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जम्मू-कश्मीर पर सर्जियो गोर के बयान से ख़ुश होना क्या दोधारी तलवार की तरह है?
भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर की जम्मू-कश्मीर की पहली यात्रा की दो बातें ख़ास तौर पर चर्चा में रहीं.
उनका यह कहना कि जम्मू-कश्मीर 'भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा' है और इसके बाद पाकिस्तान की प्रतिक्रिया.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के क़रीबी माने जाने वाले गोर ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह से मुलाक़ात के बाद श्रीनगर में यह टिप्पणी की.
अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी मौजूदा ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है. उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन यह देखेगा कि क्या मौजूदा चेतावनी के लेवल को कम किया जा सकता है.
पाकिस्तान ने बुधवार को अमेरिकी राजदूत की टिप्पणी को लेकर इस्लामाबाद में अमेरिका के चार्ज द'अफेयर्स को तलब किया. बाद में उसके विदेश मंत्रालय ने गोर की टिप्पणी की निंदा करते हुए इसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बताया.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, "जम्मू-कश्मीर संबंधित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और कश्मीरियों की आकांक्षाओं के अनुरूप अंतिम समाधान का इंतज़ार कर रहा है."
सर्जियो गोर के बयान को भारतीय मीडिया ने हाथों-हाथ लिया. भारत में एक तबका इसे अमेरिका के अप्रूवल के रूप में देखने लगा.
सत्ताधारी बीजेपी ने एक्स पर लिखा है, ''सर्जियो गोर ने जम्मू-कश्मीर को भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया. यह एक स्पष्ट संदेश है, जिसे ज़मीन पर स्वीकार किया गया है और दुनिया ने भी मान्यता दी है.''
मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री रहे एमजे अकबर ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर सर्जियो गोर का बयान स्वागत योग्य है और शायद काफ़ी पहले आ जाना चाहिए था. अगर अमेरिकी राजदूत इस्लामाबाद में भी यही बात दोहराते हैं, तो इससे भारत में इस रुख़ के लंबे समय तक बने रहने को लेकर भरोसा और बढ़ेगा."
गोर का बयान कितना अहम है?
एमजे अकबर इस बात से आश्वस्त नहीं हैं कि सर्जियो गोर इस्लामाबाद में भी यही बयान दोहराएंगे. यानी किसी भी देश का राजदूत वहां के सेंटीमेंट का ख़्याल रखता है और बयानों में इसकी झलक मिलती है. इसके बावजूद भारतीय मीडिया में इसे काफ़ी तवज्जो मिली.
येले यूनिवर्सिटी में लेक्चरर सुशांत सिंह मानते हैं कि गोर की टिप्पणी को ज़्यादा तूल नहीं देना चाहिए. उन्होंने एक्स पर लिखा है, ''भारत का जम्मू-कश्मीर पर रुख़ किसी तीसरे पक्ष के नज़रिए पर निर्भर नहीं है. किसी तीसरे देश की ओर से भारत के रुख़ के समर्थन को बहुत ज़्यादा तूल नहीं देना चाहिए. बेहतर है, इसे नज़रअंदाज़ ही किया जाए क्योंकि यह दोधारी तलवार है. अगर उसी देश का कोई और वरिष्ठ नेता बाद में जम्मू-कश्मीर पर अपना रुख़ बदल दे, तो क्या होगा?''
इंटेलेक्चुल प्रॉपर्टी राइट अटॉर्नी और लेखक नवरूप सिंह मानते हैं कि गोर के बयान को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत दी गई. नवरूप सिंह ने लिखा है, ''फिर से, भारतीय मीडिया ने सर्जियो गोर की जम्मू-कश्मीर पर टिप्पणी को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व दिया है. उन्होंने सिर्फ़ इसे भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कहा था. मौजूदा सरकार को ख़ुश करने के लिए शब्दों का खेल करने की कोशिश की जा रही है.''
''राजनयिकों की जम्मू-कश्मीर यात्राओं को भारत सरकार की ओर से उच्चतम स्तर पर मंज़ूरी दी जाती है. इसलिए इस टिप्पणी में ज़रूरत से ज़्यादा अर्थ निकालना बंद करना चाहिए.''
