नटी बिनोदिनी कौन थीं जिनके नाम से अब जाना जाएगा कोलकाता का मशहूर स्टार थिएटर

'स्टार थिएटर'
इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस ऐतिहासिक स्थल का नाम बदलकर 'बिनोदिनी थिएटर' रखने की घोषणा की है.
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

कोलकाता के पुराने इलाकों में से एक, नटी बिनोदिनी सारणी के पास स्थित शहर की सांस्कृतिक धरोहर स्टार थिएटर का नाम बदल दिया गया है.

ये थिएटर बंगाली रंगमंच की महान हस्ती, नटी बिनोदिनी दासी से जुड़ा है. बांग्ला में 'नटी' का मतलब अदाकारा होता है, और बिनोदिनी ने अपने दौर में बंगाल के रंगमंच को नई पहचान दी थी.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते सोमवार को इस ऐतिहासिक स्थल का नाम बदलकर 'बिनोदिनी थिएटर' रखने की घोषणा की.

कुछ ही घंटों के भीतर कोलकाता नगर निगम ने इस फैसले को लागू कर दिया था. थिएटर के बाहर नटी बिनोदिनी के नाम का बोर्ड भी लगा दिया गया है.

इस थिएटर का नाम और बिनोदिनी के साथ इसके जुड़ाव की कहानी भी बेहद ख़ास है.

लाल रेखा

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12 साल की उम्र में पहला नाटक

बिनोदिनी दासी
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी दासी ने काफ़ी छोटी उम्र में ही अभिनय की शुरुआत कर दी थी.

बिनोदिनी दासी ने उस समय रंगमंच पर अपनी पहचान बनाई, जब महिलाओं का अभिनय के क्षेत्र में आना अच्छा नहीं माना जाता था.

नाटकों में महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाते थे.

ऐसे दौर में अपनी शानदार अदाकारी से बिनोदिनी ने न सिर्फ रंगमंच पर जगह बनाई, बल्कि रामकृष्ण परमहंस को भी प्रभावित किया. उन्होंने बिनोदिनी का नाटक देखा और उन्हें आशीर्वाद दिया.

लेकिन, बिनोदिनी दासी के लिए रंगमंच की राह आसान नहीं थी.

उनका जन्म कोलकाता के एक 'रेड लाइट' इलाके में हुआ था और वहीं उन्होंने संगीत की शिक्षा गंगा बाई से ली थी.

बिनोदिनी थिएटर
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी दासी एक मात्र थिएटर आर्टिस्ट थीं, जिन्होंने अपनी जीवनी 'आमार कोथा' लिखी.

1863 में जन्मी बिनोदिनी ने 12 साल की उम्र में अपना पहला नाटक किया और 23 की उम्र में थिएटर छोड़ दिया.

बिनोदिनी अपने समय की एकमात्र रंगमंच कलाकार थीं, जिन्होंने अपनी जीवनी "आमार कोथा" लिखी.

उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित एक और किताब – 'आमार अभिनेत्री जीबोन' भी लिखी. अपनी आत्मकथाओं में उन्होंने अपने जीवन में मिले धोखों का दर्द साफ बयां किया है.

वो लिखती हैं कि बचपन में उनकी शादी कर दी गई थी, लेकिन फिर वो अपने पति को कभी नहीं देख पाईं.

इसके बाद उनकी जिंदगी में एक ज़मींदार आया जिसने शादी का वादा किया, लेकिन बाद में किसी और से शादी कर ली.

फिर उनकी जिंदगी में एक और मोड़ आया जब वो बड़े व्यवसायी गुरमुख राय के संपर्क में आईं.

उनके संघर्ष और समाज की चुनौतियों ने उन्हें रंगमंच का एक यादगार नाम बना दिया.

जब बिनोदिनी के सामने थी दासी बनकर रहने की शर्त

बिनोदिनी दासी
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी के जीवन पर आधारित बांग्ला फ़िल्म का पोस्टर, थिएटर में यह फ़िल्म 23 जनवरी को रिलीज़ होगी.
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बिनोदिनी और उनके साथी रंगमंच के कलाकार एक नया थिएटर बनाना चाहते थे. उस समय गुरमुख राय ने 50 हज़ार रुपए देने की पेशकश की, लेकिन इसके साथ शर्त रखी कि बिनोदिनी उनकी दासी बनकर रहें.

