मक्का रक्षा समझौता: सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान की नई दोस्ती भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती? - द लेंस

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सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.

इस समझौते पर भारत की भी नज़र है. समझौते का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तीनों देश इसे भविष्य में कैसे लागू करते हैं. साथ ही इस समझौते की असली परीक्षा तब होगी, जब इनमें से किसी एक देश को सैन्य संकट का सामना करना पड़ेगा.

इस्लामी दुनिया का नेता कौन है- सऊदी अरब और तुर्की ख़ुद इसके दावेदार के तौर पर देखे जाते हैं.

तो अगर हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब का संघर्ष फिर बढ़ता है तो क्या तुर्की उसके साथ खड़ा होगा? अगर भारत-पाकिस्तान के बीच दोबारा संघर्ष होता है तो क्या सऊदी अरब पाकिस्तान के समर्थन में भारत के ख़िलाफ़ जाएगा?

इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं. तीनों देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय रिश्ते और रणनीतिक हित हैं.

इस समझौते की सबसे बड़ी ताक़त शायद युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि युद्ध को रोकने की क्षमता है.

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस समझौते पर कहा है कि वह स्थिति पर नज़र रख रहा है.

लेकिन सवाल यही है कि क्या सिर्फ़ नज़र रखना काफ़ी होगा? क्या सऊदी-पाकिस्तान की बढ़ती सुरक्षा साझेदारी भारत के लिए नई रणनीतिक और प्रतिरोधक चुनौती बन सकती है?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम और पूर्व राजदूत महेश सचदेव से बात की.

क्या भारत को इस समझौते से चिंता होनी चाहिए?

पश्चिम एशिया के मामलों पर नज़र रखने वाले पूर्व राजदूत महेश सचदेव मानते हैं कि मक्का समझौते को लेकर भारत की चिंता स्वाभाविक है.

वो कहते हैं, "यह त्रिपक्षीय समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ है और इसकी पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हैं. हालांकि, जारी बयान के मुताबिक़ किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा, जो नेटो के आर्टिकल 5 जैसा है."

उनका मानना है कि भारत-पाकिस्तान के जटिल रिश्तों को देखते हुए यह स्थिति भारत के लिए अहम है. हालांकि उनके मुताबिक़, इस समझौते की धुरी सऊदी अरब की सुरक्षा है और इसे अमेरिका का अप्रत्यक्ष समर्थन भी हासिल माना जा रहा है.

महेश सचदेव कहते हैं, "अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो पाकिस्तान की कोशिश होगी कि तुर्की और सऊदी अरब उसके साथ खड़े हों. लेकिन इन दोनों देशों के लिए यह तय करना आसान नहीं होगा कि वे पाकिस्तान की मदद किस स्तर तक करें. उनके अपने क्षेत्रीय और रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं."

पाकिस्तान के लिए मक्का समझौते की अहमियत बताते हुए महेश सचदेव कहते हैं कि यह उसके लिए रणनीतिक और कूटनीतिक, दोनों लिहाज़ से अहम है.

उनके मुताबिक़, "पाकिस्तान के लिए इसका सबसे बड़ा फ़ायदा मनोवैज्ञानिक है. पाकिस्तान अपने लोगों और भारत को यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी संकट की स्थिति में अकेला नहीं है. पाकिस्तान यह भी संकेत देना चाहता है कि अगर भविष्य में आतंकवाद के मुद्दे पर भारत दोबारा सैन्य कार्रवाई करता है तो सऊदी अरब और तुर्की उसके साथ खड़े हो सकते हैं."

सचदेव का मानना है कि सऊदी अरब के मामले में भारत को चिंता से ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है.

दरअसल, दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक रिश्ते काफ़ी मज़बूत हैं. भारत सऊदी अरब के लिए एक बड़ा बाज़ार है और सऊदी अरब भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है.

वो कहते हैं, "अगर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है तो सऊदी अरब के लिए दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा. वह सैन्य टकराव की स्थिति को रोकने के लिए प्रिवेंटिव डिप्लोमेसी यानी पहले से तनाव कम करने की कोशिश पर ज़ोर दे सकता है."

"अगर भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है तो पाकिस्तान सऊदी अरब से आर्थिक मदद के अलावा हथियार, स्पेयर पार्ट्स और गोला-बारूद जैसी सहायता की उम्मीद कर सकता है."

महेश सचदेव ने कहा कि अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से सैन्य सहयोग है, सऊदी सेना में पाकिस्तानी फ़ौजी और लड़ाकू विमानों की मौजूदगी भी दोनों देशों के रक्षा संबंधों को दिखाती है.

