नाना पाटेकर ने कहा था, 'अगर ये लोग मेरी ज़िंदगी में नहीं आए होते, तो शायद मैं अंडरवर्ल्ड में होता'

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- Author, विनायक होगाडे
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मराठी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
'मुझसे एक दिन किसी ने पूछा कि तुम खेत में क्या उगाते हो? मैंने कहा, लकड़ियां. मैं खुद उगा रहा हूं. नहीं तो ये सारे दोस्त लोग मुझे गीली लकड़ियों से जलाते...'
'...धुआं आंखों में जाने के बाद उनकी आंखों में पानी आता और मुझे जलते हुए लगता कि ये मेरे लिए रो रहे हैं. ऐसे नालायक हैं. इसलिए मैं अपने लिए सूखी लकड़ियां लाऊंगा. धुआं कम होगा. इससे मुझे जलते हुए पता चलेगा कि कौन अपना है और कौन पराया. क्या पता, वहां भी मैं उठकर किसी के मुंह पर मारने लगूं.'
अपनी ही मौत के बारे में इतनी बेबाकी से कही गई ये बातें नाना पाटेकर के बेबाक अंदाज़ को दिखाती हैं.
उन्होंने ये बातें वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले से एक इंटरव्यू में कही थीं.
गुरुवार, 8 अक्तूबर सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर नाना पाटेकर का गोवा के डोना पाउला इलाके में स्थित अपने घर पर निधन हो गया.
उन्हें समुद्र से बहुत लगाव था. जब वो सातवीं क्लास में थे तो उनकी मां ने उन्हें अपनी बहन के मुरुड-जंजीरा स्थित घर भेजा था, ताकि उनका मन पढ़ाई में लगे. उस घर के पास ही विशाल समंदर था.
लेकिन आठवीं कक्षा में नाना की मौसी को डर लगा कि कहीं उनकी संगत में उनके अपने बच्चे ही ना बिगड़ जाएं, इसलिए मौसी ने ही उन्हें वापस भेज दिया.
मुरुड में उनके सामने हमेशा समुद्र हुआ करता था. इन यादों के बारे में नाना पाटेकर ने कहा था, "मुझे हर चीज़ को भव्यता में देखने की आदत हो गई थी. छोटा देखने की आदत ही नहीं रही. अगर बनना है, तो समुद्र जैसा बड़ा बनना चाहिए, ऐसा लगता था."

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'अगर ये लोग मेरी ज़िंदगी में नहीं आए होते, तो शायद मैं अंडरवर्ल्ड में होता'
नाना पाटेकर ने मराठी और हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी अमिट छाप छोड़ी.
नायक, सहनायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता जैसी अलग-अलग भूमिकाओं के ज़रिए वह मराठी फ़िल्मों की दुनिया से बाहर भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे.
वह बेहद ग़रीबी से उठकर आए. अभिनय की बदौलत ही एक सामान्य परिवार का शरारती लड़का अभिनय की दुनिया में समुद्र जैसी भव्यता हासिल कर सका.
बचपन में वह बहुत शरारती थे. अपनी इसी ऊर्जा को उन्होंने नाटक और अभिनय में इस्तेमाल किया.
निखिल वागले के इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "मैं मूल रूप से ग़रीब था रे. मैं फुटपाथ पर सोया हूं. महीने की 35 रुपये तनख़्वाह और एक वक्त का खाना. 13 साल की उम्र में मैं नौकरी करने लगा था. मैं हमेशा कहता हूं कि उस समय मेरा कोई रिश्तेदार नहीं था. फिर जब थोड़ा नाम और पैसा आया, तो बहुत सारे रिश्तेदार हो गए."

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उनके पिता गजानन पाटेकर मुंबई में कपड़े का कारोबार करते थे.
कारोबार में किसी ने उनको धोखा दिया और इसमें उनका सब कुछ चला गया. इसके बाद ग़रीबी में परिवार का खर्च उठाने के लिए उन्होंने पेंटर की नौकरी की.
उस दौरान वह फ़िल्मों के पोस्टर भी बनाया करते थे. तब वह दादर के समर्थ विद्यालय में पढ़ते थे. दोपहर में घर आकर जो मिलता, उसे खाकर दोपहर की धूप में आठ किलोमीटर पैदल चलकर जाते और फिर रात में आठ किलोमीटर पैदल चलकर वापस आते. 16 किलोमीटर पैदल चलना उनका रोज़ का सिलसिला था.
ऐसे मुश्किल हालात में उनका बचपन बीता. बचपन में उनका सपना आर्मी में जाने का था, लेकिन माता-पिता ने उन्हें जाने नहीं दिया. आर्मी को लेकर उनका यही आकर्षण आगे चलकर 'प्रहार' फ़िल्म के ज़रिए सामने आया.
बतौर निर्देशक यह उनकी पहली फ़िल्म थी. हालांकि, नाटक की दुनिया में उनकी एंट्री भी एक तरह से अचानक ही हुई थी.
वह वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक विजया मेहता को अपना गुरू मानते थे. वह बताते थे कि उनके साथ-साथ अरविंद देशपांडे, सुलभा देशपांडे जैसे लोगों का भी उनकी शख़्सियत को गढ़ने में बड़ा योगदान रहा.
उनका यह कहना कि, "अगर ये लोग मेरी ज़िंदगी में नहीं आए होते, तो शायद मैं अंडरवर्ल्ड में होता."

