सूरत के कुछ कारखानों में बिना वीकली ऑफ़ 12 घंटे काम, मज़दूरों ने उठाई आवाज़

    • Author, अजीत गढ़वी
    • पदनाम, बीबीसी संवददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सूरत के अमरोली इलाके में कीचड़ से भरी सड़कों से गुजरकर कई औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंचा जा सकता है, जहां बड़ी संख्या में कढ़ाई (एम्ब्रॉयडरी) का काम करने वाले कारखाने हैं.

16 अगस्त को यह इलाका तब सुर्ख़ियों में आया जब वहां कढ़ाई कारखानों में काम करने वाले हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर आए.

मज़दूरो का कहना था कि वे दिन में 12 घंटे काम करते हैं और उन्हें हफ्ते में एक भी दिन की छुट्टी नहीं मिलती.

उनकी मांग है कि उन्हें रविवार को छुट्टी दी जानी चाहिए और छुट्टी के लिए उनके वेतन में कटौती नहीं की जानी चाहिए. मज़दूर ये भी चाहते हैं कि उनके काम के घंटे 12 से घटाकर आठ कर दिए जाने चाहिए.

अब 24 अगस्त को उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ लेबर कमिश्नर की बैठक होगी. इस बैठक के दौरान मज़दूरों की मांगों पर फ़ैसला हो सकता है.

इससे पहले 18 अगस्त को प्रदर्शनकारियों ने लेबर कमिश्नर से मुलाक़ात की थी. फ़िलहाल प्रदर्शन थम गए हैं और मज़दूर काम पर लौट आए हैं.

क्या है विवाद?

सूरत में कढ़ाई का उद्योग भी खूब फलता-फूलता है. यह एक प्रकार का श्रम-आधारित काम है जिसमें व्यापारियों से कपड़ा लाया जाता है, उस पर कढ़ाई की जाती है और फिर वापस कर दिया जाता है.

इस उद्योग में काम करने वाले मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से हैं. इनमें से कई मज़दूरों का कहना है कि वो हर महीने लगभग 25,000 रुपये से 35,000 रुपये के बीच कमाते हैं.

इसके अलावा, टारगेट पूरा करने पर उन्हें बोनस भी दिया जाता है.

हाल ही में कुछ सोशल मीडिया साइट्स पर ऐसे पोस्ट शेयर किए जाने लगे जिसमें लिखा था कि सप्ताह में एक छुट्टी और बोनस के मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन होंगे और फैक्ट्रियां बंद रहेंगी.

फिर 16 अगस्त को अमरोली के औद्योगिक क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. हज़ारों श्रमिकों ने काम बंद कर दिया और नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए.

अमरोली स्थित वेदांता इंडस्ट्रियल एस्टेट में काम करने वाले रंजन चंद्रवंशी नामक एक मजदूर ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया कि वो लोग अरसे से सप्ताह में एक दिन की छुट्टी की मांग कर रहे हैं, लेकिन फैक्ट्री मालिक उनकी मांग मानने को तैयार नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "मुझे प्रति माह 30 हजार रुपये वेतन मिलता है, लेकिन हमें दिन में 12 घंटे काम करना पड़ता है. हमें रविवार को भी छुट्टी नहीं मिलती. अगर हम छुट्टी मांगते हैं, तो हमें एक दिन का वेतन काटने की धमकी दी जाती है."

रंजन की तरह सोनू सिंह भी यहां कढ़ाई का काम करते हैं. दोनों झारखंड के रहने वाले हैं.

वह कहते हैं, "झारखंड में रोजगार की स्थिति अच्छी नहीं है, इसलिए मैं काम करने के लिए सूरत आया. यहां मुझे काम तो मिल जाता है, लेकिन एक भी छुट्टी नहीं मिलती. अगर मुझे पूरी तनख्वाह चाहिए तो मुझे लगातार काम करना होगा. मुझे छुट्टियां सिर्फ होली या दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान ही मिलती है."

आज़ाद अली नाम के एक मज़दूर ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया, "यहां वेतन की तारीखों को लेकर भी धोखाधड़ी होती है. यह तय नहीं है कि हमें महीने की किस तारीख को वेतन मिलेगा."

वे कहते हैं, "हम भी इंसान हैं. जब कोई मजदूर अपना घर छोड़कर इतनी दूर आता है, तो उसे हफ़्ते में एक दिन आराम मिलना चाहिए. हम अक्सर कई महीनों तक अपने घर नहीं जा पाते."

कढ़ाई कारखाने में काम करने वाले रंजन चंद्रवंशी ने कहा, "पहले हम आठ घंटे काम करते थे. अब कानूनी तौर पर हमें 12 घंटे काम करना पड़ता है. काम के घंटे बढ़ने से वेतन में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन काम डेढ़ गुना बढ़ गया है. अगर हम कोई निश्चित लक्ष्य हासिल कर लेते हैं, तो हमें प्रतिदिन 50 या 60 रुपये का बोनस मिलता है."

"लेकिन इससे पूरे महीने में हमारी कमाई सिर्फ़ 1,500 से 1,800 रुपये ही बढ़ पाती है. महंगाई बढ़ने के साथ अब जो कमाई हो रही है, उससे यह बहुत कम है."

कारखाने वालों का क्या कहना है?

कुछ कढ़ाई इकाई के मालिकों का कहना है कि उद्योग को नुकसान पहुंचाने की चाह रखने वाले कुछ तत्व अनावश्यक रूप से इस तरह का विवाद पैदा कर रहे हैं.

