बड़े हो जाने पर माता-पिता के साथ रहना चाहिए या अलग?

पिता के साथ बेटी
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पिछले दिनों इटली के उत्तरी शहर पेविया में 75 साल की एक बुज़ुर्ग महिला ने अपने बेटों को घर से निकालने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

महिला के एक बेटे की उम्र 40 साल थी और दूसरे की 42 साल. महिला ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने कई बार बेटों को अलग रहने के लिए कहा, लेकिन वे सुन नहीं रहे हैं.

कोर्ट ने दोनों बेटों को 18 दिसंबर तक मकान ख़ाली करने के लिए कहा है.

अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि शुरू में तो बेटे इसलिए रह सकते थे, क्योंकि बच्चों की देखभाल करना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है, चूंकि अब वे 40 साल के ऊपर के हैं, इसलिए अब यह तर्क नहीं दिया जा सकता है.

इस फ़ैसले ने उन देशों में एक नई बहस खड़ी कर दी, जहां के समाज में यह उम्मीद की जाती है कि वयस्क होते ही बच्चों को अपने माता-पिता का घर छोड़ देना चाहिए.

चर्चा हो रही है कि बच्चों को किस उम्र में अपने माता-पिता से अलग रहना शुरू कर देना चाहिए और यह फ़ैसला उम्र के आधार पर लिया जाना चाहिए या फिर आर्थिक स्थिति के आधार पर.

दरअसल, भारत समेत बहुत से देशों में एक ही घर में कई पीढ़ियों का रहना आम है, लेकिन कुछ देशों में बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे वयस्क या आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाने पर माता-पिता से अलग रहें.

जो ऐसा नहीं कर पाते, उन्हें सामाजिक दबाव और तानों का भी सामना करना पड़ता है.

उदाहरण के लिए, इटली में माता-पिता के घर पर रहने वाले वयस्कों की संख्या ज़्यादा है.

बीबीसी साउंड के पॉडकास्ट ‘विमेन्स आवर’ की प्रेज़ेंटर कृपा ने बताया कि ऐसे लोगों को वहां बंबोचियोनी (बड़े बच्चे) कहकर चिढ़ाया जाता है.

माता-पिता के साथ रहना चाहिए या नहीं

माता-पिता से अलग रहने की परंपरा

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर स्नेह बताती हैं कि पश्चिमी संस्कृति में आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता पर ज़ोर दिया जाता है और बच्चों का सामाजीकरण भी इसी तरह से किया जाता है.

वे बीबीसी सहयोगी आदर्श राठौर से कहती हैं, “पश्चिमी देशों में वयस्क होने पर बच्चों को अलग करने की परंपरा इसलिए है ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके."

वे कहती हैं, "माना जाता है कि वे इस लायक हो गए हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी उठा सकें. बच्चे भी वयस्क होने पर स्वतंत्र रूप से जीना चाहते हैं ताकि उनके जीवन में किसी का दख़ल न हो.”

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर स्नेह

इटली से संबंध रखने वालीं बीबीसी की सहयोगी पत्रकार एद्रियाना अरबानो ने 'विमेन्स आवर' पॉडकास्ट में बताया कि इटली में बहुत से वयस्कों का लंबे समय तक माता-पिता के साथ रहने का कारण भी आर्थिक ही है.

29 साल की अरबानो बताती हैं कि उनकी उम्र के ज़्यादातर लोग अपने माता-पिता के घर पर ही रह रहे हैं.

उन्होंने कहा, “इटली में बच्चों का लंबे समय तक माता-पिता के साथ रहना काफ़ी आम है. इसके पीछे सांस्कृतिक से ज़्यादा आर्थिक कारण हैं. अच्छे वेतन वाली स्थायी नौकरियां आसानी से नहीं मिलतीं. ऐसे में वे आत्मनिर्भर होने तक माता-पिता के साथ ही रहते हैं.”

बुज़ुर्ग

माता-पिता संग क्यों रहते हैं वयस्क?

‘विमेन्स आवर’ पॉडकास्ट में इस विषय पर एक श्रोता की प्रतिक्रिया थी, “पश्चिमी देशों में बच्चों को घर छोड़ने के लिए कहा जाता है. यहां गांव का रिवाज छोड़ दिया गया है, जहां कई पीढ़ियां साथ रहती हैं और एक-दूसरे की मदद करती हैं.”

जैसा इन महिला का अनुभव था, भारत में भी आमतौर पर वैसा ही देखने को मिलता है. न सिर्फ़ गांवों में, बल्कि शहरों में भी.

कितने प्रतिशत युवा माता पिता के साथ रहते हैं.

डॉक्टर स्नेह बताती हैं कि भारत में एक ही घर में कई पीढ़ियों के साथ रहने के आर्थिक कारण तो हैं ही, कुछ सांस्कृतिक वजहें भी हैं.

