मच्छर भगाने वाले धुएं से जान को ख़तरा है या नहीं?

    • Author, ज़ेवियर सेल्वाकुमार
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तमिल
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

तमिलनाडु स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कोयंबटूर जिले के अन्नूर में मच्छर भगाने वाली दवा के धुएं से दो लोगों की मौत की खबर सामने आने के बाद मौके पर जाकर जांच की.

हालांकि दोनों की तबीयत पहले से खराब थी, लेकिन कई लोगों ने उनकी अचानक हुई मौत के लिए घरों में इस्तेमाल किए गए धुएं को वजह बताया है. दोनों परिवारों ने इन मौतों को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई है.

जांच करने वाले नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी और ज़िला स्वास्थ्य विभाग के उप निदेशक ने बीबीसी को बताया कि दोनों व्यक्ति गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज करा रहे थे और उनकी मौत धुएं से नहीं हुई.

मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि इस दवा का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा सावधानियों का पालन करना ज़रूरी है, क्योंकि मच्छर भगाने वाली दवा में मिलाया जाने वाला रसायन फेफड़ों की समस्या वाले लोगों के लिए ख़तरनाक हो सकता है.

खबरों के मुताबिक, कोयंबटूर जिले की अन्नूर नगर पंचायत के तहत आने वाले सत्यमंगलम सड़क उप्पथोट्टम इलाके में पिछले एक सप्ताह में 3 बच्चे डेंगू से संक्रमित हुए. इसके बाद नगर पंचायत प्रशासन ने अभियान शुरू किया. 11 तारीख़ को कई हिस्सों में मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव किया गया.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी कार्तिकेयन की निगरानी में जब नगर पंचायत के अधिकारियों ने मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव किया, तो कुछ इलाकों के निवासियों ने उनसे कहा कि इस तरह धुआं न करें जिससे वह घरों के अंदर चला जाए.

लेकिन अधिकारियों ने लोगों की बात नहीं मानी और इसके बजाय घरों के अंदर भी चले गए और दरवाजे खुले होने के बावजूद दवा का छिड़काव किया.

इसके बाद कुछ ही घंटों के भीतर ख़बर फैल गई कि इलाके के एक ऑटो चालक मोहन (65) और उसी वार्ड के दूसरे इलाके में रहने वाली प्रेमा उर्फ रानी (75) की मौत हो गई.

दोनों की लगातार कुछ ही समय के अंतराल में मौत होने के कारण इलाके के कई लोगों ने मीडिया से कहा कि उनकी मौत की वजह अत्यधिक मात्रा में कीटनाशक मिलाकर इस्तेमाल की गई मच्छर भगाने वाली दवा और घना धुआं था.

मृतक मोहन के परिवार के कुछ सदस्यों ने कहा था कि घर के अंदर कीटनाशक का छिड़काव न करने के लिए कहे जाने के बावजूद अत्यधिक मात्रा में पाइरेथ्रम कीटनाशक का छिड़काव किए जाने से दम घुटने से उनकी मौत हुई.

लेकिन शहर परिषद और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने इसका खंडन किया. इसके बाद मृतकों के परिवारों ने कहा कि ख़राब स्वास्थ्य के कारण उनकी प्राकृतिक मौत हुई.

पूर्व स्थानीय पार्षद शेखर ने आरोप लगाया कि अधिकारियों के डर से उन्होंने अपने बयान बदल दिए.

बीबीसी से बात करते हुए ऑटो चालक मोहन के रिश्तेदार महेंद्रन ने कहा, "यह सच है कि मेरे भाई मोहन की तबीयत पहले से ख़राब थी. लेकिन यह घटना तभी हुई जब वह अस्पताल में अपना इलाज पूरा कराने के बाद घर लौटे. घर के अंदर धुआं जाने से रोकने के लिए उन्होंने सामने का दरवाजा बंद कर दिया था और कहा था कि घर में एक मरीज है. लेकिन जब वह पीछे खुले दरवाजे के पास आए और वहां धुआं किया गया, तो धुआं पूरे घर में फैल गया."

