You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बीजेपी की कोर टीम में संदीप पाठक शामिल, राघव चड्ढा को लेकर असमंजस क्यों?
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने ज़िम्मेदारी संभालने के सात महीने बाद बीते सोमवार को नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा की.
इस लिस्ट में राज्यसभा सांसद संदीप पाठक का नाम भी है जो बीते अप्रैल में ही राघव चड्ढा समेत अन्य सांसदों के साथ आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे.
बीजेपी के 16 नए राष्ट्रीय मंत्रियों (नेशनल सेक्रेटरीज़) की सूची में दिल्ली से डॉ. संदीप पाठक का नाम शामिल है. हालांकि बीजेपी की नई टीम में राघव चड्ढा का नाम नहीं होने पर कई लोग हैरानी भी जता रहे हैं.
जब नाम घोषित हुए तो संदीप पाठक ने शीर्ष नेतृत्व का आभार जताते हुए एक्स पर लिखा, "पार्टी की ओर से मुझ पर जताए गए भरोसे और सौंपी गई ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए मैं पूरी निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी के साथ अथक प्रयास करता रहूँगा और इस तरह संगठन को और मज़बूत बनाऊँगा."
संदीप पाठक बीते एक दशक तक आम आदमी पार्टी की कोर टीम में रहे और उन्हें पार्टी का मुख्य चुनावी रणनीतिकार माना जाता था. पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में आम आदमी पार्टी की जीत में उनकी भूमिका अहम मानी जाती रही है.
आम आदमी पार्टी में वो बहुत अहम पद पर रहे- राजनीतिक मामलों की कमेटी के जनरल सेक्रेटरी. बीजेपी में शामिल होने के बाद भी उन्हें एक अहम ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राष्ट्रीय मंत्री बनाकर बीजेपी ने उनकी काबिलियत पर भरोसा जताया है.
संदीप पाठक को क्यों मिला अहम पद
बीते अप्रैल में राघव चड्ढा ने एलान किया था कि 'राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया है.'
अप्रैल की शुरुआत में ही आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर की ज़िम्मेदारी राघव चड्ढा की जगह अशोक कुमार मित्तल को दे दी थी. हैरानी तब हुई जब राघव चड्ढा के साथ जो सात सांसद पार्टी से अलग हुए उनमें अशोक कुमार मित्तल का नाम भी था.
लेकिन आम आदमी पार्टी को सबसे बड़ा झटका संदीप पाठक के पाला बदलने को माना गया क्योंकि पार्टी की चुनावी रणनीति का उन्हें 'दिमाग' माना जाता था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संदीप पाठक बीजेपी के लिए सबसे कारगर व्यक्ति हो सकते हैं और इसका अंदाज़ा शीर्ष नेतृत्व को पहले से रहा होगा.
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "संदीप पाठक की सबसे बड़ी ख़ासियत है कि वो पर्दे के पीछे रहकर संगठन का काम बखूबी करते हैं. एक ज़माने में वो आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे नंबर के नेता बन गए थे. क्योंकि उन्होंने संगठन को बहुत क़ायदे से समझा और केजरीवाल के विज़न को पंजाब में लागू किया और दूसरी जगहों पर भी कोशिशें कीं."
वो कहते हैं, "उनकी इस क़ाबिलियत की वजह से ही बीजेपी ने उन्हें संगठन के काम में अहम ज़िम्मेदारी दी."
लेकिन एक और ख़ासियत है जो संदीप पाठक की दावेदारी को और मजबूत बनाती है और वो है ज़मीन पर जनता की नब्ज़ को पहचानने की क्षमता.
कहा जाता है कि हाल ही में हुए बिहार के बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में एक बार के दौरे में संदीप पाठक ने बीजेपी उम्मीदवार के हारने की आशंका ज़ाहिर की थी.
आशुतोष कहते हैं, "बांकीपुर की बात तो अभी हाल की बताई जा रही है लेकिन एक वाक़या मुझे याद है, जिसका मैं गवाह रहा हूं. उस समय मैं आम आदमी पार्टी में था. साल 2017 में पंजाब का विधानसभा चुनाव था और पार्टी मान बैठी थी कि वो जीतने वाली है और उसे 80 से 90 सीटें मिलने वाली हैं. तमाम ओपिनियन पोल्स भी इसी ओर इशारा कर रहे थे. उस समय संदीप पाठक ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर चेतावनी दी थी कि पार्टी चुनाव नहीं जीतने जा रही है."
