ईरान पर हमला अमरीका के लिए कितना आसान

ट्रंप और ईरान
    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली
  • प्रकाशित

अमरीका और ईरान के बीच बीते कुछ दिनों से तनाव लगातार बढ़ रहा है. अमरीका ने मध्य-पूर्व में अपनी सेना और साजो-सामान की तैनाती की है.

इसके साथ ही अमरीका ने इराक़ में मौजूद अपने ग़ैर-महत्वपूर्ण राजनयिक कर्मचारियों की संख्या भी घटा दी है.

वहीं दूसरी तरफ़ ईरान ने ख़ुद को परमाणु समझौते से आंशिक तौर पर अलग करने के बाद कह दिया है कि वह अमरीका के साथ इस समझौते पर अब और बात नहीं करेगा.

साफ़ है कि हमेशा युद्ध जैसे हालात में घिरे रहने वाले मध्य-पूर्व पर अब अमरीका और ईरान के बीच होने वाले संभावित युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सचमुच में ये दोनों देश आपस में टकरा गए तो क्या मंजर होगा और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश माने जाने वाले अमरीका के लिए ईरान से युद्ध करना कितना मुश्किल होगा.

इस सवाल के जवाब के लिए हमें मध्य-पूर्व में पहले घटित हो चुके कुछ युद्धों पर नज़र डालनी होगी. इससे पहले ईरान और इराक़, मध्यपूर्व के दो महत्वपूर्ण देश आपस में टकराए चुके हैं.

इराक़ी टैंक

ईरान-इराक़ के बीच युद्ध और अमरीका

22 सिंतबर 1980 को दुनिया भर में यह समाचार आया कि इराक़ी शासक सद्दाम हुसैन ने इराक़-ईरान सीमा के नज़दीक हवाई हमले किए हैं और भारी मात्रा में विस्फोटक गिराए हैं.

सद्दाम हुसैन का अनुमान था कि फ़रवरी 1979 में अपने भीतरी राजनीति में उलझा ईरान बेहद कमज़ोर हो चुका है और पूर्व में स्थित अपने इस पड़ोसी देश के साथ लगने वाले विवादित इलाकों पर कब़्जा करने का यह इराक़ के पास सबसे बेहतरीन मौक़ा है.

तेल के भंडार माने जाने वाले इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच सदियों पुराना सीमाई विवाद है. सद्दाम हुसैन के इस हमले के बाद ईरान की तरफ़ से भी जवाब दिया गया.

1980 से 1988 तक इन दोनों देशों के बीच हुए युद्ध में लाखों लोग मारे गए. कई विशेषज्ञों ने इसे तीसरे विश्व युद्ध तक कह दिया था.

ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयोतोल्लाह अली ख़ुमैनी का मानना है कि ईरान पर हमला करने के लिए अमरीका ने ही सद्दाम हुसैन को मंज़ूरी दी थी. ख़ुमैनी मानते हैं कि ईरान और इराक़ के मसलों पर अमरीका हमेशा साज़िशन नज़र बनाए रखता है.

युद्ध के दौरान इराक़ी सेना
इमेज कैप्शन, युद्ध के दौरान इराक़ी सेना

इस्लामिक क्रांति को बढ़ाना

अयोतोल्लाह ख़ुमैनी ने इस्लामिक क्रांति के विचार को सिर्फ़ ईरान तक ही सीमित नहीं रहने दिया. वो इसे इराक़ के लोगों के बीच भी लेकर गए. उन्होंने इराक़ के लोगों से कहा कि उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ खड़े हो जाइए जो इस्लाम के ख़िलाफ़ खड़ा होता है. उन्होंने 'क्रांति फ़ैलाओ' का नारा दिया.

आधुनिक ईरान के राजनीतिक और सैन्य दिग्गजों ने ईरान-इराक़ युद्ध के जरिए अपना नाम बनाया. उदाहरण के लिए मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी जो कि अभी अब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प- क्वाड फ़ोर्स (आईआरजीसी-क्यूएफ़) के कमांडर हैं. युद्ध के दौरान वो अपनी प्रतिबद्धता और वीरता के लिए पहचाने गए.

इसी तरह मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी के लिए भी यह बात सच साबित होती है, वो युद्ध के दौरान कई मुश्किल मौकों के गवाह रहे हैं.

ईरान के अधिकारियों के लिए इराक़ के साथ हुए युद्ध की यादें अभी भी ताज़ा हैं. वो अपनी बातों में युद्ध को एक संदर्भ बिंदु के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

हालांकि अगर इस युद्ध के नतीज़ों पर गौर फरमाएं तो हम पाएंगे कि ईरान को इसका भारी मानवीय नुक़सान उठाना पड़ा. इसकी एक बड़ी आबादी युद्ध की भेंट चढ़ गई.