उनका कहना है कि कढ़ाई के कारोबार में लगातार मंदी बनी हुई है और इसकी वजह से त्योहारों के मौसम में भी लोग उतनी खरीदारी नहीं करते जितनी पहले करते थे.

ऐसे वक्त में कुछ बाहरी लोग मजदूरों को निर्माताओं पर दबाव डालने के लिए उकसाते हैं.

कढ़ाई कारखाने के मालिक बिपिन अकबरी ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया कि पिछले दो वर्षों में मजदूरों के वेतन में काफी वृद्धि हुई है.

उनका कहना है कि अब त्योहार आ रहे हैं इसलिए मज़दूरों को दो शिफ्टों में काम करना पड़ रहा है. ऐसे में कुछ लोग जानबूझकर यह विवाद खड़ा कर रहे हैं ताकि मालिकों पर दबाव पड़े.

उनका कहना है कि सूरत में पहले से ही सप्ताह में सात दिन काम करने का नियम है. वेतन उसी के अनुसार तय किया जाता है. अब अगर हम महीने में चार दिन की छुट्टी देंगे तो यह हमारे लिए संभव नहीं होगा.

उनके अनुसार, "ऐसे बहुत कम मजदूर हैं जो लगातार एक ही कारखाने में काम करते हैं. उनमें से अधिकतर 15-20 दिन या दो-तीन महीने ही काम करते हैं."

"मजदूर बेहतर वेतन की पेशकश मिलने पर कहीं और चले जाते हैं. इसलिए, इसका असर कढ़ाई इकाइयों पर पड़ता है. ऐसी इकाइयों को चलाने के लिए लाखों रुपये के कर्ज लिए जाते हैं और बाजार की स्थिति ऐसी है कि मंदी बार-बार आती रहती है."

मज़दूर, मालिक और बाज़ार की स्थिति

कढ़ाई कारखाने के मालिक शिवशंकर पांडे पहले खुद एक मजदूर के रूप में काम करते थे. अब वे उधना में अपना खुद का कारखाना चलाते हैं.

उनका मानना ​​है कि मज़दूरों को हर सप्ताह एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए, लेकिन उद्योग की स्थिति ऐसी है कि मौजूदा वेतन पर उन्हें छुट्टी देना संभव नहीं है.

बीबीसी न्यूज़ गुजराती से बात करते हुए उन्होंने कहा, "सूरत की सभी इकाइयां 24 घंटे काम करती हैं. अब कारीगर मांग कर रहे हैं कि हमें रविवार की छुट्टी दी जाए और वेतन में कटौती न की जाए. सूरत में बढ़ती महंगाई के मुकाबले अधिक कमाई करने के लिए कारीगर दो मशीनों के बजाय तीन मशीनें चला रहे हैं. लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल सकता."

उनका कहना है, "इन सभी समस्याओं की जड़ बाजार है. फिलहाल, सामान की कमी है और इस क्षेत्र में साल में छह महीने मंदी रहती है. मंदी न होने पर भी काम कम दर पर मिलता है. इसके अलावा, बिलिंग चक्र, जो पहले 45 दिन का था, अब 120 दिन का हो गया है, इसलिए हमारा पैसा लंबे समय तक फंसा रहता है.

लेबर लॉ क्यों लागू नहीं है?

इस बीच, मजदूरों से जुड़े लोगों का कहना है कि गुजरात में नए श्रम कानूनों के लागू होने के बाद असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति और खराब हो गई है.

गुजरात मजदूर संघर्ष समिति के शरद शर्मा ने बीबीसी गुजराती को बताया, "सूरत में कढ़ाई इकाइयां अमरोली, कतरगाम, उधना, भेस्तान, कडोदरा और पलसाना में स्थित हैं. यहां श्रमिकों द्वारा शुरू किया गया विरोध प्रदर्शन स्वतःस्फूर्त है और इसका कोई नेता नहीं है."

वह कहते हैं, "इस काम में 15 दिन की रात और 15 दिन की दिन की शिफ्ट शामिल है. इसमें श्रमिकों को प्रतिदिन ढाई से तीन लाख टांके पूरे करने होते हैं. अगर वे 12 घंटे में इससे अधिक टांके पूरे कर लेते हैं, तो उन्हें बोनस मिलता है. श्रमिकों के लिए समस्या यह है कि बोनस भी कारखाने के अनुसार बहुत भिन्न होता है."

उनका यह भी कहना है कि इसके लिए केवल कढ़ाई इकाइयों के मालिकों को दोष देना उचित नहीं होगा क्योंकि बाजार में स्थिरता नहीं है. यह विनिर्माण का काम नहीं है, बल्कि मजदूरी का काम है. इसके अलावा, त्योहारों के दौरान सारा काम मजदूरों पर आ जाता है और नए मजदूर उपलब्ध नहीं होते.

उनका कहना है, "सूरत में श्रम कानूनों का ठीक से पालन नहीं किया जाता है. इसके अलावा, कढ़ाई इकाइयां कारखाना अधिनियम के अंतर्गत नहीं आती हैं, इसलिए इकाई मालिक क्लर्कों की आड़ में इन्हें चलाते हैं."

वैसे सूरत जैसे बड़े औद्योगिक शहर में डिप्टी लेबर कमीश्नर का पोस्ट खाली है इसलिए वडोदरा के लेबर कमीश्नर ए एन डोडिया सूरत के प्रभारी हैं.

वे केवल मंगलवार और शुक्रवार को सूरत कार्यालय आते हैं. बार-बार प्रयास करने के बावजूद उनसे संपर्क नहीं हो सका.

सूरत के सहायक श्रम आयुक्त भी बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं थे. इस मामले में उनसे बात होने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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