तुर्की के मामले में तस्वीर कुछ अलग है. भारत के साथ उसके रिश्ते सऊदी अरब की तुलना में उतने व्यापक नहीं हैं, जबकि पाकिस्तान के साथ उसके सैन्य और रक्षा संबंध लगातार बढ़ रहे हैं.

क्या भारत को भी ऐसा कोई गठजोड़ बनाना चाहिए?

पूर्व राजदूत महेश सचदेव कहते हैं कि मध्य पूर्व में बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के बीच भारत को भी अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है.

महेश सचदेव के मुताबिक़, "मौजूदा परिस्थितियों में भारत को अपने रणनीतिक साझेदारों और क्षेत्रीय समीकरणों पर ज़्यादा ध्यान देना होगा. भारत के संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ पहले से मज़बूत आर्थिक और सामरिक संबंध हैं."

उन्होंने भारत-इसराइल रिश्तों का भी ज़िक्र किया. उनके मुताबिक़, इसराइल के सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहद अलग और तनावपूर्ण हैं. ऐसे में भारत और इसराइल की नज़दीकी बढ़ने से इन तीनों देशों के साथ भारत के समीकरणों में और तल्ख़ी आ सकती है.

हालांकि, भारत पहले से ही कई देशों के साथ अपना रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है. आर्मेनिया को ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति और पूर्वी एशिया के देशों के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग इस दिशा में अहम है.

महेश सचदेव के मुताबिक़, इन क़दमों से संकेत मिलता है कि भारत भी बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

वह कहते हैं, "पाकिस्तान को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका, रूस और कुछ हद तक चीन के साथ बातचीत ज़रूरी है. इन देशों को यह स्पष्ट करना होगा कि पाकिस्तान जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उससे भारत खुश नहीं है और उन्हें अपने-अपने स्तर पर पाकिस्तान पर प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए."

तुर्की के मुद्दे पर भी पूर्व राजदूत ने इसी तरह की रणनीति अपनाने की ज़रूरत बताई. उन्होंने कहा कि तुर्की पर दबाव बनाने के लिए भारत को यूरोपीय संघ, नेटो और अमेरिका के साथ बातचीत करनी चाहिए.

वहीं, सऊदी अरब को लेकर महेश सचदेव ने कहा कि वहां के नेता अनुभवी हैं और वे इस बात को समझते हैं कि पाकिस्तान के पास ऐसे पर्याप्त विकल्प या 'पत्ते' नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल वह रियाद के साथ अपने संबंधों में भारत के ख़िलाफ़ कर सके.

समझौता कितना व्यावहारिक?

कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम ने मक्का समझौते को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि यह केवल प्रतीकात्मक समझौता नहीं है, बल्कि इसे एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा समझौते के तौर पर देखा जा सकता है.

निरुपमा सुब्रमण्यम ने कहा, "इससे पहले पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता था, लेकिन वह काफ़ी हद तक प्रतीकात्मक साबित हुआ. हाल ही में जब ईरान ने सऊदी अरब को निशाना बनाया, उस दौरान पाकिस्तान की स्थिति ने पुराने समझौते की लिमिटेशन भी सामने ला दी थीं."

उन्होंने कहा, "इसके बावजूद तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ यह नया समझौता अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि तीनों देशों की अपनी-अपनी रणनीतिक ताक़त है. पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, सऊदी अरब के पास आर्थिक ताक़त और तेल संसाधन हैं, जबकि तुर्की नेटो का सदस्य होने के साथ-साथ अपना मज़बूत रक्षा उत्पादन क्षमता रखता है."

तीनों देशों के बीच कॉमन ग्राउंड क्या है?

ऐसा क्या कॉमन ग्राउंड है, जिसके कारण सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान ने साथ आना तय किया?

इसके जवाब में निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं कि तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के रणनीतिक हित भले ही अलग-अलग हों, लेकिन ईरान के साथ हालिया संघर्ष ने तीनों देशों के बीच साझा चिंताएं पैदा की हैं. इन्हीं साझा हितों और क्षेत्रीय असुरक्षा ने तीनों देशों को एक साथ आने का आधार दिया है.

उन्होंने कहा, "ईरान पर हमले और उसके बाद क्षेत्र के दूसरे देशों पर हुए हमलों ने इस क्षेत्र में अमेरिका की सुरक्षा गारंटी को लेकर सवाल खड़े किए हैं."

"सऊदी अरब इस समय ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है. ईरान के साथ उसकी पुरानी दुश्मनी और सुरक्षा संबंधी चिंताएं पहले से मौजूद हैं, ऐसे में हालिया घटनाक्रम ने उसकी चिंता और बढ़ा दी है."

