिलेगा.

क्राइसिल (CRISIL) ने सरकार के आर्थिक पैकेज के बारे में कहा था कि, 'ये खोखला है और इसमें ठोस मदद का अभाव है.' साथ ही क्राइसिल ने ये भी कहा था कि, 'इस पैकेज की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक लोगों को क़र्ज़ देने के कितने इच्छुक हैं. क्योंकि बैंक ख़ुद ही एनपीए (NPA) के बोझ तले दबे हुए हैं. ऐसे में वो जोखिम भरे क़र्ज़ बांटने से दूर रहने को ही तरजीह देंगे. और बैंकों द्वारा लोन देने में और भी कमी आएगी.'

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, सरकार के आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन ने बीबीसी से कहा कि, 'इस पैकेज का मुख्य हिस्सा तीन लाख करोड़ रुपये हैं. और सरकार की ओर से क़र्ज़ की जो सौ प्रतिशत गारंटी दी गई है, उसका मक़सद बैंकों को ये भरोसा देना है कि उद्यमियों को क़र्ज़ देने में बैंकों के लिए कोई जोखिम नहीं है. क्योंकि सरकार इसकी गारंटी दे रही है. अगर, कोई उधार लेकर नहीं लौटाएगा, तो इसकी भरपाई सरकार बैंक को करेगी. इसके अलावा कंपनियों को इस साल क़र्ज़ नहीं चुकाना पड़ेगा.

क़र्ज़ लेने के बाद का पहला साल लोन हॉलिडे का होगा. और वो अगले चार सालों में लोन चुका सकेंगे. अगले साल हम 8-8.5 प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल कर लेंगे. क्योंकि हमें इसका विश्वास है. साथ ही अन्य लोगों को भी इसका भरोसा है. ऐसे में मध्यम, सूक्ष्म एवं लघु उद्योग भी क़र्ज़ चुकाने की बेहतर स्थिति में होंगे. इसके अलावा बैंकों के जोखिम से निपटने के अन्य उपायों की भी व्यवस्था की गई है.'

सुब्रमण्यन ने आगे कहा कि, 'इस आर्थिक पैकेज को लागू करने के लिए वित्त मंत्री बैंकों से भी बात कर रही हैं. और हम ज़मीनी स्तर पर बारीकी से इस बात का आकलन कर रहे हैं कि उद्यमियों को कैसा और कितना क़र्ज़ दिया जा रहा है.'

कोरोना लॉकडाउन

पर, जब मुख्य आर्थिक सलाहकार से हमने ये पूछा कि बैंकों के क़र्ज़ बांटने की वित्त मंत्रालय द्वारा सूक्ष्म स्तर पर निगरानी करने की एक सीमा है, तो उन्होंने कहा कि, 'हां, ये बात सही है. लेकिन अब हमारी बैंकों के काम काज पर पहले से बारीक नज़र है. हमने ऐसी व्यवस्था की है कि बैंकों को कम से कम बाधाओं का सामना करना पड़े. सरकार की इस पहल में निजी क्षेत्र के बैंकों के शामिल होने के बेहतर अवसर हैं.'

वेबसाइट 'द वायर' से बात करते हुए रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार के इस आर्थिक पैकेज को लेकर ये कहते हुए अपनी चिंता जताई थी कि ये क़र्ज़ पर बहुत अधिक निर्भर है. राजन ने ये भी कहा था कि आज से एक साल बाद, 'भारत की अर्थव्यवस्था अपने पहले की ताक़त का साया भर रह जाएगी.'

राजन के इस बयान पर सुब्रमण्यन ने कहा कि, 'देखिए, आर्थिक पैकेज को लेकर दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं आएंगी. सकारात्मक भी और नकारात्मक भी. उनकी आलोचना का जवाब देने के अलावा मैं ये भी कहना चाहूंगा कि वित्त मंत्री जी ने इस बारे में पहले ही कहा है कि हम इस आलोचना का जवाब आगे तरक़्क़ी करके देंगे. अभी तो इस वित्तीय वर्ष के महज़ दो महीने गुज़रे हैं. अभी दस महीने तो बाक़ी ही हैं. रघुराम राजन मेरे मेंटॉर रहे हैं और मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं. लेकिन, हमें किसी व्यक्ति के बजाय मुद्दों के बारे में बात करनी चाहिए.'

