क़तर से भारत की 78 अरब डॉलर की वो डील, जिसकी हो रही है चर्चा

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भारत और क़तर के बीच मंगलवार को एक अहम समझौता हुआ है.

यह समझौता अगले 20 सालों के लिए हुआ है और इसकी कुल लागत 78 अरब डॉलर की है.

भारत क़तर से साल 2048 तक लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) ख़रीदेगा.

भारत की सबसे बड़ी एलएनजी आयात करने वाली कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) ने क़तर की सरकारी कंपनी क़तर एनर्जी के साथ ये समझौता किया है.

इस समझौते के तहत क़तर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा.

इस गैस का इस्तेमाल बिजली, उर्वरक बनाने और इसे सीएनजी में बदलने के लिए किया जाता है.

क्यों ख़ास है ये समझौता

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री हरदीप सिंह पुरी और क़तर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी
इमेज कैप्शन, केंद्रीय ऊर्जा मंत्री हरदीप सिंह पुरी और क़तर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी

गोवा में चल रहे इंडिया एनर्जी वीक 2024 के पहले दिन मंगलवार को ये समझौता किया गया.

इस समझौते को काफ़ी महत्वपूर्ण इस लिहाज़ से भी बताया जा रहा है क्योंकि इसे वर्तमान समझौते से भी काफ़ी कम क़ीमत पर किया गया है.

पेट्रोनेट एलएनजी ने अपने बयान में बताया है कि गैस के आयात को लेकर दोनों देशों के बीच 31 जुलाई 1999 को समझौता हुआ था जो 2028 तक के लिए था.

अब ये सौदा 20 सालों के लिए हुआ है जो 2028 से शुरू होगा. गैस कुल कितनी क़ीमत पर ख़रीदी जाएगी इसको लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि इसकी वर्तमान सौदे से कम क़ीमत होगी.

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक़, इस नए सौदे से अगले 20 सालों के दौरान तक़रीबन 6 अरब डॉलर बचाए जा सकेंगे.

पेट्रोनेट हर साल दो समझौतों के तहत क़तर से 85 लाख टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) एलएनजी आयात करता है.

दोनों देशों के बीच पहला समझौता 25 साल पहले हुआ था जो 2028 तक वैध था.

इसी को 20 साल और बढ़ाकर 2048 तक कर दिया गया है. वहीं एक एमटीपीए के लिए 2015 में दूसरा सौदा हुआ था.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस समझौते पर अलग से बातचीत की जाएगी.

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भारत और क़तर के बीच रिश्ते काफ़ी बेहतर रहे हैं लेकिन बीते कुछ महीनों में दोनों पक्षों के बीच रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं.

क़तर दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी का निर्यातक रहा है लेकिन हाल ही में अमेरिका ने उसे पीछे छोड़ दिया है.

क़तर सालाना 77 एमटीपीए गैस निकालता है, जिसे 2027 तक वो 126 एमटीपीए करना चाहता है ताकि एशिया और यूरोप में अपनी पकड़ मज़बूत कर सके, जहाँ अमेरिका घुसना चाह रहा है.

बीते साल अक्तूबर में क़तर की एक कोर्ट ने नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों को इसराइल के लिए जासूसी करने के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी. दिसंबर के अंत में मौत की सज़ा को घटा दिया गया था.

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और वो साल 2070 तक नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिसमें प्राकृतिक गैस की अहम भूमिका है.

इसी कोशिश के तहत भारत सरकार देश में प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल के शेयर को 6.3 फ़ीसदी से बढ़ाकर 2030 तक 15 फ़ीसदी करना चाहती है.

पेट्रोनेट के सीईओ अक्षय कुमार सिंह कहते हैं कि पेट्रोनेट और क़तर एनर्जी के बीच मौजूदा दीर्घकालिक समझौता भारत के एलएनजी आयात का तक़रीबन 35 फ़ीसदी है और ये राष्ट्रीय महत्व का समझौता है.

उन्होंने कहा कि ये समझौता ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराएगा और साथ ही स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित कराएगा और भारत को अधिक आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करेगा.