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अशोक सराफ ने कैसे नाना पाटेकर की मदद की
नाना नौकरी से नाटक की दुनिया में कैसे आए, इसका किस्सा भी काफ़ी दिलचस्प है.
उस समय वह 'चांगुणा' नाटक की रिहर्सल देखने गए थे. रिहर्सल देखते हुए वह अपनी शरारतें करते रहते थे. जब स्टेट कॉम्पिटिशन के लिए दूसरा नाटक तैयार किया जा रहा था, तब सुलभाताई ने अरविंद देशपांडे से कहा, "वो लड़का है ना. वो ये रोल करेगा."
उस समय नाना पाटेकर नौकरी करते थे. इसलिए उनके सामने असमंजस था कि नौकरी करें या नाटक. लेकिन सुलभाताई ने उन पर भरोसा करके उन्हें यह रोल दिया और नाना को एक बड़ा मंच मिल गया.
उन्होंने बताया था कि 'पुरुष' नाटक से ज़्यादा पैसे मिलते थे, इसलिए वह कई साल तक यह नाटक करते रहे.
उस समय नाना पाटेकर को हर शो के 50 रुपये मिलते थे, जबकि अशोक सराफ को 200 रुपये यानी उनसे चार गुना ज़्यादा पैसे मिलते थे. जब अशोक सराफ उनके साथ ताश खेलते थे, तो वह जानबूझकर आठ-दस रुपये हार जाते थे. नाना पाटेकर ने बताया था, "मुझे पता होता था कि वह जानबूझकर हार रहे हैं, फिर भी मैं पैसे लेता था. क्योंकि मुझे पैसों की ज़रूरत थी."

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नाना पाटेकर का अशोक सराफ के साथ रिश्ता कितना बेबाक और ज़िंदादिल था, यह उन्होंने निखिल वागले को दिए इंटरव्यू में ख़ुद ही बहुत अच्छे से बताया है.
नाना पाटेकर ने बताया था, "अशोक ने मेरी बहुत मदद की. बहुत. गणपति के लिए भी ख़ास तौर पर पैसे दिया करते थे. जब मैं पैसे लौटाने जाता तो कहते, क्या पाटेकर, पैसे वाले हो गए? मैंने उससे कहा, बाबा, पैसे ही तो वापस कर रहा हूं, वक्त तो वापस नहीं कर सकता. लेकिन इन लोगों ने मेरा बहुत ख़्याल रखा. मैं अशोक के पैर दबाता था और सिर की थोड़ी मालिश कर देता तो वह मुझे तीन रुपये देते थे. आज भी अशोक कहीं मिल जाते हैं और मैं उनके पैर दबाने जाता हूं तो वह झिड़क देते हैं कि अरे, अब क्या ये सब कर रहे हो? इस पर मैं उनसे कहता हूं, ऐसे कैसे चलेगा? सिर की दो मिनट मालिश की तो पांच रुपये, दस रुपये देते हैं और कहते हैं, कि चलो ले लो, ले लो, महंगाई बढ़ गई है, मज़ा करो!"
अशोक सराफ के लिए जब नाना पाटेकर ने रिक्शा चलाया
दूसरी तरफ़, अशोक सराफ ने नाना पाटेकर से जुड़ा ऐसा ही एक किस्सा अपनी किताब 'बहुरूपी' में दर्ज किया है.
'हमीदाबाई की कोठी' नाम के एक शो के दौरान अशोक सराफ़ और पूरी टीम को बेहद ख़तरनाक अनुभव हुआ था.
एक छोटे से गांव में शो था. वहां पारंपरिक अर्थों में थिएटर जैसा कुछ था ही नहीं. कलाकारों ने मंच पर बोलना शुरू किया, लेकिन दर्शकों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था और आवाज़ भी नहीं आ रही थी. पांच मिनट में ही पर्दा गिरा दिया गया. नाटक रद्द करने की नौबत आ गई थी और लोग बाहर चिल्ला रहे थे.

