पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की कुल कितनी है सैन्य शक्ति, सबसे ताक़तवर कौन?

    • Author, उमैर सलीमी
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

दुनिया की तीन बड़ी मुस्लिम ताक़तों, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच 'मक्का समझौते' के तहत एक साझा रक्षा गठबंधन बना है.

मक्का समझौते में शामिल तीनों देशों की अपनी-अपनी सैन्य ख़ूबियां हैं.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) के एक विश्लेषण के मुताबिक़, इस समझौते की प्रतीकात्मक अहमियत यह है कि इसमें पाकिस्तान की परमाणु ताक़त, सऊदी अरब की ऊर्जा संपदा और तुर्की का रक्षा उद्योग शामिल है.

हालांकि मक्का समझौते का आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन तीनों देशों का कहना है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.

यह प्रावधान नेटो के अनुच्छेद 5 से मिलता-जुलता है.

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा मतलब यह हो सकता है कि दक्षिण एशिया में युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब और तुर्की को पाकिस्तान की मदद करनी होगी.

वहीं, अगर सीरिया या पूर्वी भूमध्यसागर में इसराइल और तुर्की के बीच संघर्ष होता है, तो पाकिस्तान और सऊदी अरब को भी तुर्की का साथ देना पड़ सकता है.

हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि बाकी देश सीधे युद्ध में उतरें.

वे हथियार, ख़ुफ़िया जानकारी और कूटनीतिक समर्थन देकर भी मदद कर सकते हैं.

मध्य पूर्व मामलों के जानकार स्टीव ए कुक ने 'काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस' के लिए लिखे एक लेख में कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर के 48 घंटे बाद ही इसकी पहली परीक्षा हो गई थी.

हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाज़ान शहर में सऊदी अरामको की एक तेल रिफ़ाइनरी पर हमला किया था.

हालांकि 13 जुलाई से सऊदी अरब लगातार हूती हमलों का सामना करता रहा, लेकिन उसने अपने नए साझेदारों से मदद नहीं मांगी.

स्टीव ए कुक के मुताबिक़, मक्का समझौता मध्य पूर्व की बदलती क्षेत्रीय व्यवस्था का संकेत है.

उनका कहना है कि यह बदलाव अमेरिका की दशकों पुरानी नेतृत्वकारी भूमिका के कमज़ोर होने को भी दिखाता है.

बीबीसी ने इस विश्लेषण में तीनों देशों की थल, वायु और नौसैनिक ताक़त का आकलन किया है.

रक्षा बजट, थल सेना और वायु शक्ति

ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स के मुताबिक़, पाकिस्तान की सेना में लगभग 6 लाख 60 हज़ार सक्रिय सैनिक हैं.

तुर्की में यह संख्या 4 लाख 81 हज़ार है. जबकि सऊदी अरब के पास करीब 2 लाख 47 हज़ार सक्रिय सैनिक हैं.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में सऊदी अरब ने रक्षा पर 83 अरब डॉलर ख़र्च किए. यह दुनिया का आठवां सबसे बड़ा रक्षा बजट है.

तुर्की का रक्षा बजट 30 अरब डॉलर रहा. पाकिस्तान ने 11.9 अरब डॉलर ख़र्च किए.

रक्षा बजट के लिहाज से तुर्की दुनिया में 18वें और पाकिस्तान 31वें स्थान पर है.

पाकिस्तान

पाकिस्तान की सेना को दुनिया की बड़ी थल सेनाओं में गिना जाता है. चीन के साथ उसके रक्षा संबंध लगातार मज़बूत हुए हैं.

आईआईएसएस की रिपोर्ट 'मिलिट्री बैलेंस' के अनुसार, पाकिस्तान के पास 2,570 से ज़्यादा मुख्य युद्धक टैंक और 4,600 से ज़्यादा तोपख़ाना प्रणाली हैं.

उसके प्रमुख टैंकों में अल-ख़ालिद, अल-ख़ालिद-1, अल-ज़रार और टी-80यूडी शामिल हैं.

अल-ख़ालिद और अल-ख़ालिद-1 पाकिस्तान में विकसित किए गए हैं.