सुब्रमण्यम ने कहा कि इसराइल भी सऊदी अरब के लिए एक चुनौती है, हालांकि दोनों देशों के अमेरिका के साथ अच्छे संबंध हैं. वहीं, तुर्की के इसराइल के साथ अपने अलग विवाद और तनाव हैं, जो ईरान युद्ध के दौरान भी सामने आए.

अमेरिका के लिए क्या संदेश?

सुब्रमण्यम ने कहा कि इस समझौते के ज़रिए यह संकेत देने की कोशिश की जा रही है कि क्षेत्र में अमेरिका के बिना भी एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचा तैयार किया जा सकता है.

साथ ही, यह संदेश ईरान और इसराइल के लिए भी महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा कि तीनों देशों का एक साथ आना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के कुछ देश अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते.

सुब्रमण्यम ने कहा, "अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नेटो सहयोगियों से अपनी सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदारी उठाने की माँग करते रहे हैं. लेकिन अब पश्चिम एशिया में तीन देश ख़ुद यह संदेश दे रहे हैं कि वे अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की सुरक्षा व्यवस्था तैयार करना चाहते हैं."

उनके मुताबिक़, "अमेरिका को क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर के तौर पर अपनी भूमिका को बचाने की कोशिश करनी होगी. हालांकि, ट्रंप के नेतृत्व में यह आसान नहीं होगा. ऐसे में अमेरिका को पश्चिम एशिया में अपनी प्राथमिकताओं और रणनीति पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है."

तुर्की और सऊदी का साथ आना क्यों अहम?

मक्का समझौते में तुर्की और सऊदी अरब का एक साथ आना इस पूरे समझौते का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू है.

उन्होंने कहा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से सैन्य संबंध रहे हैं. मौजूदा रक्षा समझौते से पहले भी पाकिस्तान की सेना की एक यूनिट मक्का और मदीना के प्रमुख धार्मिक स्थलों की सुरक्षा में तैनात रही है. इसलिए दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग कोई नया घटनाक्रम नहीं है.

निरुपमा सुब्रमण्यम के अनुसार, बड़ी बात तो ये है कि सऊदी और तुर्की साथ आ गए. उनका मानना है कि क्षेत्रीय परिस्थितियों में बदलाव ने दोनों देशों को अपने पुराने मतभेदों से आगे बढ़कर इसका हिस्सा बनने के लिए मजबूर किया है.

उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले तक तुर्की और सऊदी अरब के बीच इस बात को लेकर गहरे मतभेद थे कि इस्लामी दुनिया का नेतृत्व किसके हाथ में होना चाहिए. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को सऊदी अरब अपने प्रभाव के लिए चुनौती के तौर पर देखता रहा है.

सुब्रमण्यम ने कहा, "करीब छह-सात साल पहले तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया ने साथ आने की कोशिश की थी. इस पहल से सऊदी अरब काफ़ी नाराज़ हुआ था. इसका असर पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्तों पर भी पड़ा और तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और सऊदी नेतृत्व के बीच तनाव की स्थिति बनी."

उन्होंने कहा कि तुर्की के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकी भी सऊदी अरब की नाराज़गी की एक वजह थी. ऐसे में आज तुर्की और सऊदी अरब का एक ही सुरक्षा समझौते में शामिल होना इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना देता है.

क्या इस समझौते में और देश भी जुड़ेंगे?

निरुपमा सुब्रमण्यम के मुताबिक़, इस नए सुरक्षा गठजोड़ के विस्तार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

बहरीन के अमीर का पाकिस्तान को बधाई देना और वहां की यात्रा की इच्छा जताना इसका संकेत माना जा सकता है.

उनके मुताबिक़, इसके साथ ही क्षेत्र में समानांतर सुरक्षा गठजोड़ भी उभर सकते हैं, जिसमें यूएई, भारत, इसराइल और अमेरिका के बीच मौजूदा रणनीतिक सहयोग आगे बढ़ सकता है.

सुब्रमण्यम का कहना है कि यह समझौता फ़िलहाल भारत के लिए सीधी सैन्य चिंता का विषय नहीं है. हालांकि, भारत को नज़र रखनी होगी कि पाकिस्तान इस गठजोड़ का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ अपनी कूटनीति में किस तरह करता है.

वो कहती हैं कि शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अपने अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों का इस्तेमाल रणनीतिक उद्देश्यों के लिए किया था, इसलिए भारत को इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए मौजूदा समझौते पर नज़र रखनी होगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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