वह कहती हैं, “संयुक्त परिवार, जिनमें कई पीढ़ियां एक साथ रहती हैं, वे भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं. ऐसे परिवारों में सभी सदस्यों को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक सुरक्षा मिलती है. बड़े-बूढ़े परिवार के बच्चों का ख़्याल रखते हैं और युवा अपने बुज़ुर्गों का.”

प्रोफ़ेसर स्नेह बताती हैं कि ऐसे और भी कई कारण हैं, जिनके चलते वयस्क हो जाने पर भी लोगों को माता-पिता के साथ रहना पड़ता है. जैसे कि शादी के बाद यहां दुल्हन अमूमन अपने ससुराल जाकर रहती है. या फिर पुश्तैनी मकान और संपत्ति के कारण भी लोग साथ रहते हैं.

बुज़ुर्ग

माता-पिता का उत्पीड़न

दिल्ली हाई कोर्ट में अधिवक्ता प्रणव घाबरू ने बीबीसी के सहयोगी आदर्श राठौर से बात करते हुए कहा कि भारत में माता-पिता को क़ानूनन तब तक बच्चों की देखभाल करनी होती है, जब तक वे वयस्क न हो जाएं.

वह बताते हैं, “सामाजिक नियम अलग हो सकते हैं, लेकिन क़ानून कहता है कि बच्चा वयस्क होने तक माता-पिता से गुज़ारा भत्ता मांग सकता है."

अधिवक्ता दिल्ली हाई कोर्ट बेटी पिता से पैसे ले सकती है
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इटली में बुज़ुर्ग महिला इसलिए कोर्ट गई थीं, क्योंकि वह अपने बेटों की ज़िम्मेदारी नहीं उठा पा रही थीं.

पत्रकार एद्रियाना अरबानो बताती हैं, “महिला के दोनों बेटे नौकरी करते थे, लेकिन न तो घर के खर्च में मदद करते थे और न दूसरे कामों में. मां पर बोझ बने हुए थे. ये मामला मां को हल्के में लेने का है. उन्हें नौकर की तरह इस्तेमाल करने का है.”

माता-पिता के साथ ऐसा बर्ताव करने के मामले भारत में भी बढ़ रहे हैं. एडवोकेट प्रणव घाबरू बताते हैं कि बहुत से माता-पिता अपने बच्चों के शोषण से तंग आकर सीनियर सिटिज़ंस ट्रिब्यूनल में सीनियर सिटिज़ंस एक्ट के तहत याचिका दायर कर रहे हैं.

वह बताते हैं कि इस तरह के मामलों में देखा गया है कि कुछ लोग अपने बूढ़े और मजबूर माता-पिता की संपत्तियों पर कब्ज़ा कर कर रहे हैं या फिर उनकी देखभाल नहीं कर रहे.

एडवोकेट प्रणव बताते हैं कि ऐसी स्थिति पैदा हो तो माता-पिता बच्चों को घर से निकाल सकते हैं या फिर उनसे गुज़ारा भत्ता लेने के लिए याचिका भी दायर कर सकते हैं.

इसके लिए सीआरपीसी की धारा 125 और मैन्टेनेंस एंड वेल्फ़ेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़ंस एक्ट जैसे क़ानूनी विकल्पों की मदद ली जा सकती है.

बुज़ुर्ग

क्या है सही विकल्प?

इटली वाला घटना की चर्चा इसलिए भी ज़्यादा हुई, क्योंकि माता-पिता का अपने बच्चों को घर से निकालना असामान्य घटना भी मानी जाती है और ऐसा हर समाज में है.

लखनऊ में मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे बताते हैं कि समाज माता-पिता से उम्मीद रखता है कि वे बच्चों को हमेशा प्यार करते रहें और बिना शर्त उनकी देखभाल करते चलें.

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर स्नेह भारत का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि यहां लोगों के जीवन पर सामाजिक प्रभाव ज़्यादा होता है.

वे कहती हैं, "यहां बच्चों का सामाजीकरण जिस तरह से होता है, उसका नुक़सान यह होता है कि वे बड़े होने पर भी माता-पिता की देखरेख में रहते हैं और आत्मनिर्भर नहीं हो पाते. ऐसे में कई बार देखा गया है कि बच्चों की शादी के बाद भी माता-पिता अपनी पेंशन से उनका खर्च उठा रहे होते हैं."

जानकारों का कहना है कि वयस्क हो जाने के बाद बच्चों का अपने माता-पिता के साथ रहना या न रहना उनकी आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति के साथ-साथ मर्ज़ी का भी विषय है.

डॉक्टर स्नेह कहती हैं, "एक-दूसरों की ज़रूरतों और अपेक्षाओं को समझने के बाद ही इस बारे में कोई फ़ैसला लेना चाहिए."

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