वायु सेना के मामले में, 'ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स' पाकिस्तान के पास 331 लड़ाकू विमान बताता है. जबकि मिलिट्री बैलेंस रिपोर्ट के मुताबिक़ युद्धक विमानों की संख्या 465 है.

पाकिस्तान के प्रमुख लड़ाकू विमानों में एफ़-16, जेएफ़-17 थंडर, जे-10सी, मिराज-3 और मिराज-5 शामिल हैं.

हाल के वर्षों में जे-10सी और जेएफ़-17 ब्लॉक-3 के शामिल होने से उसकी हवाई क्षमता बढ़ी है.

मिलिट्री बैलेंस रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवाद विरोधी अभियानों ने पाकिस्तान की सेना और वायु सेना को व्यापक युद्ध अनुभव दिया है.

रिपोर्ट में चीन को पाकिस्तान का "मुख्य रक्षा साझेदार" बताया गया है.

तुर्की

तुर्की नेटो के उन देशों में शामिल है जिनकी थल सेना सबसे बड़ी मानी जाती है. उसके पास 2,300 से ज़्यादा मुख्य युद्धक टैंक और 2,700 से ज़्यादा तोपख़ाना प्रणाली हैं.

मुख्य टैंकों में जर्मन लेपर्ड 2ए4 और एम60टी साबरा शामिल हैं. इसके अलावा तुर्की अपना अल्ताय मुख्य युद्धक टैंक भी विकसित कर रहा है.

पिछले दो दशकों में तुर्की ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर ज़ोर बढ़ाया है.

एएसएलसान, रोकेटसान और टीएआई जैसी बड़ी रक्षा कंपनियां इसमें अहम भूमिका निभाती हैं.

ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स के अनुसार, तुर्की के पास 200 से ज़्यादा लड़ाकू विमान हैं.

मिलिट्री बैलेंस रिपोर्ट के मुताबिक युद्धक विमानों की संख्या 293 है.

उसकी वायु सेना की रीढ़ एफ-16 लड़ाकू विमान हैं.

तुर्की 'कान' नामक पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी लड़ाकू विमान भी विकसित कर रहा है.

तुर्की की सबसे बड़ी ताक़तों में उसके ड्रोन भी शामिल हैं.

बायराक्तर टीबी2, बायराक्तर आकिंजी, अंका और अकसुनगुर जैसे ड्रोन दुनिया भर में चर्चित हैं.

सऊदी अरब

सऊदी अरब की थल सेना, पाकिस्तान और तुर्की की तुलना में छोटी है.

लेकिन उसे आधुनिक पश्चिमी हथियारों से लैस माना जाता है.

उसके पास लगभग 840 से 1,100 मुख्य युद्धक टैंक हैं.

अमेरिकी एम1ए2 अब्राम्स उसका प्रमुख टैंक है.

वायु शक्ति सऊदी अरब की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त मानी जाती है.

उसके पास लगभग 283 लड़ाकू विमान हैं.

मुख्य विमानों में एफ-15एसए, एफ-15सी/डी, यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून और टॉरनेडो आईडीएस शामिल हैं.

सऊदी अरब ने हाल के वर्षों में मिसाइल रक्षा, हवाई निगरानी और ड्रोन क्षमता पर भी बड़ा निवेश किया है.

मिलिट्री बैलेंस की रिपोर्ट के अनुसार, यमन में की गई सैन्य कार्रवाइयों ने सऊदी सशस्त्र बलों को युद्ध का व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर दिया.

हालांकि, इन अभियानों ने सैन्य व्यवस्था और क्षमताओं में मौजूद कई कमियों को भी उजागर किया. इनमें सटीक निशाना लगाने वाली वायु शक्ति का इस्तेमाल, वायु और ज़मीनी बलों के बीच तालमेल, और रसद प्रबंधन जैसी चुनौतियां शामिल हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब की सरज़मीं पर हुए क्रूज़ मिसाइल और ड्रोन हमलों ने देश की वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियों में मौजूद कमज़ोरियों को भी सामने ला दिया.

रियाद ने 2023 में ड्रोन ख़रीदने के लिए तुर्की के साथ एक समझौता किया था.

सऊदी विज़न 2030 के तहत रियाद का लक्ष्य है कि रक्षा क्षेत्र पर होने वाले कुल ख़र्च का 50 प्रतिशत देश के भीतर ही किया जाए.