नवरूप सिंह की इस टिप्पणी के जवाब में भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा है, ''इसे शब्दों का खेल या सरकार को ख़ुश करने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. यह संभव है कि उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर टिप्पणी की हो और अमेरिका पाकिस्तान को शांत करने के लिए अपना पारंपरिक रुख़ दोहरा सकता है, ख़ासकर जब पाकिस्तान ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है.''
सिब्बल ने लिखा है, ''दिलचस्प बात यह है कि गोर दक्षिण एशिया के लिए विशेष दूत की भूमिका भी निभाते हैं, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है. जिस तरह पाकिस्तान ने गोर पर तीखा हमला किया है, उसे देखते हुए अब उनके दायित्व का पाकिस्तानी हिस्सा व्यावहारिक रूप से मुश्किल नज़र आता है और यह अच्छी बात है.''
सर्जियो गोर जो बात कह रहे हैं क्या वह अमेरिका का आधिकारिक रुख़ है? क्या कश्मीर पर अमेरिका की नीति बदल रही है?
क्या अमेरिका की नीति बदल रही है?
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया से फेलो माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ''जनवरी में दिल्ली पहुँचने के बाद से गोर का मुख्य लक्ष्य भारत के साथ रिश्तों में सुधार लाना रहा है. उनकी यह टिप्पणी निश्चित रूप से इसमें मदद करेगी. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में अमेरिकी नीति में बदलाव को दर्शाती है?''
''अगर ऐसा है, तो यह कश्मीर पर अमेरिका की वर्षों पुरानी नीति से अलग होगा और पाकिस्तान के साथ तेज़ी से सुधरते अमेरिकी रिश्तों को नुक़सान पहुंचाने का जोखिम भी पैदा करेगा. गोर ने यह भी कहा कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी पर दोबारा विचार करेगा.''
''इसे इस संकेत के तौर पर देखा जा सकता है कि वॉशिंगटन दिल्ली के इस दावे से सहमत है कि कश्मीर अब सामान्य स्थिति में लौट चुका है. यानी वहाँ ज़्यादा शांति और स्थिरता है. ट्रंप के साथ गोर की क़रीबी को देखते हुए उनकी टिप्पणियों का महत्व बढ़ जाता है. हालांकि, यह भी संभव है कि बाद में अमेरिका इन टिप्पणियों से पीछे हट जाए या अपने रुख़ को स्पष्ट करे.''
अमेरिका का पारंपरिक रुख़ यह रहा है कि इस मामले को भारत और पाकिस्तान द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिए सुलझाएं. हाल के समय में पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में सुधार आया है. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में कश्मीर मामले में मध्यस्थता की भूमिका निभाने की पेशकश की थी, जिसे भारत ने ख़ारिज कर दिया था.
भारत ने 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा जब ख़त्म किया था तो पाकिस्तान ने आपत्ति जताई थी. लेकिन भारत ने कहा था कि कश्मीर में उसके उठाए गए क़दम आंतरिक मामला है और पाकिस्तान का इससे कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि दोनों देशों के बीच कश्मीर को बाँटने वाली लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर कोई असर नहीं पड़ा है.
थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन ने अपने एक आर्टिकल में लिखा है, ''अमेरिका में 11 सितंबर के विनाशकारी आतंकवादी हमलों के बाद अक्टूबर 2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बाहर आत्मघाती बम धमाका और दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला हुआ. इन घटनाओं ने शायद हमेशा के लिए खेल के नियम बदल दिए.''
''इन निर्णायक घटनाओं ने दक्षिण एशिया को लेकर क्षेत्र से जुड़े लगभग सभी पक्षों की कई पुरानी धारणाओं और रणनीतिक आकलनों को चुनौती दी और अमेरिका के लिए बदलाव की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाने का एक अवसर पैदा किया.
पाकिस्तान को अमेरिका कैसे देखता है?