बिनोदिनी ने भी अपनी शर्त रखी कि जब कोलकाता के 'वायडन स्ट्रीट' में थिएटर तैयार होगा, तो उसका नाम उनके नाम पर रखा जाएगा.

सभी ने सहमति दी, थिएटर बनकर तैयार हो गया, लेकिन उसका नाम 'स्टार थिएटर' रखा गया. ये देखकर बिनोदिनी का दिल टूट गया.

इतिहासकारों का मानना है कि इसी वजह से बिनोदिनी ने 23 साल की उम्र में ही रंगमंच को छोड़ दिया.

कोलकाता के महापौर फिरहाद हकीम ने स्टार थिएटर का नाम बदलने का अध्यादेश जारी करते हुए कहा, "यही वो ऐतिहासिक गलती थी, जिसे मुख्यमंत्री ने 141 साल बाद सुधारने का काम किया है."

बाद में गुरमुख राय ने 'स्टार थिएटर' बेच दिया. इसके नए मालिकों में अमृतलाल बसु, दाशुचरण नियोगी और अमृतलाल मित्रा शामिल थे.

जब कोलकाता के 'सेंट्रल एवेन्यू' में सड़क चौड़ीकरण का काम हो रहा था, तब 'स्टार थिएटर' को तोड़ दिया गया. इसके बाद अलग स्थान पर नए 'स्टार थिएटर' का निर्माण किया गया.

रूढ़ियों को चुनौती

बिनोदिनी थिएटर
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी दासी ने अपनी जीवनी में लिखा कि थिएटर के मालिक ने उनको तनख्वाह देने से मना कर दिया था.

बिनोदिनी की आत्मकथा उनके संघर्षों और समाज की रूढ़ीवादी परंपराओं को तोड़ने के उनके साहस की गवाही देती है. अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा है कि उन्हें हर कदम पर उन्हें धोखा मिला.

अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया है जब वो इलाहाबाद गई थीं. लौटने पर उनकी नाट्य मंडली के मालिक ने उन्हें तनख्वाह देने से इनकार कर दिया.

बाकी कलाकारों को भी पैसे नहीं मिले क्योंकि उनकी गैरमौजूदगी में मंडली ने कोई नाटक नहीं किया था.

बिनोदिनी लिखती हैं कि बाकी कलाकारों को पैसे देने के लिए मंडली के मालिक ने उनके साथ सोने की शर्त रख दी थी.

बिनोदिनी दासी
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी दासी के जीवन पर आधारित फ़िल्म का एक पोस्टर. यह फ़िल्म 23 जनवरी को रिलीज़ होगी.

'रेड लाइट' इलाके में जन्म लेने के साथ-साथ बिनोदिनी के लिए ये भी चुनौती थी कि उन्होंने संगीत की शिक्षा एक तवायफ से ली थी.

जिस समय रंगमंच पर महिलाओं की भूमिका पुरुष निभाते थे, उस दौर में उन्होंने समाज की सोच को बदलने के लिए ये बड़ा और साहसी कदम उठाया.

यही वजह थी कि संत रामकृष्ण परमहंस उनके नाटक 'चैतन्य प्रभु' का मंचन देखने आए और उन्होंने बिनोदिनी को आशीर्वाद दिया.

ये घटना बिनोदिनी ने अपनी आत्मकथा और संस्मरणों में भी लिखी है.

बिनोदिनी दासी
इमेज कैप्शन, बिनोदिनी दासी के जीवन पर आधारित एक बांग्ला फ़िल्म आ रही है.

बिनोदिनी दासी का निधन साल 1941 में हुआ.

अब उनके जीवन पर आधारित एक बांग्ला फिल्म बनी है. इस फ़िल्म का निर्देशन प्रसिद्ध बांग्ला निर्देशक राम कमल मुखर्जी कर रहे हैं.

ये फिल्म 23 जनवरी, 2025 को रिलीज़ होगी.

इससे पहले निर्माता और निर्देशक प्रदीप सरकार भी उनकी आत्मकथा पर हिंदी फिल्म बनाना चाहते थे. इसमें कंगना रनौत को मुख्य भूमिका निभानी थी.

लेकिन 24 मार्च, 2023 को सरकार के निधन के कारण ये प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया.

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