सरकार का बचाव करते हुए मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन ने ये भी कहा कि, 'हमें ये समझना होगा कि सरकार की भी अपनी सीमाएं हैं. और सरकार ने अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए मनरेगा जैसी योजनाओं को आवंटन बढ़ा कर उसका अधिकतम लाभ लेने का प्रयास किया है. ये प्रवासी मज़दूरों को लगे आर्थिक झटके से उन्हें उबारने की कोशिश का एक हिस्सा है. ये कोई आख़िरी विकल्प नहीं है. हम आगे भी ज़रूरतों और माँगों को सुन कर उसके हिसाब से बदलाव करते रहेंगे.'

जब हमने सीईए सुब्रमण्यन से ये कहा कि ज़्यादातर राज्य सरकारों और नागरिकों ने इस आर्थिक पैकेज को स्वदेशी सामान ख़रीदने और विदेश में बने सामान के बहिष्कार के ऐलान के तौर पर देखा है, तो उन्होंने कहा कि, 'भारतीय और विदेशी, दोनों ही कंपनियों को चाहिए कि वो भारत के घरेलू बाज़ार का लाभ उठाने के लिए काम करें. अपने उत्पादों में सुधार लाएं और फिर निर्यात करें. मैं तो यही सलाह दे रहा हूं. हमारी क्षमताएं तभी बढ़ेंगी, जब हम खुले दिमाग़ से काम करेंगे और मुक़ाबले को बढ़ावा देंगे. लेकिन, यहां एक बारीक विभेद है. क्या आप उन देशों में बना सामान ख़रीदना चाहेंगे, जो आपके दुश्मन हैं या फिर जिनसे आपका संघर्ष चल रहा है? जनता के ऐसे क़दमों का अपना एक अलग सामरिक अर्थ होता है. और इसे समझना बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन, मैं ये कहूंगा कि ऐसे देश भी हैं, जिनके साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं. और उनसे सामान ख़रीदना दोनों ही देशों के लिए फ़ायदे का सौदा है.'

प्रवासी मज़दूर

'प्रवासी कामगारों के पलायन के संकट से मज़दूरी बढ़ेगी'

28 मई को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि लॉकडाउन के बाद से अब तक उसने एक करोड़ प्रवासी कामगारों को वापस उनके घरों तक पहुंचाया था. सरकार ने सर्वोच्च अदालत से ये भी कहा था कि मज़दूरों को उनके घरों तक पहुंचाने की ये प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी.

लेकिन, इस रिवर्स माइग्रेशन का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस सवाल के जवाब में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन ने समझाया कि, 'थोड़े समय के लिए मज़दूरी में इज़ाफ़ा देखने को मिलेगा. क्योंकि मज़दूरों की कमी हो गई है. लेकिन, अब लॉकडाउन खुल रहा है. कंपनियों में फिर से काम शुरू हो रहा है. कामगारों की माँग बढ़ रही है. ऐसे में उत्पादन की लागत तो बढ़ेगी और बढ़ी हुई मज़दूरी से उन लोगों को वापस आने का हौसला मिलेगा, जो अपने घरों को वापस चले गए हैं. लेकिन, ये सब आर्थिक चक्र का एक हिस्सा है. जैसे-जैसे मज़दूर काम पर वापस आएंगे, वैसे-वैसे मज़दूरी स्थिर होगी. तो, प्रवासी मज़दूरों के घर वापस जाने का उतना नकारात्मक असर नहीं होगा, जिस तरह का अंदाज़ा कुछ लोग लगा रहे हैं.'

इन हालात के लिए देश के कामगारों के ज़्यादातर असंगिठत क्षेत्र में काम करने को ज़िम्मेदार ठहराते हुए, सीईए सुब्रमण्यन ने कहा कि, 'हमारे देश की अर्थव्यवस्था में संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी बहुत कम है, जबकि असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है. और ऐसा हमारे देश के श्रम क़ानूनों के कारण है.'