"इससे आम आदमी पार्टी में काफ़ी बेचैनी पैदा हुई लेकिन जब नतीजे आए और उनकी बात सच साबित हुई उसके बाद संदीप पाठक का पार्टी के अंदर तेज़ी से उभार हुआ. बाद में वो पंजाब के इंचार्ज भी बने और वहां संगठन मजबूत करने का काम किया."
हालांकि कई लोग ये भी आशंका जता रहे हैं कि जिस व्यक्ति ने एक ऐसी पार्टी के ख़िलाफ़ 10 साल तक राजनीति की और अब उसी में शामिल हो गया तो क्या ज़मीनी स्तर पर किए गए काम, संगठनात्मक ढांचा और लोगों में स्वीकार्यता पहले जैसी रह पाएगी?
लेकिन आशुतोष का कहना है कि आज के समय में पार्टी बदलने में विचारधारा का कोई वैसा रोल नहीं रहा. ज़मीन पर भी इसका बहुत असर नहीं दिखता, वरना दलबदलू नेताओं का अस्तित्व ख़त्म हो जाता.
वो कहते हैं, "वैसे भी संदीप पाठक विचारधारा की वजह से नहीं जाने जाते. वो आईआईटी दिल्ली में प्रोफ़ेसर थे, ऑक्सफ़ोर्ड-कैंब्रिज में पढ़ाई की थी. वो मुख्य रूप से साइंस के आदमी हैं और जैसा कि ऐसे लोगों की ख़ासियत होती है कि अगर प्रोजेक्ट दे दीजिए तो वो पूरी ताक़त के साथ उसे पूरा कर देंगे. और दूसरी बात कि वो बेहद ईमानदार हैं, उन पर किसी तरह का दाग नहीं लगा और आज भी वो साधारण मिडिल क्लास के परिवार की तरह रहते हैं."
इस बात की तस्दीक खुद संदीप पाठक ने 2022 के एक इंटरव्यू में की थी. उन्होंने कहा था कि उनका दिमाग 'एक वैज्ञानिक की तरह काम करता है न कि एक राजनेता की तरह.'
आशुतोष कहते हैं, "बीजेपी अन्य पार्टियों की तरह नहीं है वह एक संगठन है और संदीप पाठक का स्वभाव भी मूलतः सांगठनिक है. तो यह एक अच्छा कॉम्बिनेशन हो सकता है."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा का भी यही मानना है कि संदीप पाठक की क़ाबिलियत उन्हें बीजेपी के लिए अधिक उपयोगी बनाती है.
लेकिन राघव चड्ढा को अभी तक कोई अहम ज़िम्मेदारी नहीं मिली है, जिनके नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के दो तिहाई राज्यसभा सांसद निकल कर बीजेपी में चले गए थे.
हालांकि दोनों ही लोगों का मानना है कि भविष्य में राघव चड्ढा को कोई अहम ज़िम्मेदारी मिल भी सकती है, लेकिन अभी बीजेपी के सामने ही सवाल है कि राघव चड्ढा की क्या उपयोगिता हो सकती है.
राघव चड्ढा को मिलेगी कोई अहम ज़िम्मेदारी?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी के अपने अंतिम दिनों में एक विवादास्पद चेहरा बन गए थे. जिस तरह के वो राज्यसभा में मुद्दे उठाते थे, उससे भी एक किस्म का संकेत मिलने लगा था."
दरअसल राघव चड्ढा का नाम दिल्ली जल बोर्ड में कथित घोटाले में आया था और बीजेपी में शामिल होने से पहले बीजेपी के कई नेताओं ने उनकी गिरफ़्तारी की मांग की थी.
मंगलवार को दिल्ली जल बोर्ड के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) प्रोजेक्ट्स की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार किया गया. उनके साथ चार अन्य अभियुक्तों को 14 दिन के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया.
कोर्ट में पेश होने जाते समय सत्येंद्र जैन ने पत्रकारों से कहा, "ये सब आगामी पंजाब चुनाव के चलते हो रहा है."
इसके बाद आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा पर निशाना साधा.
आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा, "ये मामला उस समय का है जब सत्येंद्र जैन पहले ही एक अन्य मामले में जेल में बंद थे. और उस समय दिल्ली बीजेपी कहती थी कि राघव चड्ढा ने राजेंद्र नगर की कुर्सी पर बैठकर जल बोर्ड घोटाले को अंजाम दिया. तो क्या वहां एसीबी (एंटी-करप्शन ब्रांच) गई?"
