उत्तराखंड की इस ग्लेशियल झील में लगेगा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, किस ख़तरे की है आशंका?

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- Author, वर्षा सिंह
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- ........से, देहरादून
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
नेपाल में आई फ़्लश फ़्लड आपदा के एक महीने बाद भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड ने एक ग्लेशियल झील पर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने का कदम उठाया है.
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के टूटने से होने वाले नुक़सान को कम करने, झीलों की निगरानी और चेतावनी तंत्र को मजबूत करने के लिए यह पहल शुरू हुई है.
चमोली के वसुधारा ग्लेशियर झील में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए वैज्ञानिकों का एक दल बीते मंगलवार को देहरादून से रवाना हुआ. वसुधारा झील को वसुंधरा ताल भी कहा जाता है.
ग्लेशियल झील पर लगाया जाने वाला यह राज्य का पहला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम है. इसके जरिए अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और रियल टाइम आंकड़े मिलने से झील में होने वाले बदलावों को मॉनिटर किया जा सकेगा. इस तरह समय रहते ख़तरे का अनुमान लगाया जा सकेगा.
तेजी से बढ़ रहा वसुंधरा झील का दायरा

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नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर(एनआरएससी) की रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले छह दशकों में वसुधारा ताल का जल-विस्तार क्षेत्र करीब पांच गुना बढ़ा है.
साल 1962 में यह झील 10.53 हेक्टेयर में फैली थी, जिसका जल-विस्तार क्षेत्र साल 2024 में बढ़कर 51.07 हेक्टेयर हो गया.
यह झील एक सुप्रा-ग्लेशियल (हिमनद की सतह पर बनी) झील है, जो कई छोटी झीलों के आपस में मिलकर बनने से विकसित हुई है.
राज्य सरकार का कहना है कि झील के बढ़ते आकार और इसके नीचे बसे इलाकों और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं पर संभावित ख़तरे को देखते हुए इसकी लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी देने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है.
29 सितंबर से शुरू हुआ यह अभियान 15 अक्तूबर तक प्रस्तावित है.
अभियान दल में रुड़की स्थित केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) और देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं.
उच्च हिमालयी और दुर्गम क्षेत्र में अभियान दल की सुरक्षा, आवाजाही और फ़ील्ड सहयोग के लिए एसडीआरए, एनडीआरएफ़ और आईटीबीपी के जवान भी दल के साथ रहेंगे.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि वैज्ञानिक संस्थानों, विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी विभागों के आपसी तालमेल से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत बनाया जाए.
अभियान दल के सदस्य बुधवार सुबह ऋषिकेश से जोशीमठ के लिए रवाना हुए.
वाडिया भू विज्ञान संस्थान के ग्लेशियोलॉजी विभाग में वैज्ञानिक और दल में शामिल डॉ. अमित कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि 3 अक्तूबर को टीम तकरीबन चार हजार मीटर उंचाई पर स्थित पहले बेस कैंप में पहुंच जाएगी.
राज्य की 13 ग्लेशियल झीलें संवेदनशील
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की वर्ष 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं.
इनमें से 13 ग्लेशियल झीलें उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित हैं.
इनमें बागेश्वर की एक, चमोली की चार, पिथौरागढ़ की छह, टिहरी गढ़वाल की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल हैं.
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के मुताबिक़, उच्च जोखिम वाली छह ग्लेशियल झीलों का बाथिमेट्रिक सर्वे पूरा किया जा चुका है.
इस सर्वेक्षण में झील की गहराई, पानी के नीचे झील के तल की जानकारी, जल धारण क्षमता और पानी की कुल मात्रा का आकलन किया जाता है.
लोगों तक अलर्ट पहुंचाने का बनेगा तंत्र

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26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास भूस्खलन और उसके बाद आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई.
ऐसी आपदाओं का खतरा उत्तराखंड में भी सामने आ चुका है. फरवरी 2021 में चमोली में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटकर गिरने से अचानक बाढ़ आई थी, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हुए.