महेंद्रन ने कहा, "एक तरफ का दरवाजा बंद था, इसलिए घर में गया धुआं बाहर नहीं निकल सका और अंदर मौजूद लोगों का दम घुटने लगा. हो सकता है कि इस धुएं से स्वस्थ लोगों का हल्का दम घुटा हो, लेकिन जिन लोगों की तबीयत ख़राब थी, उन पर इसका असर निश्चित रूप से हुआ होगा. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यही एकमात्र वजह थी."

बीबीसी तमिल से उसी वार्ड में उसी दिन मरने वाली प्रेमा उर्फ रानी के घर के पास रहने वाले प्रेमदेवा ने बताया, "उनका पहले से ही एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था और उन्हें घर लाया गया था. उनकी हालत गंभीर थी और कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई."

प्रेमदेवा ने कहा, "उन्हें पहले से अस्थमा की समस्या थी. लेकिन हमें नहीं पता कि मच्छर भगाने वाली दवा और उनकी मौत के बीच कोई संबंध है या नहीं. क्योंकि हमारे इलाके में बहुत से बुजुर्ग और बच्चे हैं. उनमें से किसी को कोई परेशानी नहीं हुई. इसलिए हमें नहीं लगता कि उनकी मौत की वजह मच्छर भगाने वाली दवा थी. इसी वजह से उनके परिवार ने बिना कोई शिकायत किए उन्हें कब्रिस्तान में दफ़ना दिया."

अधिकारियों की जांच में क्या पता चला

मोहन के परिवार ने भी पुलिस या किसी अन्य जगह शिकायत दर्ज किए बिना उनका अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने कहा कि इन दोनों मौतों को लेकर अन्नूर पुलिस थाने में कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है.

हालांकि, मीडिया में प्रकाशित जानकारी के आधार पर बताया गया कि ज़िला प्रशासन ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया है.

अन्नूर के 7वें वार्ड के पूर्व पार्षद शेखर ने बीबीसी से कहा, "शहर के अधिकारी लोगों की बात नहीं सुनते. हमारे वार्ड में कई लोग अपने घरों के अंदर चले गए और मना किए जाने के बावजूद कीटनाशक का छिड़काव किया."

पूर्व पार्षद शेखर ने कहा, "जब एक इलाके में घरों के अंदर मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव किया गया, तो इलाके की महिलाओं ने विरोध किया. इसके बाद वे वहां से निकलकर दूसरे इलाके में गए और वहीं छिड़काव किया. वहां स्थिति और भी खराब थी. प्रेमा, जिन्हें पहले से अस्थमा था, छिड़काव के आधे घंटे के भीतर मर गईं."

"उनके परिवार ने शुरुआत में मीडिया से इस बारे में बात की थी, लेकिन बाद में शिकायत और कानूनी कार्रवाई के डर से पीछे हट गए. ज़िला प्रशासन को इसकी जांच करनी चाहिए और नगर परिषद के अधिकारियों के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई करनी चाहिए."

अन्नूर नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी कार्तिकेयन ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए बीबीसी को बताया, "हमें पिछले महीने उस इलाके में तीन लोगों के डेंगू से संक्रमित होने की ख़बर मिली थी. इलाके के लोगों ने हमसे मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव करने का अनुरोध किया था."

"इसलिए हमने सड़कों पर इसका छिड़काव किया. हमने किसी भी घर के अंदर धुआं नहीं किया. लेकिन यह संभव है कि जिन घरों के दरवाजे और खिड़कियां खुली थीं, उनमें धुआं चला गया हो."

उन्होंने कहा, "यह दावा भी सही नहीं है कि इसमें अत्यधिक मात्रा में कीटनाशक मिलाया गया था और यह जानकारी भी सही नहीं है कि कीटनाशक पुराना था. नगर पंचायतों के सहायक निदेशक और स्वास्थ्य विभाग के उप निदेशक यहां आकर इसकी जांच कर चुके हैं. कीटनाशक की वैधता अगस्त 2027 तक है. कीटनाशक को उचित मात्रा में ही मिलाया गया था. एक ही सड़क पर 200 घरों के सामने इसका छिड़काव किए जाने के बावजूद किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ."

