कांग्रेस और सीजेपी में कितनी दूरियां, अरविंद केजरीवाल विरोध प्रदर्शन से अलग क्यों?

अरविंद केजरीवाल
इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल 2014 में बनारस से नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने गए थे
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आम आदमी पार्टी का जन्म 2012 में कांग्रेस के विरोध के दम पर ही हुआ था. लेकिन भारतीय राजनीति में विरोध से ज़्यादा विरोधाभास स्थायी है.

दिसंबर 2013 में अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के समर्थन से ही पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने.

2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिला था. आम आदमी पार्टी को 28, बीजेपी को 31 और कांग्रेस को आठ सीटों पर जीत मिली. आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन किया और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे.

हालांकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की यह सोहबत 49 दिनों तक ही रही और फ़रवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया.

कई विश्लेषक आम आदमी पार्टी को बीजेपी से ज़्यादा कांग्रेस के लिए ख़तरे के रूप में देखते हैं. आम आदमी पार्टी जहाँ भी सत्ता में आई वहाँ कांग्रेस को हराकर आई. आम आदमी पार्टी किसी भी राज्य में बीजेपी को हराने में कामयाब नहीं रही है.

अब जब कांग्रेस हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ देश की सत्ता से बाहर है, ऐसे में आम आदमी पार्टी के लिए लड़ाई कांग्रेस से नहीं बीजेपी से ही है. लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और वहाँ उसकी लड़ाई कांग्रेस से है.

दिल्ली और पंजाब के अलावा आम आदमी पार्टी की कोई ठोस मौजूदगी नहीं है. यानी आम आदमी पार्टी को बीजेपी विरोधी भी दिखना है और कांग्रेस विरोधी भी.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कुमार को लेकर कांग्रेस और आप दोनों की आपत्तियां हैं लेकिन कांग्रेस की मुहिम में अरविंद केजरीवाल शामिल नहीं हो रहे हैं.

जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस की सीधी भागीदारी नहीं थी. जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री के आवास के बाहर धरने पर बैठ गए थे तो आम आदमी ने इसका विरोध किया था.

आम आदमी पार्टी
इमेज कैप्शन, सीजेपी के विरोध प्रदर्शन पर आम आदमी पार्टी का बिल्कुल अलग रुख़ रहता है

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आप के राज्यसभा सांसद सांसद संजय सिंह ने एक्स पर आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने सीजेपी के आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए राहुल गांधी को धरने पर बैठाया.

संजय सिंह ने एक्स पर लिखा था, ''देश के करोड़ों युवाओं के लिए सोनम वांगचुक जी पिछले 23 दिनों से आमरण अनशन पर हैं. जंतर मंतर पर देश का युवा आंदोलन कर रहा है.''

''20 जुलाई को युवाओं को बर्बरता पूर्वक पीटा गया. कांग्रेस एक महीने से आंदोलन को गाली दे रही है, अब राहुल गांधी जी कह रहे हैं कि जंतर मंतर नहीं हमारे धरने में आइए. आख़िर युवाओं के आंदोलन को क्यों कमज़ोर करना चाहती है कांग्रेस? जंतर-मंतर के आंदोलन में शामिल होने की अपील क्यों नहीं करती कांग्रेस?''

तब सीजेपी के आंदोलन में आम आदमी पार्टी सक्रिय रूप से शामिल थी.

सात अक्तूबर को एक्स पर एक यूज़र ने लिखा, ''क्या दिल्ली कांग्रेस में अब कोई नेता बचा भी है या नहीं? कांग्रेस का युवा मोर्च और एनएसयूआई, आप सब लोग कहां हैं? भीड़ तक जुटा नहीं पा रहे हैं. अगर यही प्रदर्शन लखनऊ में होता, तो यहाँ से कहीं ज़्यादा लोग वहाँ जुटते.''

इस पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए आप नेता सौरभ भारद्वाज ने लिखा है, ''राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपनी लोकप्रियता के भरोसे सब कुछ चला रहे हैं. भीड़ दिखाने के लिए उनके पास इंडिया गठबंधन के 300 सांसद हैं. फिर भी, प्रदर्शन अच्छा रहा!''

सौरभ भारद्वाज की इस पोस्ट में खंडन से ज़्यादा तंज़ है.

ऐसे में सौरभ की पोस्ट के जवाब में इंडियन यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस सेवा दल के चीफ़ ऑर्गेनाइज़र श्रीनिवास बीवी ने लिखा, ''सोचिए, कांग्रेस का मज़ाक उड़ाने की कोशिश की और आपके ट्वीट में ही लिख दिया गया: राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के साथ इंडिया गठबंधन के 300 सांसद वहाँ मौजूद थे. सौरभ ने पूरा विपक्ष गिना दिया और अनजाने में यह भी बता दिया कि असल में कौन लड़ रहा है और कौन आराम से बीजेपी की गोद में बैठा है.''