ड्रोन क्षमता

तीनों देशों ने ड्रोन तकनीक में निवेश बढ़ाया है. पाकिस्तान और सऊदी अरब, दोनों ने तुर्की से ड्रोन ख़रीदे हैं.

पाकिस्तान बुराक, शाहपर और शाहपर-2 जैसे ड्रोन इस्तेमाल करता है. वहीं तुर्की ड्रोन निर्माण में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है.

उसके बायराक्तर और आकिंजी ड्रोन कई संघर्षों में इस्तेमाल हो चुके हैं. सऊदी अरब भी चीनी सीएच-4 और विंग लूंग सीरीज़ के ड्रोन संचालित करता है.

साथ ही वह विज़न 2030 के तहत अपने ड्रोन देश में ही बनाने की कोशिश कर रहा है.

नौसैनिक शक्ति

ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स के अनुसार, तीनों देशों में सबसे बड़ी नौसैनिक ताक़त तुर्की के पास है.

उसके पास 192 नौसैनिक संसाधन हैं.

पाकिस्तान के पास 120 और सऊदी अरब के पास 32 नौसैनिक संसाधन हैं. तुर्की के पास 13 पनडुब्बियां हैं.

वह तीनों देशों में अकेला ऐसा देश है जिसके पास हेलिकॉप्टर कैरियर है. टीसीजी अनादोलु नामक जहाज़ उसकी प्रमुख नौसैनिक क्षमता का हिस्सा है.

पाकिस्तान के पास आठ पनडुब्बियां और 12 फ़्रिगेट हैं. हाल ही में पाकिस्तान की पहली हंगोर श्रेणी की पनडुब्बी कराची पहुंची थी.

यह चीन और पाकिस्तान के रक्षा सहयोग के तहत विकसित की गई है. सऊदी अरब के पास 12 आधुनिक फ़्रिगेट हैं.

हालांकि उसके पास कोई पनडुब्बी नहीं है.

परमाणु क्षमता

इन तीन देशों में सिर्फ़ पाकिस्तान ने परमाणु हथियार होने की आधिकारिक घोषणा की है. तुर्की केवल नेटो की परमाणु साझेदारी व्यवस्था का हिस्सा है.

वहीं सऊदी अरब ने हाल ही में अमेरिका के साथ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए एक असैन्य परमाणु कार्यक्रम का समझौता किया है.

हालांकि, ट्रंप ने इसे अब्राहम समझौते में शामिल होने और इसराइल को मान्यता देने की शर्त बताया था.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की रिपोर्ट "वर्ल्ड न्यूक्लियर फ़ोर्सेज़ 2026" के मुताबिक़, जनवरी 2026 तक पाकिस्तान के पास लगभग 170 परमाणु वॉरहेड थे.

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता के भूमि, वायु और नौसैनिक घटकों से बने "न्यूक्लियर ट्रायड" सिस्टम का धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है.

उसकी ज़मीनी और हवाई परमाणु क्षमताएं मज़बूत हैं, लेकिन समुद्र से परमाणु हमला करने की क्षमता अभी विकास और परीक्षण के चरण में है.

सिपरी के मुताबिक़, नए मिसाइल सिस्टम के विकास और विखंडनीय सामग्री (फ़िसाइल मैटेरियल) के बढ़ते भंडार की वजह से आने वाले वर्षों में पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों की संख्या और बढ़ा सकता है.

रिपोर्ट के अनुसार, परमाणु हथियार ले जाने वाली पाकिस्तान की प्रमुख मिसाइलों में शाहीन-1, शाहीन-2, ग़ौरी, ग़ज़नवी, नस्र और बाबर क्रूज़ मिसाइलें शामिल हैं.

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पाकिस्तान "अबाबील" नाम की एक बैलिस्टिक मिसाइल भी विकसित कर रहा है. इसे कई स्वतंत्र लक्ष्यों पर वार करने वाले वॉरहेड ले जाने के लिए तैयार किया गया है.

हालांकि, सिपरी के अनुसार जनवरी 2026 तक इसके परिचालन तैनाती के कोई सबूत नहीं मिले थे.