नवंबर 2001 में संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपनी सीमाओं के भीतर सक्रिय आतंकवादी संगठनों को लेकर किसी भी देश की ज़िम्मेदारी के लिए बुनियादी नियम स्पष्ट किए. इसमें तटस्थ रहने की कोई गुंजाइश नहीं थी.''
''अमेरिका ने अल-क़ायदा और उसे पनाह देने वाले अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन को निशाना बनाने का फ़ैसला किया. इसके लिए राजनीतिक और सैन्य, दोनों वजहों से पाकिस्तान का सहयोग ज़रूरी था. अमेरिका के "या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे ख़िलाफ़" वाले अल्टीमेटम के सामने मुशर्रफ़ सरकार ने तालिबान से दूरी बनाने और अमेरिका का साथ देने में ज़्यादा समय नहीं लगाया.
इसके बाद से पाकिस्तान ने अमेरिका को महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दी. इसमें अमेरिकी बलों को अपने एयरबेस इस्तेमाल करने और सैनिक तैनात करने की अनुमति देना, ख़फ़िया जानकारी साझा करना और अपनी ज़मीन पर कुछ संयुक्त सैन्य अभियानों की अनुमति देना शामिल था.
11 सितंबर के बाद से पाकिस्तान को कई मुश्किल फ़ैसलों का सामना करना पड़ा. तालिबान के ख़िलाफ़ अमेरिकी सैन्य अभियान में मदद करने को लेकर राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की रणनीति मुख्य रूप से कश्मीर में पाकिस्तान के हितों की रक्षा पर आधारित थी.
1980 के दशक में पहले अफ़ग़ान युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर आंखें मूंद ली थीं. लेकिन 11 सितंबर के बाद की दुनिया में इस्लामाबाद ने ग़लत तरीक़े से यह उम्मीद की कि अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध के दौरान सैन्य और ख़ुफ़िया सहयोग के बदले अमेरिका कश्मीर में उग्रवादी गतिविधियों को उसका समर्थन देगा. मुशर्रफ़ ने 2020 में 12 जनवरी के अपने भाषण में अनिच्छा से यह स्वीकार किया कि पाकिस्तान कश्मीर के नाम पर जिहाद की इजाज़त नहीं देगा.''
मोदी सरकार की कोशिश रही है कि अमेरिका भारत को पाकिस्तान के साथ किसी भी मामले में जोड़कर ना देखे. भारत इस नज़रिए को पसंद नहीं करता, क्योंकि इससे उसकी उस कोशिश को नुक़सान पहुंचता है, जिसमें वह ख़ुद को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति और अमेरिका के अहम इंडो-पैसिफिक साझेदार के रूप में पेश करना चाहता है.
इसके उलट, पाकिस्तान को इससे फ़ायदा होता है, क्योंकि इससे उसकी रणनीतिक अहमियत फिर बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी के ज़रिए भारत की सैन्य कार्रवाई को सीमित किया जा सकता है.
वैश्विक रणनीति में ट्रंप की नीति लेन-देन वाली रही है. ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश और आर्थिक नुक़सान की धमकी जैसे अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल कर भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोकने की कोशिश की है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इससे कोई स्थायी समाधान निकल सकता है या नहीं. भारत बाहरी मध्यस्थता का विरोध करता है, जबकि पाकिस्तान इसे चाहता है.
पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक असामान्य रूप से अपनी पहुँच बनाई है. वर्षों से तनावपूर्ण रहे अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में यह बदलाव मुख्य रूप से पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की पहल के ज़रिए आया है. लेकिन यह सवाल ख़त्म नहीं हुआ है कि गर्मजोशी कितने समय तक टिकेगी. पाकिस्तान चीन से गहराई से जुड़ा हुआ है और दोनों देशों के रणनीतिक हित अब भी अलग हैं.
पाकिस्तान के लिए ट्रंप के साथ बेहतर रिश्ते कूटनीतिक वैधता, संभावित निवेश और चीन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता कम करने का रास्ता खोल सकते हैं. इससे पाकिस्तान को कश्मीर विवाद और अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को अमेरिका में उठाने में भी मदद मिल सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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