कितनी गैस आयात करता है भारत

जहाज़

क़तर के अलावा भारतीय कंपनियों का एलएनजी के लिए ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ क़रार है लेकिन भारत अपने इस्तेमाल की आधे से अधिक एलएनजी केवल क़तर से ही आयात करता है.

भारत के आधिकारिक व्यापार आँकड़ों के मुताबिक़, भारत ने 2022-23 में 19.85 मिलियन टन एलएनजी आयात की थी, जिसमें से तक़रीबन 54 फ़ीसदी 10.74 मिलियन टन क़तर से आई थी.

इसी वित्त वर्ष में क़तर से भारत ने कुल 16.81 अरब डॉलर का आयात किया था, जिसमें से एलएनजी का आयात ही 8.32 अरब डॉलर था जो कि कुल आयात का 49.5 फ़ीसदी था.

डीज़ल और पेट्रोल की तुलना में प्राकृतिक गैस को अधिक स्वच्छ विकल्प माना जाता है जो कि कच्चे तेल से आमतौर पर सस्ता होता है.

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए भारत आयात पर निर्भर है और वो तक़रीबन 85 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात करता है. वहीं प्राकृतिक गैस को देश की ऊर्जा ज़रूरतों में बदलाव के लिए इसे बेहद अहम और मुफ़ीद माना जाता है.

क़तर से कैसे आएगी गैस?

जहाज़

भारत और क़तर के बीच एलएनजी को लेकर ये सौदा एक्स शिप बेसिस (डीईएस) पर हुआ है जो जहाज़ के ज़रिए बंदरगाह पर पहुंचेगी.

1999 में हुआ समझौता फ़्री ऑन बोर्ड (एफ़ओबी) के आधार पर हुआ था जबकि 2028 से शुरू हो रहा सौदा डीईएस के आधार पर है.

ये कहा जा रहा है कि डीईएस के तहत सौदा होने से इसकी लागत कम पड़ रही है क्योंकि एफ़ओबी में गैस ख़रीदने वाला जहाज़ का इंतज़ाम करता है जबकि डीईएस में इसकी ज़िम्मेदारी बेचने वाले पर होती है.

गैस आयात करने वाली भारतीय कंपनी पीएलएल ओएनजीसी, इंडिया ऑयल, गेल और भारत पेट्रोलियम का संयुक्त उपक्रम है.

गुजरात के दहेज में पीएलएल का टर्मिनल है जहां पर जहाज़ से गैस आती है और फिर उसको अलग-अलग पेट्रोलियम कंपनियों में बांटा जाता है.

पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) का कहना है कि क़तर एनर्जी के साथ हुए समझौते से ये सुनिश्चित होगा कि अधिक खपत वाले सेक्टर्स जैसे कि उर्वरक, सिटी गैस डिस्ट्रिब्यूशन, रिफ़ाइनरियों और पावर जनरेशन को लगातार गैस मिलती रहे.

क़तर के ऊर्जा मंत्री और क़तर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी ने मंगलवार को गोवा में इंडिया एनर्जी वीक समारोह से इतर कहा कि वो भारत में अपने मार्केट के लिए मौजूद हैं और उम्मीद है कि इससे अर्थव्यवस्था में विस्तार होगा जो ऊर्जा क्षेत्र की ज़रूरत भी है.

भारत-क़तर के संबंधों में उतार-चढ़ाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और क़तर के अमीर की वर्ष 2015 की मुलाक़ात
इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और क़तर के अमीर की साल 2015 की मुलाक़ात

भारत और क़तर के मित्रतापूर्ण संबंध रहे हैं. लेकिन इस रिश्ते में पहली चुनौती जून 2022 में आई, जब बीजेपी प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने एक टीवी शो में पैगंबर मोहम्मद के बारे में विवादित टिप्पणी की थी.

उस दौरान क़तर पहला देश था, जिसने भारत से ‘सार्वजनिक माफ़ी’ की मांग की. क़तर ने भारतीय राजदूत को बुलाकर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी.