पाकिस्तान बाबर-3 समुद्र से दाग़ी जाने वाली क्रूज़ मिसाइल के ज़रिए नौसैनिक परमाणु क्षमता हासिल करने की भी कोशिश कर रहा है.

तुर्की परमाणु हथियार संपन्न देश नहीं है. उसके पास अपना कोई राष्ट्रीय परमाणु हथियार भंडार नहीं है.

हालांकि, वो नेटो की परमाणु साझेदारी व्यवस्था का हिस्सा है. वह गठबंधन के उन कुछ देशों में शामिल है जहां अमेरिका अपने परमाणु बम तैनात करता है.

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के नवीनतम बी61-12 परमाणु बम यूरोप के कई नेटो ठिकानों पर तैनात हैं, जिनमें तुर्की भी शामिल है.

ये हथियार अमेरिका के नियंत्रण में हैं. तुर्की इनका मालिक नहीं है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि एफ़-35 कार्यक्रम और नेटो की परमाणु व्यवस्थाओं में भविष्य में होने वाले बदलावों के संदर्भ में तुर्की की वायु सेना पश्चिमी परमाणु रक्षा ढांचे का हिस्सा बनी हुई है.

लेकिन तुर्की के पास अपने परमाणु वॉरहेड या परमाणु मिसाइलें नहीं हैं.

रिपोर्ट में सऊदी अरब का भी ज़िक्र किया गया है.

इसके अनुसार, सऊदी अरब परमाणु हथियार संपन्न देश नहीं है. उसके पास परमाणु हथियारों या परमाणु वॉरहेड का कोई ज्ञात भंडार नहीं है.

हालांकि, रिपोर्ट में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का उल्लेख किया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 में दोनों देशों ने एक रणनीतिक द्विपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

सिपरी ने कहा कि इस समझौते में सऊदी अरब तक पाकिस्तान की परमाणु क्षमता बढ़ाने की कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई थी.

लेकिन बाद में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा मुहम्मद आसिफ़ के कुछ बयानों ने इस संभावना को लेकर बहस को हवा दी.

रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता सऊदी अरब तक भी बढ़ाई गई है.

फिर भी, इस मुद्दे ने मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

आईआईएसएस के एक विश्लेषण के अनुसार, परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को लेकर पाकिस्तान का अस्पष्ट रुख़ उसके सहयोगी देशों की रणनीतिक स्थिति को मज़बूत करने के मामले में अनिश्चितता पैदा कर सकता है.

सऊदी अरब के पास पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल बल है.

सिपरी के अनुसार, सऊदी अरब ने अतीत में चीन निर्मित डीएफ़-3 बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल की थीं. डीएफ़-21 मिसाइलों की मौजूदगी की ख़बरें भी सामने आई हैं.

लेकिन सऊदी अरब को परमाणु हथियार संपन्न देश नहीं माना जाता. उसकी मौजूदा मिसाइल क्षमता को पारंपरिक रक्षा क्षमता का हिस्सा माना जाता है.

तीनों देशों की रक्षा कमज़ोरियां

स्टिमसन सेंटर के रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डैनियल मार्की ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सऊदी अरब के पास धन और आधुनिक तकनीक तक पहुंच है.

पाकिस्तान के पास बड़ी सैनिक संख्या, युद्ध का अनुभव और परमाणु क्षमता है.

वहीं तुर्की के पास उन्नत रक्षा तकनीक, नेटो की सदस्यता और आधुनिक सेना है.

मार्की के अनुसार, सऊदी सेना की सबसे बड़ी कमज़ोरी प्रशिक्षित मानव संसाधन और संस्थागत मज़बूती की कमी है.

पाकिस्तान को सीमित बजट और संसाधनों की चुनौती का सामना करना पड़ता है.

साथ ही वह भारत और अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों में उलझा रहता है.

तुर्की की अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों तक आसान पहुंच नहीं है क्योंकि उसे एफ़-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया था.

हालांकि मार्की का कहना है कि तीनों देशों की ताक़तें एक-दूसरे की कमज़ोरियों की भरपाई करती हैं.

इसी वजह से यह गठबंधन सामरिक दृष्टि से पूरक नज़र आता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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