उन्होंने कहा कि ऑटो चालक मोहन और प्रेमा दोनों का उसी निजी अस्पताल में इलाज हुआ था और डॉक्टरों ने प्रमाणित किया था कि मोहन को हार्ट फेलियर और प्रेमा को फेफड़ों की बीमारी और अस्थमा था.

नगर पंचायतों के सहायक निदेशक अबू बकर ने भी मीडिया से यही बात कही. कोयंबटूर ज़िला स्वास्थ्य विभाग के उप निदेशक बालुसामी और जोनल एंटोमोलॉजिस्ट (प्रभारी) शिवकुमार समेत स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ज़िला प्रशासन के आदेश पर अन्नूर में अपनी जांच पूरी करके लौट चुके हैं.

डॉ. बालुसामी ने बीबीसी को बताया, "हमारी जांच में सामने आया कि मोहन को लिवर फ़ेलियर था. उनके फेफड़ों में तरल पदार्थ जमा होने का भी इलाज किया गया था. डॉक्टरों ने कहा था कि उनकी हालत गंभीर थी और उन्हें घर लाया गया था."

बालुसामी ने कहा, "रानी को सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज़) नाम की फेफड़ों की बीमारी थी. वह घर पर सीपीएपी (कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) वेंटिलेटर पर भी थीं. उस सुबह जब नगर परिषद के कर्मचारी सुबह 7 बजे मच्छर भगाने वाली दवा लगाने आए, तो परिवार के सदस्यों ने उन्हें ऐसा न करने के लिए कहा और वे चले गए."

"दवा का छिड़काव सड़क पर किया गया था. उनकी मौत और मच्छर भगाने वाली दवा का इस्तेमाल संयोग से एक ही समय पर हुआ और दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है. हमने यह भी पुष्टि की है कि दवा की कोई अतिरिक्त मात्रा नहीं मिलाई गई थी. जल्द ही ज़िला प्रशासन को रिपोर्ट सौंप दी जाएगी."

भारत के राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम ने डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए फ्यूमिगेशन की सिफारिश की है.

अध्ययनों से पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन खुले इलाकों में छिड़काव के लिए मैलाथियान जैसे अलग-अलग कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अध्ययन के मुताबिक, मैलाथियान मानव निर्मित ऑर्गेनोफॉस्फेट कीटनाशक है.

मच्छर भगाने वाली दवा में क्या होता है?

हालांकि मच्छर भगाने वाली दवा के धुएं से मौत होने की कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनरल प्रैक्टिशनर आदित्यन कुगन सलाह देते हैं कि इसका इस्तेमाल करते समय सभी को सुरक्षा सावधानियों का पालन करना चाहिए.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारे देश में बारिश के मौसम में मच्छरों को मारने के लिए केरोसिन या डीजल में पाइरेथ्रॉइड और मैलाथियान कीटनाशक मिलाकर फॉगिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है. यह धुआं रसायनों से दूषित हवा के रूप में फैलता है."

"इसलिए अगर फेफड़ों की समस्या वाले लोग, अस्थमा के मरीज और बुजुर्ग इस धुएं को ज्यादा मात्रा में सांस के जरिए अंदर लेते हैं, तो फेफड़े काम करना बंद कर सकते हैं."

डॉ. आदित्यन कुगन ने कहा कि मच्छर भगाने वाले धुएं को अत्यधिक मात्रा में सांस के जरिए अंदर लेने से तंत्रिका तंत्र को नुकसान, सिरदर्द और कंपकंपी हो सकती है.

उन्होंने कहा कि अध्ययनों से पता चला है कि कुछ लोगों को बहुत ज्यादा धुआं सांस के जरिए अंदर लेने पर दौरे तक पड़ सकते हैं. उन्होंने कहा कि जिन लोगों को पहले से बुखार है और जो कैंसर के लिए कीमोथेरेपी करा रहे हैं, वे इसके असर के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं.

उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि अन्नूर में मृतकों में से एक को निमोनिया था. अगर उनका ऑक्सीजन स्तर पहले से 85-88 है और वे इस धुएं को सांस के जरिए अंदर लेते हैं, तो इससे निश्चित रूप से बहुत नुकसान होगा."

"पश्चिमी देशों में इस मच्छर भगाने वाली दवा को इसी उद्देश्य के लिए एक विशेष मिश्रण के साथ मिलाया जाता है. यहां जब केरोसिन को डीजल में मिलाया जाता है, तो इसकी गंध भी सांस लेने में ज्यादा मुश्किल पैदा करती है. केरोसिन की गंध का असर तंत्रिका तंत्र पर भी पड़ता है."

बचाव के लिए क्या करना चाहिए?

डॉक्टरों और अध्ययनों के मुताबिक, मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव करते समय अपनाई जाने वाली सुरक्षा सावधानियां हैं:

  • मच्छर भगाने वाली दवा के छिड़काव का समय पहले से बताया जाना चाहिए.
  • मच्छर भगाने वाली दवा का इस्तेमाल केवल खुले में किया जाना चाहिए. इसका इस्तेमाल घर के अंदर नहीं होना चाहिए.
  • सड़कों पर मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव करते समय घरों के दरवाजे और खिड़कियां बंद रखनी चाहिए.
  • छिड़काव के दौरान सभी को मास्क पहनना चाहिए और सड़कों पर नहीं चलना चाहिए.
  • खाने-पीने की चीजों को हटाकर अच्छी तरह ढक देना चाहिए.
  • उस दौरान बच्चों को बाहर खेलने नहीं देना चाहिए. उन्हें आधे घंटे बाद ही बाहर भेजना चाहिए.

पर्यावरण शोधकर्ता स्वाति आर. अय्यर अपने शोधपत्र में कहती हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बार-बार बताया है कि मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला धुआं इंसानों को कोई महत्वपूर्ण नुकसान नहीं पहुंचाता.

उनका कहना है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक की मात्रा बहुत कम होती है और इसे इतनी कम मात्रा में फैलाया जाता है कि यह केवल मच्छरों जैसे बहुत छोटे जीवों को मार सके.

वहीं, मुंबई की पल्मोनोलॉजिस्ट और महामारी विशेषज्ञ डॉ. लैंसलॉट पिंटो का कहना है कि इस धुएं को सांस के जरिए अंदर लेना कुछ लोगों के लिए नुकसानदेह हो सकता है और चिंताजनक लक्षण पैदा कर सकता है.

डॉ. पिंटो का कहना है कि जिन लोगों को पहले से फेफड़ों की समस्या है, उनके लिए स्थिति और खराब हो सकती है.

डॉ. पिंटो बताते हैं कि पहले के अध्ययनों से पता चला है कि स्टेज और मनोरंजन उद्योगों में काम करने वाले लोग, जो लगातार धुंध और धुएं के उच्च स्तर के संपर्क में रहते हैं, उनमें लंबे समय तक सांस से जुड़ी समस्याएं भी विकसित होती हैं.

उनका कहना है कि वे जिस मात्रा में धुआं सांस के जरिए अंदर लेते हैं, वह इतनी ज्यादा होती है कि नुकसान पहुंचा सकती है.

बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में सेंटर फॉर पल्मोनरी एंड स्लीप डिसऑर्डर्स के संस्थापक निदेशक और पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख रवींद्र मेहता का कहना है कि फेफड़ों की समस्या और एलर्जी वाले लोगों में मच्छर भगाने वाले धुएं के संपर्क में आने के बाद उनके लक्षण बढ़ सकते हैं.

उनका कहना है कि भले ही एक बार का संपर्क गंभीर न हो, लेकिन लंबे समय तक बार-बार इसके संपर्क में आने पर यह नुकसानदेह हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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