इन आपदाओं को देखते हुए उच्च हिमालयी क्षेत्रों और वहां हो रहे बदलावों की निगरानी की जरूरत बढ़ गई है.
ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. अमित के मुताबिक़, चार पहलुओं पर काम किया जा रहा है जिसमें झीलों की निगरानी, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, सूचना को लोगों तक पहुंचाना और जोखिम कम करने के उपाय शामिल हैं.
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने के बाद वसुंधरा झील से जुड़े आंकड़े मिलने शुरू हो जाएंगे.
उन्होंने कहा, "इससे हमें झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव से जुड़ा रियल टाइम डेटा मिलने लगेगा और हम इसकी मॉनिटरिंग कर सकेंगे. सूचना का प्रचार-प्रसार कर सकेंगे. ज़रूरत पड़ने पर सायरन के जरिए लोगों को सतर्क भी किया जा सकेगा."
वह बताते हैं कि इसके लिए झील से संभावित रूप से प्रभावित क्षेत्र की मैपिंग की जाएगी.
"हम यह भी अध्ययन करेंगे कि कहां-कहां मकान, बांध और दूसरी संरचनाएं हैं. बाथिमेट्रिक सर्वे से हमें पता है कि झील में पानी की मात्रा कितनी है. अब हम यह आकलन करेंगे कि झील टूटने की स्थिति में पानी नीचे की बस्तियों तक कितनी देर में पहुंचेगा. इससे हर झील के लिए रिस्पॉन्स टाइम तय करने और यह समझने में मदद मिलेगी कि कहां सायरन लगाने हैं और कहां पहले से जागरूकता कार्यक्रम चलाकर लोगों को सचेत करना है."
"हम ये भी देखेंगे कि क्या झील का पानी धीरे-धीरे रिसाव कर निकाला जा सकता है, जिससे इसके टूटने का ख़तरा कम हो जाए,"
डॉ. अमित के मुताबिक़, हर झील से जुड़ा ख़तरा अलग है. ज़रूरी नहीं कि वसुंधरा झील जैसी स्थिति पिथौरागढ़ की झीलों की भी हो. वहां परिस्थितियां अलग हैं. अगले वर्ष पिथौरागढ़ की झीलों का अध्ययन शुरू किया जाएगा.
2007 में बने वेदर सिस्टम आपदा में बह गए थे
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में ग्लेशियोलॉजी विभाग में रह चुके वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल के अनुसार, ग्लेशियर की स्थिति को समझने के लिए 2007-08 में पहली बार रुद्रप्रयाग जिले में चोराबाड़ी ग्लेशियर के पास ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (एडब्ल्यूएस) लगाए गए थे.
इसके बाद 2011-12 में डोकरानी और चोराबाड़ी ग्लेशियरों पर अलग-अलग ऊंचाइयों पर छह एडब्ल्यूएस लगाए गए.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में उन्होंने बताया कि राज्य में इतनी ऊंचाई पर मौसम के अध्ययन के लिए पहली बार इस तरह का उपकरण लगाया गया था.
वह याद करते हैं, "ग्लेशियर अध्ययन के लिए हमारा फ़ील्ड वर्क अच्छा था लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में आधुनिक उपकरणों के मामले में हम पीछे थे, 2013 की आपदा में हमारे कुछ उपकरण बह गए थे. 2019 में जब मैं वापस उन एडब्ल्यूएस सिस्टम को देखने गया तो जंग लगने की वजह से वे टूट रहे थे. वहां लगाए जाने वाले उपकरणों की गुणवत्ता बेहतरीन होनी चाहिए."

