'न्यू स्टार्ट' की वजह से क्या अमेरिका और रूस के बीच शुरू होगी परमाणु हथियारों की होड़

पुतिन और ट्रंप
इमेज कैप्शन, अमेरिका और रूस के बीच हुई 'न्यू स्टार्ट' संधि की मियाद समाप्त हो रही है (फ़ाइल फ़ोटो)
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फ़रवरी 2026 में अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों में कटौती करने संबंधी संधि की मियाद ख़त्म होने जा रही है.

इसे 'न्यू स्टार्ट परमाणु संधि' या न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी के नाम से भी जाना जाता है.

इसके अलावा कई देश अपने परमाणु हथियार भंडारों में वृद्धि कर रहे हैं. जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं वे उन्हें प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं.

तो क्या परमाणु हथियार निशस्त्रीकरण ठप होने जा रहा है?

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सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार की होड़

जर्मनी की पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी में मॉडर्न हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर हर्मन वेंटकर बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी, अमेरिका और यूके परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहे थे.

अमेरिका, यूके और कनाडा की कोशिश थी कि साथ मिलकर जर्मनी से पहले परमाणु हथियार बना लिए जाएं. इस टॉप सीक्रेट या गुप्त रिसर्च को 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' के नाम से जाना जाता है.

उन्होंने बताया कि इन देशों ने अमेरिका के लॉस एलामोस में परमाणु बम बनाने में कामयाबी हासिल कर ली. अमेरिका एकमात्र देश है जिसने युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया है.

हर्मन वेंटकर के मुताबिक़, सोवियत संघ को एक जासूस से मैनहट्टन प्रोजेक्ट के बारे में पता चल गया था और उसने अपना परमाणु बम बनाना शुरू कर दिया, जिसका परीक्षण 1949 में कज़ाख़स्तान में किया गया जो उस समय सोवियत संघ का हिस्सा था.

इसके बाद ही सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार बनाने की होड़ शुरू हो गई.

दोनों ही देशों को अहसास हुआ कि परमाणु युद्ध के ख़तरे को टालना बहुत ज़रूरी है जिसके लिए हथियार नियंत्रण पर चर्चा शुरू हुई. मगर इस पर कार्रवाई होने में कई साल लग गए.

सोवियत संघ और अमेरिका के बीच समझौता

मिखाइल गोर्बाचेव और रोनाल्ड रीगन
इमेज कैप्शन, जानकार बताते हैं कि मिखाइल गोर्बाचेव (बाएं) और रोनाल्ड रीगन (दाएं) परमाणु हथियार मुक्त विश्व के निर्माण की कोशिश करना चाहते थे
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हर्मन वेंटकर ने बताया कि अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों जैसे सामरिक हथियारों के नियंत्रण संबंधी प्रयास शुरू हुए.

1971 में 'साल्ट 1' और 1979 में 'साल्ट 2' वार्ताएं हुईं.

सामरिक हथियार नियंत्रण वार्ता 'स्ट्रैटेजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स' या 'साल्ट 1' में पहली बार दोनों देशों के बीच परमाणु मिसाइलों के उत्पादन की संख्या सीमित रखने पर सहमति हुई.

इसके तहत सभी सामरिक हथियारों को शामिल नहीं किया गया था. मगर 1979 में सोवियत संघ द्वारा अफ़ग़ानिस्तान में घुसने के बाद अमेरिका ने 'साल्ट 2' समझौते का अनुमोदन नहीं किया.

हालांकि दोनों ही देश समझौते की शर्तों का पालन करते रहे.

इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के नेताओं ने 1987 में आईएनएफ़ संधि यानी इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फ़ोर्स ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए.

हर्मन वेंटकर के मुताबिक़, मिखाइल गोर्बाचेव और रोनाल्ड रीगन परमाणु हथियार मुक्त विश्व के निर्माण की कोशिश करना चाहते थे. उन्हीं की सोच की वजह से आईएनएफ़ संधि संभव हो पाई.

यह एक बड़ा क़दम था जिसके तहत दोनों देशों ने 500 से 5500 किलोमीटर तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों को नष्ट करने का फ़ैसला किया. साथ ही समझौते की शर्तों को लागू करने के लिए प्रावधान रखे गए.

मगर नेटो का मानना है कि रूस ने 2008 में मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलें बनाकर इस संधि का उल्लंघन किया. रूस ने इन आरोपों का खंडन करते हुए इसे बेबुनियाद क़रार दिया.

2017 में जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने तो 2019 में अमेरिका ने ख़ुद को इस संधि से बाहर कर लिया.

