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रिस्क लेने का मनोविज्ञान: क्या आप सीधे 50 हज़ार डॉलर लेंगे या 10 लाख डॉलर जीतने के लिए टॉस करना चाहेंगे?
- Author, लिज़ी मैकनील और टॉम कोल्स
- पदनाम, मोर ऑर लेस, बीबीसी पॉडकास्ट और सीरीज़
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
अगर आपको तत्काल 50 हज़ार डॉलर मिलने या 10 लाख डॉलर जीतने के अवसर के बीच चुनना हो तो आप क्या चुनेंगे?
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय शोध और डेटा विश्लेषण फ़र्म यूगोव ने 4,600 ब्रिटिश लोगों के सामने इसी तरह की दुविधा के बारे में सवाल किए गए.
नतीजा क्या निकला?
लगभग तीन-चौथाई (73%) लोगों ने कहा कि वे तुरंत 50 हज़ार पाउंड लेना पसंद करेंगे.
लगभग पाँचवें हिस्से (21%) ने 10 लाख पाउंड के जीतने के अवसर को चुना. 6% लोग यह तय नहीं कर पाए कि क्या करना है.
इसमें लिंग के आधार पर स्पष्ट अंतर था.
82% फ़ीसदी महिलाओं ने 50,000 पाउंड लेने का विकल्प चुना. लेकिन यही विकल्प सिर्फ़ 63% पुरुषों ने चुना.
शुरुआत में यह सर्वे केवल ब्रिटेन में किया गया था. इसके नतीजों ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी.
एक कमेंटेटर ने कहा, "ब्रिटेन धरती पर सबसे अधिक जोखिम से बचने वाला समाज है."
लेकिन क्या यही हक़ीक़त है? क्या ब्रिटेन में लोग जोखिम से बचते हैं?
क्या आप सिक्का उछालकर फ़ैसले लेते हैं?
लेकिन बीबीसी के इकोनॉमिक्स एडिटर फ़ैसल इस्लाम इस धारणा को चुनौती देते हैं.
उनका तर्क है कि इस सवाल को केवल संभावना के तौर पर देखना बहुत ही दकियानूसी रवैया होगा.
फ़ैसल इस्लाम कहते हैं, "जो लोग यह मानते हैं कि आपको टॉस करके फ़ैसला करना चाहिए, वे खुद को बहुत समझदार समझते हैं. उनके लिए 50,000 पाउंड की पक्की रकम स्वीकार करना मूर्खता है. लेकिन विडंबना यह है कि यह अर्थशास्त्र की बुनियादी बात है. इसे हम 'व्यवहारिक अर्थशास्त्र' में 'डिसीज़न थ्योरी' कहते हैं."
उनका कहना है कि 'एक्सेप्टेड वैल्यू' वास्तव में यह नहीं बताती कि हमारा दिमाग कैसे काम करता है या हम फ़ैसले कैसे लेते हैं. इसकी गणना 'प्रॉबेबिलिटी' की नतीजे से गुणा करके की जाती है.
फ़ैसल इस्लाम का इशारा स्विस गणितज्ञ डैनियल बर्नौली (1700-1782) के शोध की ओर है. बर्नौली ने लगभग तीन सदी पहले कहा था कि 'लोग विशुद्ध रूप से मैथ्स के तरीके से पैसे का मूल्यांकन नहीं करते हैं.'
बर्नौली के रिसर्च ने घटती 'मार्जिनल यूटिलिटी' के कॉन्सेप्ट की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई.
इसका मतलब है कि किसी चीज़ की मात्रा बढ़ने पर, उससे मिलने वाली हर अतिरिक्त खुशी या फायदा कम होता जाता है.
मिसाल की तौर पर -
- शून्य डॉलर से 50,000 डॉलर तक पहुंचना आपके जीवन में नाटकीय बदलाव ला सकता है.
- 50,000 डॉलर से एक लाख डॉलर तक की आय भी काफ़ी मददगार होगी, लेकिन शायद उतनी नहीं.