दरअसल, आम आदमी पार्टी ख़ुद को ऐसे पेश करना चाहती है कि बीजेपी का विकल्प वही है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस मानती है कि बीजेपी से वही लड़ रही है.

केजरीवाल जब 2014 में मोदी के ख़िलाफ़ बनारस से चुनाव लड़ने गए थे तो यही संदेश देना था कि मोदी को वही चुनौती दे सकते हैं. लेकिन एक विश्लेषण यह भी है कि विपक्ष बँटा तो फ़ायदा आम आदमी पार्टी को भी नहीं होगा.

सीजेपी
इमेज कैप्शन, राहुल गांधी ने वामपंथी संगठन के छात्र नेताओं से मुलाक़ात की थी लेकिन सीजेपी नेताओं से नहीं मिले थे

सीजेपी और कांग्रेस की असहजता

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ मार्च में इंडिया ब्लॉक के ज़्यादातर घटक दलों ने हिस्सा लिया. हालांकि, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और आम आदमी पार्टी (आप) इससे दूर रहे. डीएमके तमिलनाडु में अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने को लेकर राहुल गांधी से नाराज़ है, वहीं आप के इस फ़ैसले के पीछे कहीं अधिक जटिल और विवादास्पद कारण नज़र आते हैं.

कांग्रेस पार्टी लंबे समय से आप को "बीजेपी की बी-टीम" मानती रही है. यानी कांग्रेस का मानना है कि चुनावी रणनीति के तहत कांग्रेस का विरोध करने से आप को फ़ायदा होता है और इससे बीजेपी मज़बूत होती है.

दिलचस्प बात यह है कि जुलाई में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली सीजेपी ने भी छह अक्तूबर को इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में निकाले गए मार्च में हिस्सा नहीं लिया.

हालांकि सीजेपी ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की है. दरअसल, दिनभर चले घटनाक्रम के दौरान सीजेपी के नेता सोशल मीडिया पर काफ़ी हद तक खामोश रहे और बाद में, सोशल मीडिया पर उनकी चुप्पी की आलोचना बढ़ने के बाद ही उन्होंने सीमित समर्थन जताया.

माना जाता है कि सीजेपी के आप के साथ क़रीबी संबंध हैं. द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक़ उसके 12 सदस्यीय कोर टीम में से छह लोग, जिनमें उसके नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका शामिल हैं, या तो सीधे तौर पर आप से जुड़े रहे हैं या सार्वजनिक रूप से उसका समर्थन कर चुके हैं.

दरअसल, सीजेपी के आप से संभावित संबंधों की आशंका के कारण कांग्रेस जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से दूर रही थी. हालांकि गांधी ने बाद में वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की, लेकिन उन्होंने सीजेपी से दूरी बनाए रखी है.

कांग्रेस

इंडिया ब्लॉक और सीजेपी के बीच कुछ अन्य अहम मतभेद भी हैं.

पाँच अक्तूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि कांग्रेस और उसके इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों की तीन अहम मांगे हैं- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा, एसआईआर को रद्द करना और ईवीएम की जगह बैलेट से मतदान बहाल करना. कांग्रेस चुनावों में सभी दलों के लिए समान अवसर चाहती है.

इस बीच, सीजेपी ने विपक्षी दलों से चुनावों का बहिष्कार करने की अपील की. विपक्ष की ओर से चुनावों का बहिष्कार किए जाने से चुनाव की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं.

हालांकि, इससे बीजेपी को फ़ायदा हो सकता है. बीजेपी चुनाव प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने के लिए कुछ सहयोगी दलों को चुनाव मैदान में उतार सकती है. ऐसे समय में जब बीजेपी के लिए जनसमर्थन घट रहा है और विपक्षी दलों के समर्थन में बढ़ोतरी हो रही है, चुनावों से दूर रहना विपक्ष के हितों को नुक़सान पहुँचा सकता है.

विपक्षी ताक़तों के बीच इस तरह के तीखे मतभेद बीजेपी को हराने के उनके प्रयासों को कमज़ोर ही कर सकते हैं. आने वाले महीनों में बीजेपी इन मतभेदों को और गहरा करने के प्रयास तेज़ कर सकती है. बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने इस बात को रेखांकित भी किया था कि इंडिया ब्लॉक के मार्च में डीएमके और आम आदमी पार्टी शामिल नहीं थी.

सीजेपी और वामपंथी संगठनों ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का आह्वान किया है. क्या इंडिया ब्लॉक उनके प्रयास का समर्थन करेगा? महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने संदेहों को दूर करके उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार होगी?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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