पिछले साल रूस ने भी आईएनएफ़ संधि की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. ऐसे में परमाणु हथियारों की होड़ और नई उभरती परमाणु शक्तियों पर नियंत्रण के लिए क्या किया जा सकता है?

वीडियो कैप्शन, परमाणु हथियारों का ख़तरा क्या बढ़ने वाला है?- दुनिया जहान

किन देशों के पास परमाणु हथियार

अमेरिका स्थित ग़ैर-सरकारी संस्था बुलेटिन ऑफ़ द एटॉमिक साइंटिस्ट की प्रमुख अलेक्ज़ांड्रा बेल के अनुसार फ़िलहाल नौ देशों के पास लगभग 13 हज़ार परमाणु हथियार हैं, जिसमें रूस के पास चार हज़ार परमाणु हथियार हैं, जबकि अमेरिका के पास 3700 परमाणु हथियार हैं.

इसके अलावा भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, फ़्रांस और यूके के पास भी परमाणु हथियार हैं. इसराइल ने उसके पास परमाणु हथियार होने की न तो पुष्टि की है, और न खंडन किया है.

कुछ अनुमानों के अनुसार इसराइल के पास लगभग 90 परमाणु हथियार हैं.

अलेक्ज़ांड्रा बेल कहती हैं कि 1960 के दशक तक कई नए देश परमाणु क्षमता प्राप्त देशों में यानी न्यूक्लियर क्लब में शामिल हो गए थे.

अलेक्ज़ांड्रा बेल ने कहा कि 1960 तक यूके, फ़्रांस और चीन न्यूक्लियर क्लब में शामिल हो गए थे. इसके बाद विश्व में दर्जनों अन्य देशों द्वारा परमाणु क्षमता हासिल करने की संभावना साफ़ दिखाई देने लगी.

साथ ही यह चिंता भी पैदा हो गई कि परमाणु युद्ध से पूरा विश्व नष्ट हो सकता है. उसी दौरान मिसाइल संकट खड़ा हो गया था मगर नेताओं में सदबुद्धि जागी और वह संकट टल गया.

एनपीटी और परमाणु हथियार में कमी

हथियार
इमेज कैप्शन, जानकारों का कहना है कि वर्तमान में दुनियाभर के नौ देशों के पास परमाणु हथियार हैं (सांकेतिक तस्वीर)

1962 में जब सोवियत संघ ने क्यूबा में अपने परमाणु मिसाइल भेजने का फ़ैसला किया तो अमेरिकी नौसेना ने क्यूबा की घेराबंदी कर दी और दो महाशक्तियां परमाणु युद्ध की कगार पर पहुंच गईं.

यह संकट 13 दिनों तक बना रहा. कूटनीतिक प्रयासों के बाद सोवियत संघ ने अपनी मिसाइलें वापस लाने का फ़ैसला किया और अमेरिका ने कभी भी क्यूबा पर हमला नहीं करने का सार्वजनिक आश्वासन दिया.

1970 में बहुराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी लागू हो गई.

अलेक्ज़ांड्रा बेल ने कहा कि इसके तहत तय हुआ कि उस समय परमाणु हथियार प्राप्त देश यानी चीन, अमेरिका, सोवियत संघ, यूके और फ़्रांस अपने परमाणु हथियारों में कटौती करेंगे.

उन्होंने कहा, "साथ ही जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, वे यह हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे और बदले में उन देशों को परमाणु ऊर्जा बनाने के लिए टेक्नोलॉजी दी जाएगी. इसे एनपीटी की बड़ी सौदेबाज़ी माना जाता है जिसके कुछ अच्छे परिणाम निकले. शीत युद्ध के दौरान 70 हज़ार परमाणु हथियार थे जो अब घटकर लगभग 13 हज़ार हो गए हैं."

लेकिन यह काम बड़ा ही पेचीदा था क्योंकि परमाणु हथियार भंडारों की निगरानी और उनकी संख्या का सटीक अनुमान लगाना आसान नहीं है.

विश्व के 191 देशों ने एनपीटी या परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें इसराइल, भारत और पाकिस्तान शामिल नहीं हैं.

अलेक्ज़ांड्रा बेल का कहना है कि भारत और पाकिस्तान ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से अपने परमाणु कार्यक्रमों को बढ़ाते रहे हैं जो कि एनपीटी की शर्तों के ख़िलाफ़ है.

उत्तर कोरिया भी एनपीटी में शामिल था लेकिन बीस साल पहले वो इससे बाहर हो गया. अब उसके पास इतने परमाणु हथियार हैं कि ख़तरा पैदा हो गया है.

अलेक्ज़ांड्रा बेल का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र ने भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया पर कई प्रकार के नियंत्रण लादे हैं जिसके तहत उन्हें कुछ विशेष प्रकार की टेक्नोलॉजी नहीं दी जा सकती.