- साढ़े नौ लाख डॉलर से 10 लाख डॉलर तक जाने से आपकी स्थिति में शायद ही कोई ख़ास फर्क पड़ेगा.
ऐसे में ब्रिटेन में मौजूदा वित्तीय संकट को देखते हुए अधिकतर लोगों के लिए 50,000 पाउंड पाने की गारंटी बेहद आकर्षक है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह ब्रिटेन में कर्मचारियों के औसत वार्षिक वेतन से 10,000 पाउंड अधिक है.
ब्रिटेन में औसत वार्षिक वेतन करीब 40 हज़ार पाउंड है. ऐसे में 10 हज़ार पाउंड बिना रिस्क लिए और मिल जाएं तो क्या कहने.
लेकिन यही इकलौता फ़ैक्टर नहीं है. एक और अहम चीज़ है जिसे कहते हैं - 'प्रॉस्पेक्ट थ्योरी'.
घाटे का डर
डेनियल काहनेमैन और एमोस ट्वेर्स्की के 1979 के एक अहम शोध पत्र से प्रोस्पेक्ट थ्योरी आई. इस थ्योरी को 'व्यवहारिक अर्थशास्त्र' का अहम सिंद्धात माना जाता है.
इन दोनों ने 'नियंत्रित सर्वेक्षण' किए जिनमें लोगों से अलग-अलग वित्तीय नतीजों के बीच चुनाव करने को कहा गया. इसके बाद इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने रिस्क और इनाम के बीच चुनाव के बारे में कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले.
एक नतीजा यह निकला कि लोग छोटी प्रॉबेबिलिटीज़ को अधिक अहमियत देते हैं लेकिन मध्यम और बड़ी प्रॉबेबिलिटीज़ को कम महत्व देते हैं.
लोग दौलत और जोखिम के बारे में भी एक रेफ़ेरेंस पॉइंट से फ़ैसले लेते हैं.
उदाहरण के लिए, किसी दोस्त के साथ शर्त में 10 डॉलर हारने के बाद, आप उसे वापस जीतने की कोशिश में 10 डॉलर और जोखिम में डालने के लिए अधिक इच्छुक हो सकते हैं.
दूसरे शब्दों में कहें तो आप अपने रेफ़ेरेंस पॉइंट से सोच रहे होते हैं.
इस अध्ययन का सबसे मशहूर नतीजा है- "नुकसान का असर फ़ायदे से ज्यादा होता है."
जीत की राशि हासिल करने की ख़ुशी के मुकाबले नुकसान झेलने का झंझट कहीं अधिक असरदार होता है. अगर आप 10 लाख पाउंड जीतने का मौका चुनते हैं और नहीं जीतते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे आपने 50,000 पाउंड खो दिए हों.
कई लोगों के लिए यह बहुत बड़ी रकम है.
ब्रिटेन में अगर घर और पेंशन को छोड़ दिया जाए तो लगभग 25% लोगों के पास ही 50,000 पाउंड या उससे अधिक की संपत्ति है.
वहीं दूसरी ओर, देश के 25% लोगों के पास महज़ 300 पाउंड से भी कम की संपत्ति है.
हालांकि, सर्वे के अनुसार, आम तौर पर कम आमदनी के बावजूद, 18 से 24 वर्ष की उम्र के लोग अन्य किसी भी आयु वर्ग की तुलना में 10 लाख पाउंड पर दांव लगाने में अधिक दिलचस्पी रखते थे.
उनमें से 28 प्रतिशत लोग सिक्का उछालकर जोखिम उठाने को तैयार थे, जबकि 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में यह आंकड़ा केवल 11% था.
ऑनलाइन बहस में शामिल कुछ अमेरिकियों ने सुझाव दिया कि बाक़ी देशों के लोग अधिक जोखिम उठाने को तैयार होंगे.
इसलिए यह उचित ही था कि कुछ दिनों बाद, यूगोव ने अमेरिका में भी यही सवाल पूछा.
लेकिन परिणाम लगभग एक जैसा था.
(यह लेख बीबीसी श्रृंखला 'मोर ऑर लेस' के एक एपिसोड पर आधारित है.)
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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