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बर्फ़ गिरने का सटीक डेटा मिल सकेगा
वसुधारा ताल की निगरानी के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने की इस पहल पर उन्होंने कहा, "इन उपकरणों से मिले आंकड़े हमें वहां के मौसमी बदलावों की समझने में मदद मिलेगा. हमारे पास सटीक डेटा होगा कि कब और कितनी बर्फ़ गिर रही है या बारिश हो रही है. हम कहते हैं कि अब गर्मियों की अवधि बढ़ रही हैं और सर्दियां सिकुड़ रही हैं, तो ये उपकरण हमें वहां तापमान के उतार-चढ़ाव का वास्तविक आंकड़ा देंगे."
इन उपकरणों से वसुधारा झील के जलस्तर की निगरानी की जा सकेगी.
डॉ. डोभाल के मुताबिक़, "हमें झील की गहराई पता है, जब झील का जलस्तर घटेगा या बढ़ेगा, तो इससे झील के आकार में आ रहे बदलावों का आकलन भी किया जा सकेगा. जब झील में एक निर्धारित स्तर से ऊपर पानी बढ़ेगा तो सेंसर ट्रिगर करेगा और समय रहते चेतावनी जारी की जा सकेगी."
वसुधारा ताल से करीब 18 किलोमीटर नीचे धौलीगंगा घाटी में नीति, गमशाली समेत रिहायशी इलाके शुरू होते हैं.
डॉ. डोभाल के मुताबिक़, झील में जलस्तर एक निर्धारित स्तर से ऊपर पहुंचने पर सेंसर ट्रिगर होगा और सिस्टम के जरिए अलर्ट जारी किया जा सकेगा. ऐसी स्थिति में बचाव और रिस्पॉन्स के लिए करीब आधे घंटे का समय मिल सकता है.
इन उपकरणों से होगी निगरानी
जलस्तर सेंसर: झील में उतार-चढ़ाव और अचानक होने वाले असामान्य बदलावों की निगरानी.
स्वचालित मौसम केंद्र: तापमान, आर्द्रता, बारिश, हवा की गति और दिशा, वायुदाब और प्रकाश की तीव्रता जैसे मौसम संबंधी आंकड़े दर्ज करेगा.
स्नो डेप्थ सेंसर: झील के आसपास बर्फ की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी.
स्नो सब-सर्फेस टेम्परेचर सेंसर: बर्फ की अलग-अलग गहराइयों पर तापमान में होने वाले बदलावों को दर्ज करने के लिए आठ सेंसर लगाए जाएंगे.
टिल्ट और एक्सेलेरोमीटर सेंसर: चुनिंदा स्थानों पर झुकाव, कंपन और हलचल की निगरानी.
जल प्रवाह सेंसर: जल प्रवाह में होने वाले बदलावों की निगरानी.
सौर ऊर्जा प्रणाली: दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में लगे उपकरणों को बिजली उपलब्ध कराएगी.
उपग्रह संचार प्रणाली: मोबाइल नेटवर्क नहीं होने की स्थिति में सेंसर से मिले आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजेगी.
डेटा लॉगर और मॉनिटरिंग डैशबोर्ड: सेंसर से मिले आंकड़ों को रिकॉर्ड करेगा और ऑनलाइन दिखाएगा. तय सीमा से अधिक बदलाव होने पर अलर्ट जारी करने में मदद करेगा.
ख़तरे का आकलन
वसुधरा ताल और उसके आसपास के पर्यावरणीय और जलवैज्ञानिक बदलावों की लगातार निगरानी की जा सकेगी.
सेंसर से मिले आंकड़ों के आधार पर संभावित असामान्य परिवर्तनों की पहचान करने और समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी.
मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने कहा कि वसुधरा ताल में शुरू की जा रही ये पहल भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में भी ऐसे सिस्टम स्थापित करने का आधार बनेगी.
आपदा प्रबंधन और पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि अर्ली वॉर्निंग सिस्टम से जलस्तर, मौसम, बर्फ़ की स्थिति, जल प्रवाह जैसे महत्वपूर्ण आंकड़े लगातार मिलेंगे.
जो आपदा जोखिम को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को मजबूत बनाने में मदद करेंगे.
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