वहीं चीन भी एनपीटी या परमाणु अप्रसार संधि की शर्तों को ताक पर रखकर अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है. 1995 में एनपीटी में शामिल देशों में संधि को अनिश्चित काल के लिए जारी रखने पर सहमति बनी थी. उस पर अब क्या रुख़ है?

अलेक्ज़ांड्रा बेल का कहना है कि अब वह सहमति अविश्वास और तोड़े गए वादों के नीचे दब गई है. वहीं उसे लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी अभाव है.

कोई भी संधि पूरी तरह तो सफल नहीं होती लेकिन जो इस संधि का उद्देश्य था उसे प्राप्त करने में यह काफ़ी हद तक सफल हुई है.

अलेक्ज़ांड्रा बेल ने आगे कहा, "साठ के दशक में लग रहा था कि 40-50 देश परमाणु हथियार हासिल कर लेंगे. इस संधि के लागू होने के बाद से केवल चार देशों ने परमाणु हथियार क्षमता हासिल की है. उस लिहाज़ से यह संख्या बहुत मामूली है."

मगर एक और परमाणु हथियार नियंत्रण संधि है जिसका भविष्य अब अनिश्चित है.

अलेक्ज़ांड्रा बेल का बयान

अमेरिका-रूस की 'न्यू स्टार्ट' संधि

हथियार नियंत्रण विशेषज्ञ माइक एल्बर्टसन अमेरिका और रूस के बीच सामरिक हथियार नियंत्रण संबंधी 'न्यू स्टार्ट' वार्ताओं में वार्ताकार रह चुके हैं.

इन वार्ताओं का उद्देश्य उन परमाणु हथियारों में कटौती करना था जिनका इस्तेमाल युद्ध में शत्रु के सैनिक कमान केंद्रों, यातायात, बिजली सप्लाई और दूसरी ढांचागत व्यवस्थाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है.

माइक एल्बर्टसन ने कहा कि 2009 में वार्ताएं शुरू हुईं और 2010 के अंत में समझौते का अनुमोदन कर दिया गया. यह समझौता फ़रवरी 2011 से लागू हो गया.

इसके बाद 'स्टार्ट 2' समझौता लागू हुआ मगर उस पर हस्ताक्षर नहीं हुए. आगे 'न्यू स्टार्ट' समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक़ ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने हस्ताक्षर किए थे. 'न्यू स्टार्ट' समझौते में परमाणु हथियारों की संख्या सीमित करने के प्रावधान थे.

माइक एल्बर्टसन ने बताया कि पहले समझौते के तहत दोनों देशों द्वारा तैनात किए गए परमाणु हथियारों की संख्या 1700 थी जिसे 'न्यू स्टार्ट' के तहत घटाकर 1550 कर दिया गया.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि 'न्यू स्टार्ट' समझौते में इस बात की पुष्टि करने की व्यवस्था थी कि दोनों पक्ष तय की गई संख्या से अधिक परमाणु हथियार तैनात नहीं कर रहे.

दोनों पक्ष साल में दो बार एक-दूसरे को अपने परमाणु हथियारों की संख्या की जानकारी देने पर बाध्य थे. साथ ही हर पक्ष साल में 18 बार दूसरे पक्ष के परमाणु ठिकानों का निरीक्षण कर सकता था.

इस समझौते को लागू करने में समस्याएं आनी शुरू हो गईं और दोनों पक्षों के बीच दरार आने लगी.

माइक एल्बर्टसन के अनुसार, कोविड महामारी की शुरुआत के बाद 'न्यू स्टार्ट' को लागू करने में समस्याएं आने लगीं, क्योंकि स्वास्थ्य सुरक्षा की वजह से दूसरे देश जाकर परमाणु ठिकानों का निरीक्षण नहीं किया जा रहा था.

बाद में रूस के यूक्रेन पर हमले पर अमेरिका की प्रतिक्रिया के बाद रूस ने इस समझौते पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और अमेरिका को रूस में आकर निरीक्षण करने से मना कर दिया.

दूसरी ओर अमेरिका ने रूस पर 'न्यू स्टार्ट' संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है.

'न्यू स्टार्ट' संधि की मियाद फ़रवरी 2026 में समाप्त होने जा रही है. इस संधि की मियाद एक बार पांच साल के लिए बढ़ाई जा सकती है. मगर इस प्रावधान का इस्तेमाल पहले ही 2021 में किया जा चुका है.

माइक एल्बर्टसन के अनुसार, इसकी जगह नया समझौता करने में काफ़ी समय और मेहनत लगेगी. सवाल यह है कि 'न्यू स्टार्ट' समझौते की समाप्ति के बाद क्या होगा?