इस मानवीय क्षति का इस्तेमाल ईरानी नेता आज के समय में लोगों के भीतर यह संदेश देने के लिए करते हैं कि वो शहीद और बलिदान उनके ख़ून में है.

अयोतुल्लाह ख़मैनी
इमेज कैप्शन, अयोतुल्लाह ख़ोमैनी

युद्ध से ईरान को सबक

ईरान-इराक़ युद्ध से ईरान को बहुत कुछ सीखने को भी मिला. इसकी मदद से उसने अपनी सेना में मौजूद कमियों का पता लगाया. इसके साथ ही नेतृत्व क्षमता में कमज़ोरी और युद्ध के समय आम नागरिकों और सेना के बीच पैदा होने वाले तनाव से निपटारे के तरीक़ों के बारे में जानकारी प्राप्त की.

ईरान को पता लग गया कि युद्ध लंबा खिंचने पर उसे इराक़ के रासायनिक हथियारों, मिसाइलों से लैस सुपर जेट और फ़ारस की खाड़ी में मौजूद अमरीकी नौसेना का सामना करना आसान नहीं होगा.

हालांकि यह कहना नाकाफ़ी होगा कि इस युद्ध ने सिर्फ़ ईराक़ ने ही सबक दिया बल्की ईरान ने भी अपने दुश्मनों को डराने में कामयाबी पाई. ईरान के दुश्मन कभी उसकी ज़मीन पर दोबारा हमला करने की कोशिश नहीं कर सके.

इराक़ के साथ युद्ध के बाद ईरान ने अपनी सैन्य शक्तियों में ख़ासा इज़ाफा किया. उसने आधुनिक हथियारों से ख़ुद को लैस किया. यूएनएसकॉम की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के दौरान सद्दाम हुसैन ने क़रीब 63 प्रतिशत मिसाइलें ईरान पर गिराई थीं.

अमरीका ने खाड़ी में अपने विमानवाहक पोत तैनात किए हैं
इमेज कैप्शन, अमरीका ने खाड़ी में अपने विमानवाहक पोत तैनात किए हैं

ईरान से युद्ध कितना मुश्किल?

साल 2003 में अमरीका ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से निकालने के लिए इराक़ पर हमला बोल दिया था. उस समय अमरीका की कमान जॉर्ज डब्ल्यू बुश के हाथों में थी.

लेकिन ईरान के साथ युद्ध पर खुद जॉर्ज डब्ल्यू बुश कह चुके हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए. इसकी वजह यह है कि अभी तक अमरीका इराक़ के साथ हुए उस युद्ध को भुला नहीं सका है.

मौजूदा हालात में अगर डोनल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान पर युद्ध छेड़ने की कोशिश करता है तो अमरीका को भारी नुक़सान होने का अनुमान लगाया जा सकता है.

ट्रंप ने सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से पहले ही अपनी सेना को वापस बुलाने की बात कह दी है. ऐसे में ट्रंप भले ही ईरान पर अपने ज़ुबानी हमले करते रहें लेकिन असल युद्ध की चुनौतियों का भान उन्हें भी ज़रूर होगा.

ईरान के साथ किसी भी तरह के युद्ध की स्थिति में ख़ुद अमरीका को अपने साथियों की कमी खल सकती है. उसके पास इसराइल और खाड़ी के देशों के अलावा ज़्यादा सहयोगी नहीं हैं.

इतना ही नहीं ट्रंप प्रशासन इस मामले अपने देश के भीतर भी अलग-थलग महसूस कर सकता है. ट्रंप प्रशासन में ऐसा कोई शख्स नहीं है जिसकी स्वीकार्यता पार्टी लाइन के बाहर भी मानी जाती है.

ईरान कह चुका है कि ट्रंप प्रशासन 'ख़तरनाक खेल' खेल रहा है
इमेज कैप्शन, ईरान कह चुका है कि ट्रंप प्रशासन 'ख़तरनाक खेल' खेल रहा है

अमरीका ने जब परमाणु समझौते को ख़त्म किया तो ईरान ने यूरोप की तरफ़ रुख़ किया. ईरान ने कोशिश की कि यह परमाणु समझौता ख़त्म नहीं हो और इसी के तहत यूरोपीय यूनियन के अधिकारियों ने अपनी कंपनियों को प्रोत्साहित किया कि वो ईरान के साथ व्यापार और निवेश जारी रखें.

यूरोप की सरकारों ने ईरान के साथ कई छूटों का प्रस्ताव रखा और अमरीका से भी कहा कि उनकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार करने दे.

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