विनोद शर्मा कहते हैं, "अभी पंजाब का विधानसभा चुनाव आने वाला है. अगर बीजेपी राघव चड्ढा को कोई अहम ज़िम्मेदारी देती है ख़ासकर पंजाब में तो आम आदमी पार्टी इसे ही एक मुद्दा बना देगी. और लगातार अटैक करेगी. पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्तारूढ़ पार्टी है और उसे बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल जाएगा."
दरअसल, जब बाकी सांसदों के साथ राघव चढ्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़ी तो पंजाब में 'आप' ने विश्वासघात का आरोप लगाया और उन सांसदों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.
विनोद शर्मा कहते हैं, "उनकी राजनीति यूटेलिटेरियन (उपयोगितावादी) है. लेकिन राघव चड्ढा की उपयोगिता बहुत सीमित हो गई है, बल्कि ख़त्म ही हो गई है. मैं ग़लत हो सकता हूं लेकिन मुझे लगता है कि राज्यसभा का कार्यकाल ख़त्म होने के साथ ही राघव चड्ढा की राजनीति भी ढल जाएगी."
हालांकि मीडिया के कुछ हिस्सों में ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि राघव चड्ढा को केंद्र में कैबिनेट फेरबदल के दौरान कोई जगह दी जा सकती है.
लेकिन विनोद शर्मा कहते हैं, "अगर ऐसा होता है तो पंजाब में उसी सरकार के ख़िलाफ़ प्रचार करेंगे जिसके वो कई साल तक हिस्सा रहे और पर्दे के पीछे से भी काम करते रहे. वहां सभी लोग उन्हें जानते हैं."
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का कहना है कि राघव चड्ढा के राजनीतिक भविष्य के बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है, "संदीप पाठक की तरह वो भी युवा हैं. हो सकता है कि उन्हें भी कोई ज़िम्मेदारी मिल ही जाए."
बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में फेरबदल के क्या मायने हैं?
बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में बड़ा फेरबदल किया गया है. नई टीम में कम से कम पांच पुराने जनरल सेक्रेटरीज़ को जगह नहीं मिली.
पार्टी के आईटी और सोशल मीडिया विभाग में बड़ा बदलाव किया गया और क़रीब 11 साल तक इस ज़िम्मेदारी को संभालने वाले अमित मालवीय को हटा कर उनकी जगह दीपक म्हस्के को ज़िम्मेदारी दी गई.
हालांकि सोशल मीडिया टीम में बदलाव को कई विश्लेषकों ने हाल ही में हुए जेन ज़ी प्रदर्शनों के बाद इसे पार्टी की डिज़िटल रणनीति में बदलाव के तौर पर देखा.
उत्तर प्रदेश से शामिल किए गए चेहरों को लेकर भी काफ़ी चर्चा है. यूपी की टीम में 10 नामों में से दो नामों की काफ़ी चर्चा है एक पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और दूसरे महाराष्ट्र से आने वाले प्रभावशाली नेता विनोद तावड़े. इसे आगामी यूपी विधानसभा चुनाव की रणनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है.
पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की वापसी इस बार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर हुई है. 2020 में उन्हें महासचिव के पद से हटाया गया था.
लेकिन टीम में बदलाव को लेकर राजनीतिक विश्लेषक बहुत आशान्वित नहीं दिखाई देते.
आशुतोष का कहना है कि टीम में फेरबदल से कोई आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए, "क्योंकि पार्टी सिर्फ़ दो लोग चलाते हैं. पीएम मोदी का विज़न और अमित शाह की रणनीति और संगठन क्षमता."
"नितिन नबीन की असल परीक्षा ये होगी कि वो पीएम मोदी के विज़न और अमित शाह के बताए संगठन के कामों को अक्षरशः कर पाते हैं या नहीं."
आशुतोष के अनुसार, "पांच राष्ट्रीय महासचिव थे, जिन्हें ड्रॉप किया गया. क्या किसी को उनका नाम याद है? आडवाणी और बाजपेयी के ज़माने में क्षेत्रीय नेताओं को आगे बढ़ाया गया था. बहुत स्टालवर्ट नेता हुए जिनके अंदर चुनाव जिताने की क्षमता थी. आज राज्यों में वैसा नेतृत्व नहीं दिखाई देता है. और यही आशंका है कि पार्टी अचानक बैठ भी सकती है."
विनोद शर्मा उनकी बात से सहमत नज़र आते हैं. वो कहते हैं, "आप टीम को बदल कर कप्तानी नहीं सुधार सकते."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.