हथियार
इमेज कैप्शन, 'न्यू स्टार्ट' समझौते के तहत अमेरिका और रूस साल में दो बार एक-दूसरे को अपने परमाणु हथियारों की संख्या की जानकारी देने के लिए बाध्य थे (सांकेतिक तस्वीर)

'न्यू स्टार्ट' संधि की समाप्ति के बाद क्या?

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर नताली टची का कहना है कि विश्व में हथियार नियंत्रण व्यवस्था चरमरा गई है. 'न्यू स्टार्ट' संधि आख़िरी ऐसी व्यवस्था बची थी जो शायद इस साल समाप्त हो जाएगी.

हमने उनसे पूछा कि क्या अमेरिका और रूस 'न्यू स्टार्ट' की समाप्ति के बाद भी परमाणु हथियार नियंत्रण को जारी रख सकते हैं?

उन्होंने जवाब दिया कि सैद्धांतिक रूप से दोनों देश हथियार नियंत्रण और सामरिक स्थिरता के पक्ष में हैं. यही बात अमेरिका ने 2025 में अपनी राष्ट्रीय रणनीति में दोहराई थी.

वह कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि 'न्यू स्टार्ट' की समाप्ति के बाद अचानक परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ जाएगी मगर उन्हें सीमित रखने वाले नियम नहीं रहेंगे."

'न्यू स्टार्ट' की समाप्ति के बाद क्या परमाणु क्षमता प्राप्त देशों के बीच कोई बहुपक्षीय संधि हो सकती है?

नताली टची ने कहा कि केवल दो देशों के बीच संधि हो पाना काफ़ी मुश्किल रहा है. चीन इसमें शामिल नहीं होगा. चीन की दलील है कि उसके पास अमेरिका और रूस के मुक़ाबले काफ़ी कम परमाणु हथियार हैं इसलिए यह चिंता का कारण नहीं है. साथ ही वह यह भी कहेगा कि भारत के पास भी परमाणु हथियार हैं और भारत कहेगा कि पाकिस्तान के हथियारों के बारे में क्या किया जा रहा है?

नताली टची ने आगे कहा, "परमाणु हथियार नियंत्रण पर बात तो होती रही है लेकिन रूस और अमेरिका के अलावा दूसरे परमाणु देशों को संधि में शामिल करने के ख़ास प्रयास नहीं हुए हैं. मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में कोई बहुपक्षीय संधि हो पाएगी."

नताली टची का बयान

अगर परमाणु देशों के बीच संधि समाप्त हो जाएगी तो ग़ैर-परमाणु देशों का क्या रुख़ रहेगा?

नताली टची कहती हैं कि अब तक तो यह अलिखित क़रार रहा है कि परमाणु देश अपने हथियारों में कटौती करेंगे और जिन देशों के पास परमाणु क्षमता नहीं है वो इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करेंगे. मगर इस संधि के समाप्त होने के बाद स्थिति बदल सकती है.

नताली टची ने यह भी कहा कि उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों की वजह से उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई मुश्किल हो गई है. इस वजह से दक्षिण कोरिया सोच रहा है कि उसे क्या नीति अपनानी चाहिए. वहीं कई देश यह भी सोच रहे हैं कि क्या अमेरिका भरोसेमंद सहयोगी है?

पिछले साल अमेरिका और ईरान के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर वार्ताएं अचानक समाप्त हो गईं जब इसराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला कर दिया.

नताली टची ने कहा, "इससे परमाणु कूटनीति के प्रति विश्वास टूट गया. दूसरी ओर यूक्रेन युद्ध के कारण रूस भी परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की धमकियां देता रहा है. इससे ग़ैर-परमाणु देशों को लगने लगा है कि अगर परंपरागत युद्ध में हार होने की नौबत आती है तो परमाणु हथियारों का विकल्प ज़रूरी होगा."

इससे यही संदेश गया है कि परमाणु हथियार सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं. तो क्या परमाणु हथियार निशस्त्रीकरण ठप होने जा रहा है?

रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण संबंधि आख़िरी संधि के समाप्त होने के बाद इस विषय में अनिश्चितता बढ़ जाएगी.

कुछ परमाणु क्षमता प्राप्त देश क्या करेंगे इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. सहयोगी देशों पर से घटते विश्वास की वजह से कुछ देश परमाणु हथियार नहीं बनाने की अपनी नीति को बदल सकते हैं.

हमारी एक्सपर्ट अलेक्ज़ांड्रा बेल के अनुसार, "एक बार फिर हम पर परमाणु युद्ध का वैसा ख़तरा मंडराने लगेगा जैसा शीत युद्ध के दौरान पैदा हो गया था. और ज़रूरी नहीं कि इस बार भी भाग्य हमारा साथ दे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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