'श्रम क़ानूनों और नियमों से बचने के लिए कंपनियों के मालिक और उद्यमी, असंगठित क्षेत्र में ही रहने को तरजीह देते हैं. आज देश के दस से ग्यारह प्रतिशत कामगार ही संगठित क्षेत्र में हैं. और उन्हें कुछ सुविधाएं हासिल हैं. लेकिन, अन्य कामगारों को ये सुविधाएं नहीं हासिल हैं. और हमें इसका दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है. श्रम क़ानूनों में जो बदलाव किए जा रहे हैं, उससे अर्थव्यवस्था में संगठित क्षेत्र का दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी. हालांकि ये रातों रात नहीं होगा. लेकिन, आपको अगले एक साल में बदलाव नज़र आने लगेगा. एक और दिक़्क़त ये है कि प्रवासी मज़दूर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का लाभ नहीं उठा पाते हैं. और ये एक बड़ी समस्या है. वन नेशन, वन राशन कार्ड की योजना से राशन कार्ड के धारक अपने कार्ड का लाभ दूसरे राज्य में भी ले सकेंगे. और इससे इस समस्या का समाधान हो सकेगा.'

लॉकडाउन के दौरान सरकार ने 20 अप्रैल से ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां शुरू करने की इजाज़त दी थी. अर्थव्यवस्था को दोबारा रफ़्तार देने के लिए उसके बाद से कई और क़दम उठाए जा चुके हैं.

मनरेगा

इनके प्रति लोगों की कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिली है?

इसके जवाब में मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन ने कहा कि, 'अगर आप ज़रूरी सामान जैसे कि राशन, सब्ज़ी और रोज़मर्रा के सामान की आवाजाही और ख़रीदारी की बात करें, तो आज ये उसी स्तर पर हो रही है, जितनी हमने पिछले साल दर्ज की थी. लॉकडाउन के दौरान इन गतिविधियों पर बुरा असर पड़ा था. जिन्हें हम सोच समझकर ख़रीदारी या आर्थिक गतिविधि कहते हैं, उनमें साफ़ तौर पर कमी आई है, और इसकी वजह है आर्थिक अनिश्चितता. कार या घर ख़रीदने जैसे बड़े ख़र्च करने से पहले लोग दस बार सोच रहे हैं. आज लोग चाहते हैं कि उनके हाथ में नक़द पैसे रहें,'

'सुधारों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय की ज़रूरत है'

25 मई को घरेलू विमान सेवा शुरू करने को लेकर जैसी उठापटक देखने को मिली, वो इस बात की एक मिसाल है. इसे लेकर कई राज्यों की सरकारों और केंद्र के बीच ज़ुबानी जंग देखने को मिली थी. और आपसी सहयोग की कमी का असर हवाई उड़ानों पर भी पड़ा था. इससे कई लोगों के मन में ये सवाल उठा था कि क्या अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर केंद्र और राज्यों के बीच किसी तरह का समन्वय संभव भी है या नहीं.

लोगों की इस चिंता के बारे में के. सुब्रमण्यन ने कहा कि, 'हां, हवाई उड़ानों को लेकर जो हुआ, वो चिंता की बात थी. हो सकता है कि अगर हमने इस बात का पूर्वानुमान पहले कर लिया होता, तो शायद हम इस मुद्दे पर संशय को दूर कर पाते और इतने बुरे नतीजे देखने को नहीं मिलते. लेकिन, बड़े मसलों पर राज्य और केंद्र मिल कर काम कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर श्रम क़ानूनों में सुधारों को ही लें, आज केंद्र के साथ 17-18 राज्य मिल कर काम कर रहे हैं. अब ये आपके ऊपर है कि आप गिलास को आधा ख़ाली देखना चाहते हैं, या आधा भरा हुआ. लेकिन, इस मसले पर तो गिलास 99 फ़ीसद तक भरा हुआ है. और आपसी समन्वय से आज जो क़दम उठाए जा रहे हैं, उनके नतीजे आने वाले दिनों में नहीं दशकों तक देखने को मिलेंगे. मैं इसके लिए आत्म निर्भर पैकेज की मिसाल दूंगा. इसके तहत हमने कितने सारे सुधारों का ऐलान किया है. इसमें कृषि, श्रम और ज़मीन वग़ैरह से जुड़े सुधार शामिल हैं. इनमें से ज़्यादातर विषय या तो समवर्ती सूची में हैं. या फिर वो राज्यों की सूची में हैं. और ये सुधार राज्यों को साथ लेकर ही किए जा सकते हैं. साफ़ है कि इन मुद्दों पर आगे बढ़ने से पहले राज्यों के साथ भी चर्चा हुई है.'

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    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

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    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

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    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

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  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है? हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए? मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए? लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा? बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है? लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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