हालांकि बीजेपी ने तुरंत नुपुर शर्मा को बर्खास्त कर दिया था.

इसके बाद आठ पूर्व भारतीय नौसैनिकों की मौत की सज़ा को भारत क़तर रिश्तों को दूसरी बड़ी चुनौती माना जा रहा था. क़तर ने इस सज़ा को भी घटा दिया है.

क़तर में लगभग आठ-नौ लाख भारतीय काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर क़तर भारत को गैस निर्यात करता है. इस लिहाज़ से दोनों देशों के संबंध काफ़ी अहम और मज़बूत भी हैं.

खाड़ी के देशों को लेकर मोदी सरकार की नीति

क़तर

नरेंद्र मोदी पिछले आठ सालों से भारत के प्रधानमंत्री हैं और इस दौरान उन्होंने खाड़ी के इस्लामिक देशों से संबंधों को मज़बूत करने को काफ़ी गंभीरता से लिया है.

पिछले आठ सालों में पीएम मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई का चार बार दौरा किया. पहला दौरा अगस्त 2015 में, दूसरा फ़रवरी 2018 में और तीसरा अगस्त 2019 में.

पीएम मोदी ने चौथा दौरा जून 2022 में किया. जब मोदी ने अगस्त 2015 में यूएई का दौरा किया तो वह पिछले 34 सालों में किसी पहले भारतीय प्रधानमंत्री का दौरा था. मोदी से पहले 1981 में इंदिरा गांधी ने यूएई का दौरा किया था.

पिछले साल 28 जून को पीएम मोदी ने जब अबूधाबी एयरपोर्ट पर लैंड किया तो यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान अगवानी में पहले से ही खड़े थे.

यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान का पीएम मोदी के स्वागत में एयरपोर्ट पर खड़ा रहना प्रोटोकॉल के ख़िलाफ़ था और उन्होंने इसे भारतीय प्रधानमंत्री के लिए तोड़ा था.

पाकिस्तान में मोदी के इस स्वागत की चर्चा काफ़ी हुई थी. भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने कहा था कि मई में पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ़ यूएई गए थे और एक जूनियर मंत्री ने उनकी अगवानी की थी. अब्दुल बासित ने कहा था कि भारत की यह प्रतिष्ठा परेशान करती है.

कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी ने शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान से अप्रत्याशित दोस्ती बनाई है. 2017 में गणतंत्र दिवस के मौक़े पर मोदी सरकार ने मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान को ही चीफ़ गेस्ट के रूप में न्योता दिया था.

तब मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान यूएई के राष्ट्रपति नहीं थे बल्कि अबूधाबी के क्राउन प्रिंस थे. परंपरा के हिसाब से भारत गणतंत्र दिवस पर किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को ही मुख्य अतिथि बनाता था. लेकिन अल नाह्यान 2017 में गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनकर आए थे.

थिंक टैंक कार्नेगी एन्डाउन्मेंट से अबूधाबी में पश्चिम के एक पूर्व राजदूत ने कहा था कि मोदी की व्यावहारिक राजनीति वाला माइंडसेट और एक मज़बूत नेता वाली शैली सऊदी और यूएई के दोनों प्रिंस पसंद करते हैं.

पीएम मोदी ने 2016 और 2019 में सऊदी अरब का दौरा किया था. 2019 में बहरीन और 2018 में ओमान, जॉर्डन, फ़लस्तीनी क्षेत्र का और 2016 में क़तर का दौरा किया था.

पीएम मोदी 2015 में शेख ज़ाएद ग्रैंड मस्जिद और 2018 में ओमान की सुल्तान क़बूस ग्रैंड मस्जिद भी गए थे. नरेंद्र मोदी को सऊदी अरब, यूएई और बहरीन ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा था.

थिंक टैंक कार्नेगी एन्डाउन्मेंट ने अगस्त 2019 की अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था, ''शुरुआत में ऐसा लगा था कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पृष्ठभूमि अरब प्रायद्वीप से संबंधों को आगे बढ़ाने में आड़े आएगी. मोदी हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक हैं.

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