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अशोक सराफ एक जाना-पहचाना और लोकप्रिय चेहरा थे, इसलिए हमीद के नाम पर बाहर ज़ोरदार हंगामा हो रहा था.
पूरा मामला समझते हुए इस नाटक में भूमिका निभा रहे नाना पाटेकर ने अशोक सराफ का हाथ पकड़ा और उन्हें पीछे के रास्ते से बाहर निकाल लिया. उधर थिएटर में मारपीट शुरू हो गई थी.
अशोक सराफ़ लिखते हैं, "हम दोनों सड़क पर पहुंचे. वहां कोई भी वाहन नहीं था. नाना ने एक साइकिल रिक्शा रोकी. उस बुज़ुर्ग रिक्शाचालक से चढ़ाई वाली सड़क पर रिक्शा चलाना मुश्किल हो रहा था. नाना ने उसे उतारा और ख़ुद रिक्शा खींचने लगे. नाना नहीं होते तो उन लोगों ने मुझे मार ही दिया होता. नाटक नहीं होने का सारा गुस्सा मुझ पर निकालते. आज भी वह घटना याद आती है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं."
यौन उत्पीड़न के आरोप से लेकर 'नाम' फाउंडेशन तक
नाना पाटेकर ने 1978 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'गमन' से फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा. इसमें उनका किरदार इतना छोटा था कि वह दर्शकों की नज़र में भी नहीं आए.
उन्होंने 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'प्रहार', 'खामोशी', 'अग्निसाक्षी', 'नटसम्राट', 'वेलकम' जैसी कई फ़िल्मों में अपने दमदार अभिनय की अमिट छाप छोड़ी.
2014 की फ़िल्म 'प्रकाश बाबा आमटे' में उनकी एक्टिंग की बहुत तारीफ़ हुई. उनका निभाया 'नटसम्राट' का किरदार भी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहा. 'वेलकम' फ़िल्म में उनके निभाए किरदार पर ढेर सारे मीम्स बने
'परिंदा', 'अंगार', 'क्रांतिवीर' और 'अपहरण' जैसी फ़िल्मों के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिले.
ख़ास तौर पर, अन्याय के ख़िलाफ़ गुस्से से भरे एक 'एंग्री यंग मैन' को उन्होंने अपनी ख़ास शैली में पर्दे पर उतारा.
शायद यही वजह है कि राज ठाकरे ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, "नाना के अभिनय को देखते हुए ऐसा लगता था जैसे आम लोगों की ज़िंदगी में भावनाओं का प्रेशर कुकर देख रहे हों."
लेकिन नाना पाटेकर की ज़िंदगी भी उतार-चढ़ाव से भरी रही. उन पर यौन शोषण के आरोप भी लगे.

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अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 में एक फ़िल्म के सेट पर नाना पाटेकर पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था. इस फ़िल्म में दोनों काम कर रहे थे.
नाना ने इन आरोपों से हमेशा इनकार किया. भारत में #मीटू मूवमेंट शुरू होने के बाद 2018 में यह मामला फिर सामने आया. इसके बाद तनुश्री दत्ता ने शिकायत दर्ज कराई और नाना नकारात्मक वजहों से चर्चा में रहे. लेकिन पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के कारण पुलिस ने जून 2019 में उन्हें इन आरोपों से बरी कर दिया.
"यौन उत्पीड़न क्या होता है? हम सेट पर थे और हमारे सामने 200 लोग बैठे थे." ये कहते हुए नाना पाटेकर ने 'मिरर नाउ' को दिए इंटरव्यू में अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को ख़ारिज किया था.
2015 में सूखे की पृष्ठभूमि में नाना पाटेकर ने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' की शुरुआत की थी.
महाराष्ट्र में भीषण सूखे और किसानों की तकलीफ़ों के प्रति बरती जा रही उदासीनता के ख़िलाफ़ सक्रिय रूप से काम करना इसका मक़सद था.

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वह हर दल के नेताओं के क़रीबी रहे.
'बाबा आमटे भी क़रीबी और बालासाहेब ठाकरे भी क़रीबी, ऐसा कैसे?' यह सवाल निखिल वागले ने उनसे पूछा था.
इस सवाल पर उनके जवाब से शायद नाना पाटेकर के इस अस्थिर स्वभाव को समझा जा सकता है.
नाना ने कहा था, "मुझे जो पसंद है, वो पसंद है. मैं एक पक्षी हूं. मुझे किस डाल पर बैठना है, ये मुझे तय करना है. मुझे कौन-सा फल खाना है और कहां बीट करनी है, ये मुझ पर निर्भर है."
आगे इसी संदर्भ में एक जगह उन्होंने कहा था, "सभी अच्छे होते हैं रे."
"मुझे क़ुरान की आयतें बोलनी आती हैं. मेरे गले में ताबीज़ भी है. कृष्ण भी हैं. ये मैं ख़ुद से नहीं पहनता. किसी ने दिया है, इसलिए पहनता हूं."
"मैं मंदिर नहीं जाता. शिर्डी वगैरह भी नहीं जाता. अगर मुझे साईंबाबा के दर्शन करने हों तो मैं यहीं हाथ जोड़ सकता हूं और अगर वो भगवान हैं, तो वो यहां भी आ सकते हैं. इतना सीधा लॉजिक है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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