ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ विपक्ष के प्रोटेस्ट की पाकिस्तान, ब्रिटेन और दूसरे देशों में कैसी चर्चा

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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न यानी एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप और विपक्ष के प्रोटेस्ट की भारत ही नहीं विदेशी मीडिया में भी चर्चा हो रही है.
ब्रिटेन के द गार्डियन, क़तर के अल जज़ीरा, जर्मनी के डॉयचे वेले और पाकिस्तान के डॉन और जियो न्यूज़ जैसे आउटलेट्स ने इस पूरे विवाद को अलग-अलग एंगल से कवर किया है.
विपक्ष लगातार ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और एसआईआर प्रक्रिया को रद्द करने की मांग कर रहा है.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी और कई विपक्षी नेताओं ने इस मांग को लेकर मंगलवार और बुधवार दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन किया.
इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) भी हमलावर है और मोदी सरकार और ज्ञानेश कुमार की मिलीभगत का आरोप लगा रही है.
ब्रिटेन के 'द गार्डियन' ने क्या लिखा

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ब्रिटेन के द गार्डियन ने इसे वोटर लिस्ट और चुनावी प्रक्रिया के विवाद के तौर पर देखा है.
5 अक्तूबर की अपनी रिपोर्ट में अख़बार ने लिखा , "भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची से करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े एक विवादास्पद अभियान और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार और चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग की है. हाल के दिनों में देश भर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं. विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और युवा-नेतृत्व वाले 'कॉकरोच' आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया है."
अख़बार लिखता है, "आरोप हैं कि मतदाता सूचियों के इस पुनरीक्षण में विशेष रूप से मुसलमानों जैसे अल्पसंख्यक वर्ग को निशाना बनाया जाता है, जो पारंपरिक रूप से मोदी की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मतदाता नहीं हैं."
हालांकि द गार्डियन ने चुनाव आयोग के उस स्पष्टीकरण को भी जगह दी है जिसमें कहा गया है कि एसआईआर-अपना पता चेंज करके कहीं और शिफ़्ट हुए लोगों और मर चुके लोगों के नाम हटाकर वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया है.
अल जज़ीरा: 'भारत के चुनावों पर उठते सवाल'
क़तर के अल जज़ीरा ने 6 अक्तूबर को राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं की हिरासत को कवरेज दी.
उसकी रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं और एसआईआर के दौरान वोटर रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं. साथ ही अल जज़ीरा ने चुनाव आयोग का पक्ष भी रखा कि एसआईआर का मक़सद डुप्लीकेट, मृत या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाकर वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना है.
अख़बार लिखता है, "आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में ऐसे दस्तावेज़ मांगे जाते हैं जो भ्रमित करने वाले और हासिल करने में कठिन होते हैं, जिससे लाखों एलिजबल वोटर्स के बाहर होने का ख़तरा पैदा हो गया है. चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों में 30 प्रतिशत तक वोटर कम हो सकते हैं."
इससे पहले अल जज़ीरा ने 2 अक्तूबर को बाकायदा एक विश्लेषण छापा था- 'कैन इंडियाज़ कॉकरोच मूवमेंट आउस्ट मोदीज़ इलेक्शन चीफ़' (क्या भारत की कॉकरोच मुहिम मोदी के इलेक्शन चीफ़ को हटा पाएगी?)
इसमें राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि सरकार ने पिछले प्रदर्शनों से रणनीतिक सबक लिए हैं और इस बार वह प्रदर्शनकारियों को बड़ा जमावड़ा बनाने से पहले ही रोकने की कोशिश कर रही है. साथ ही विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि सीजेपी के युवा प्रदर्शनकारी अब पहले से कहीं ज़्यादा अनुभवी हैं.
यहां एक अहम बात है: अल जज़ीरा के विश्लेषण में सरकार के लिए चुनौती को केवल राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्ष से नहीं जोड़ा गया है. युवा आंदोलन और विपक्ष के एक ही मुद्दे पर सड़क पर आने को बड़ा फैक्टर माना गया है.
पाकिस्तान में कैसी कवरेज
पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार डॉन ने 7 अक्तूबर को राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों की हिरासत पर रिपोर्ट प्रकाशित की.
रिपोर्ट में प्रदर्शन को मोदी के तीसरे कार्यकाल के बीच नई राजनीतिक चुनौती बताया गया है. इसमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की हिरासत, विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप और बीजेपी का जवाब तीनों शामिल हैं.
पाकिस्तान के जियो न्यूज़ ने 5 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगे जाने को प्रमुखता दी.
उसकी रिपोर्ट में विपक्ष और कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग और एसआईआर को लेकर लगाए जा रहे आरोपों का ज़िक्र है. साथ ही चुनाव आयोग के आरोपों से इनकार को भी शामिल किया गया है.
जियो न्यूज़ के मुताबिक़, 'ज्ञानेश कुमार पर पीएम नरेंद्र मोदी की हिंदू नेशनलिस्ट पार्टी बीजेपी के इशारों पर काम करने का आरोप है.'
इसमें इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का भी ज़िक्र है जिसमें दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीने में 14 बार चुनाव आयोग के कई फ़ैसलों से जुड़ी बातों पर असहमति जताई.
मोदी के सामने चुनौती

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अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र पर केंद्रित प्रतिष्ठित अमेरिकी समाचार पत्रिका और डिजिटल प्रकाशन फॉरेन पॉलिसी में 1 अक्तूबर को स्टैनफोर्ड के हूवर इंस्टीट्यूशन के सीनियर फेलो सुमित गांगुली का विश्लेषण छपा है. इसका शीर्षक है: "मोदी फ़ेसेस प्रोटेस्ट थ्रेट ओवर इलेक्शन कमीशन स्कैंडल' (इलेक्शन कमीशन स्कैंडल के कारण मोदी के सामने विरोध प्रदर्शन की चुनौती)
गांगुली का तर्क है कि यह मामला मोदी सरकार के लिए इसलिए अहम हो सकता है क्योंकि चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल अब विपक्ष और सीजेपी जैसे युवा आंदोलन को एक साझा मुद्दा दे रहे हैं.
वह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताए गए चुनाव आयुक्तों के कथित मतभेदों को इस विवाद का अहम आधार मानते हैं.
लेकिन उनका विश्लेषण राहुल गांधी के लिए भी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है. गांगुली लिखते हैं कि कांग्रेस और राहुल गांधी के पास इस आंदोलन को लगातार चलाने की राजनीतिक और संगठनात्मक क्षमता है या नहीं, इस पर सवाल हैं. उनके मुताबिक़, अगर कांग्रेस, सीजेपी और क्षेत्रीय दल इस मुद्दे पर एक साथ टिके रहते हैं, तभी बीजेपी के सामने 2014 के बाद की सबसे गंभीर चुनौती जैसी स्थिति बन सकती है.
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