कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल चुनाव अकेले लड़ने का फ़ैसला क्यों किया?

राहुल गांधी
इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेगी
    • Author, इल्मा हसन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 से पहले कांग्रेस ने एलान किया है कि वह राज्य की सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी.

यह फ़ैसला दिल्ली में पार्टी की बैठक के बाद लिया गया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और राज्य की लीडरशिप मौजूद थी.

बैठक के बाद पार्टी के राज्य प्रभारी ग़ुलाम अहमद मीर ने कहा, "चर्चा के बाद यह तय किया गया है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी और उसी हिसाब से तैयारी करेगी."

राज्य कांग्रेस का कहना है कि पिछले गठबंधनों से पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल कमज़ोर हुआ था और अब पार्टी अपनी ताक़त फिर से खड़ी करना चाहती है.

यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य की राजनीति पहले से ही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच तेज़ ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है. कांग्रेस का यह कदम चुनावी समीकरणों को और जटिल बना सकता है.

कांग्रेस का तर्क और वाम दलों की प्रतिक्रिया

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार
इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार

पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार का कहना है कि यह फ़ैसला पार्टी के अंदर लंबे समय से उठ रही मांग का नतीजा है.

वे कहते हैं, "पार्टी का सिद्धांत लोकतंत्र है और हम लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. पार्टी के भीतर भी लोकतंत्र होना चाहिए. राज्य में ज़मीनी कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक, सभी की मांग थी कि कांग्रेस सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़े."

शुभंकर सरकार का यह भी कहना है कि बार-बार गठबंधन बदलने से पार्टी पर लोगों का भरोसा डगमगा गया. उनके मुताबिक, "पिछले कुछ वर्षों में हमारा ज़मीनी आधार कमज़ोर हुआ और मतदाता भी लगातार बदलते गठबंधनों को लेकर दुविधा में थे."

कांग्रेस के इस फ़ैसले से सबसे ज़्यादा असर वाम दलों के साथ उसके रिश्तों पर पड़ा है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के पश्चिम बंगाल सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि कांग्रेस और वाम दलों का साथ मूल रूप से बीजेपी को रोकने की रणनीति का हिस्सा था.

उन्होंने कहा, "पहले हम अलग-अलग चुनाव लड़ते थे. लेकिन बीजेपी और फ़ासीवादी ताक़तों को रोकने के लिए हमने विपक्षी वोट बंटने से बचाने के लिए समय-समय पर साथ काम किया. यह प्रयोग हमने राष्ट्रीय स्तर से पहले बंगाल में शुरू किया था."

सलीम का आरोप है कि हाल के समय में कांग्रेस का रुख बदला है.

उनके मुताबिक, "हमें यह संकेत मिलने लगे थे कि कांग्रेस तृणमूल के साथ नरम रुख रखना चाहती है. अब हम बंगाल में सभी वाम दलों को साथ लेकर एक बड़े वाम मोर्चे के तौर पर चुनाव लड़ेंगे."

गठबंधन का इतिहास

अधीर रंजन चौधरी
इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के कड़े आलोचक रहे हैं
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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का चुनावी इतिहास गठबंधनों के साथ जुड़ा रहा है. 2006 में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा और उसे 21 सीटें मिली थीं. 2011 में पार्टी ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और वाम मोर्चे की 34 साल पुरानी सत्ता ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाई. उस चुनाव में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं.

इसके बाद 2016 में कांग्रेस वाम दलों के साथ आई और गठबंधन ने 77 सीटें जीतीं, जिनमें से 44 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं. लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में यही गठबंधन एक भी सीट नहीं जीत पाया और कांग्रेस का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर रहा.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2016 के बाद वाम और कांग्रेस का वोट बैंक धीरे-धीरे खिसककर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर चला गया, जिससे राज्य की राजनीति टीएमसी बनाम बीजेपी के मुकाबले में बदलती गई.

पूर्व पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक स्निग्धेंदु भट्टाचार्य मानते हैं कि कांग्रेस का यह फ़ैसला अचानक नहीं है.

भट्टाचार्य कहते हैं, "यह गठबंधन टूटना पहले से तय था. राहुल गांधी पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाल के समय में लगभग नज़र नहीं आए हैं. उन्होंने एसआईआर या राज्य से जुड़े मुद्दों पर अब तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी भी नहीं की है. कांग्रेस ने वाम दलों के साथ रहते हुए टीएमसी के ख़िलाफ़ तीखी राजनीति करने से दूरी बनाई. ऐसा लगता है कि कांग्रेस टीएमसी के साथ टकराव को कम करना चाहती है."

भट्टाचार्य यह भी कहते हैं, "नए प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार को मॉडरेट चेहरा माना जाता है, जबकि पूर्व अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के कड़े आलोचक रहे हैं. कांग्रेस शायद ममता बनर्जी को सीधे तौर पर चुनौती देने से बचने की रणनीति अपना रही है."

मुस्लिम बहुल इलाकों में असर

राहुल गांधी
इमेज कैप्शन, एक्सपर्ट्स का मानना है कि कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति में फिलहाल ज्यादा स्पेस नहीं है

भट्टाचार्य यह भी कहते हैं कि इस फ़ैसले से राज्य की कुछ सीटों पर तीन या उससे ज़्यादा पार्टियों का मुकाबला देखने को मिल सकता है, खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रों में जहां कांग्रेस का पारंपरिक प्रभाव रहा है.

मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे ज़िले लंबे समय से कांग्रेस के मज़बूत गढ़ माने जाते हैं और यहां बड़ी मुस्लिम आबादी है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर इन इलाकों में कांग्रेस, टीएमसी और वाम दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो वोटों का बंटवारा हो सकता है.

स्निग्धेंदु भट्टाचार्य का कहना है कि 6-7 सीटों पर मुस्लिम वोटों के बंटने से बीजेपी को फ़ायदा मिल सकता है.

कोलकाता स्थित सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़ के राजनीतिक वैज्ञानिक मैदुल इस्लाम का मानना है कि कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना ध्रुवीकरण को और बढ़ा सकता है.

मैदुल इस्लाम कहते हैं, "आज के समय में मतदाता कमज़ोर दलों की बजाय उन दलों को वोट देना चाहते हैं जिनके जीतने की संभावना ज़्यादा हो. टीएमसी और बीजेपी का अपना मज़बूत आधार है. ऐसे में जो मतदाता बीजेपी और टीएमसी दोनों के ख़िलाफ़ हैं, वे असमंजस में पड़ सकते हैं."

मैदुल इस्लाम यह भी मानते हैं कि इस फ़ैसले के पीछे कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक समीकरण भी हो सकता है. वे कहते हैं कि केरल में कांग्रेस और वाम दल सीधे मुकाबले में रहते हैं, इसलिए बंगाल में गठबंधन बनाए रखना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से असहज हो सकता था.

भट्टाचार्य यह भी कहते हैं, "इस फ़ैसले से पश्चिम बंगाल का चुनाव एक तरफ ध्रुवीकृत और दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में बहुकोणीय बन सकता है. लेकिन कुल मिलाकर इस चुनाव में तीसरी ताक़त के लिए ज़्यादा जगह नहीं दिख रही है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.