You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मोदी सरकार ने क्या बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान को धर्मसंकट में डाल दिया है?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
तारिक़ रहमान इसी साल फ़रवरी में जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने तो भारत ने उन्हें नई दिल्ली आने का न्योता दिया.
तारिक़ रहमान ने इस न्योते को तरजीह नहीं दी और उन्होंने बतौर पीएम अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया को चुना.
मलेशिया के बाद तारिक़ रहमान चीन गए. इस बीच भारत ने तारिक़ रहमान को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स समिट में अतिथि के तौर पर आने का न्योता फिर से दे दिया. इस दौरे पर भी बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने अब तक हामी नहीं भरी है.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा कि दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान की संभावित यात्रा को लेकर कई हफ़्तों से बातचीत चल रही है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाँच अगस्त को दिल्ली के फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब में अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस से दोनों देशों के रिश्तों का माहौल ख़राब हुआ है.
बांग्लादेश विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ए.के.एम. शाहिदुल करीम ने कहा था कि तारिक़ रहमान की यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना ज़रूरी है.
ऐसे में सवाल उठता है कि भारत बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए इतनी मेहनत क्यों कर रहा है?
पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखने वाले पत्रकार सौरभ कुमार शाही कहते हैं कि भारत के पास इसके अलावा और विकल्प नहीं है.
भारत इतनी मेहनत क्यों कर रहा है?
सौरभ कुमार शाही कहते हैं, ''अब यह तो नहीं हो सकता कि कोई ऐसी हुक़ूमत आ गई है, जिससे आप इत्तेफाक नहीं रखते, तो आप उनके साथ इंगेज ही नहीं करेंगे. वही बात है, दोस्त तो बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं. ज़ाहिर है, इंगेज करने की कोशिश है. कई बार इंगेजमेंट करने से, अगर आप अपनी नीति में थोड़ा बदलाव लाते हैं, तो सुधार भी होता है. मिसाल के तौर पर प्यू रिसर्च का सर्वे देखिए, जिसमें तमाम देशों में इंडिया की अप्रूवल रेटिंग नापी गई है. उसमें जिस देश में इंडिया की अप्रूवल रेटिंग सबसे ज़्यादा बढ़ी है, वह श्रीलंका है.''
''जब श्रीलंका में सरकार आई थी, तब भी कहा गया था कि यह एंटी-इंडिया गवर्नमेंट है और इनके साथ कैसे होगा. लेकिन अंततः उनके साथ इंगेजमेंट हुआ. वे भारत आए, भारत में मुलाक़ात हुई, भारत से लोग वहाँ गए, वहाँ मुलाक़ात हुई. उसका असर ग्राउंड पर देखने को मिलेगा.''
उसी तरह प्यू रिसर्च के अनुसार, बांग्लादेश में आम लोगों का भारत के प्रति नाकारात्मक रुख़ बढ़ा है. प्यू रिसर्च सेंटर के ताज़ा सर्वे में 42% बांग्लादेशियों ने भारत के बारे में सकारात्मक राय दी जबकि 51% ने नकारात्मक राय व्यक्त की. सर्वे इसी साल फ़रवरी से मई के बीच हुआ था.
प्यू रिसर्च के 2024 के सर्वे के मुताबिक़ बांग्लादेश में 57 फ़ीसदी लोग भारत प्रति सकारात्मक राय रखते थे लेकिन 2026 में इसें 15 फ़ीसदी की गिरावट आई और अब महज 42 फ़ीसदी ही सकारात्मक राय रखते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश और पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोग भारत को अपने देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा भी मानते हैं.
सौरभ कुमार शाही कहते हैं कि प्यू रिसर्च के सर्वे से पता चलता है कि भारत को लेकर बांग्लादेश के आम लोगों में कैसा सेंटीमेंट है और इस सेंटीमेंट की कोई भी प्रधानमंत्री उपेक्षा नहीं कर सकता है.
शाही कहते हैं, ''तारिक़ रहमान विपक्ष में जमात-ए-इस्लामी के रहते इस सेंटीमेंट की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? उन्हें पता है कि भारत बांग्लादेश के लिए अहम देश है क्योंकि 94 प्रतिशत सीमा भारत से ही लगती है. लेकिन सत्ता में रहना है तो उन्हें जनभावना का भी ख़्याल रखना होगा. मुझे लगता है कि भारत भी उनकी इस मजबूरी को समझता होगा.''
'ये काम मोदी सरकार ही कर सकती है'
लेकिन मोदी सरकार तारिक़ रहमान को बुलाने को लेकर उत्साहित क्यों दिख रही है? शाही कहते हैं, ''मुझे लगता है कि आउटरीच इंडिया की तरफ़ से हो रहा है. इन्हें पता है कि एक न्योता बांग्लादेश नकार चुका है. लेकिन यह काम मोदी सरकार ही कर सकती है. कोई और नहीं कर सकता. कोई और अगर इतने आउट-ऑफ-द-वे जाकर कोशिश करेगा, तो उस पर ग़द्दार होने के तमाम ठप्पे लगा दिए जाएंगे.''
''कहीं भी कोई राइट-विंग पार्टी होती है, तो उसके पास यह विकल्प होता है कि वह बिना ग़द्दार कहलाने के डर के इस तरह के क़दम उठा सकती है. कहने का मतलब, डोनाल्ड ट्रंप ही यह हिम्मत कर सकते हैं कि नॉर्थ कोरिया के राष्ट्रपति के साथ बैठ जाएं. कोई डेमोक्रेट पार्टी वाला ऐसा करे तो उसे तुरंत ट्रेटर घोषित कर दिया जाएगा. या कल्पना कीजिए कि मनमोहन सिंह वाजपेयी की तरह पाकिस्तान चले जाते तो क्या होता.''
अमेरिका में बांग्लादेश में राजदूत रहे मोहम्मद हुमायूं कबीर मानते हैं कि बांग्लादेश अब बदल चुका है.
हुमायूं कबीर ने बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार में 16 अगस्त को एक आर्टिकल में लिखा है, ''जुलाई 2024 के जनविद्रोह ने लोगों की आकांक्षाओं को बदल दिया है. अब बांग्लादेशी अधिक स्वतंत्र सोच रखने वाले, महत्वाकांक्षी और अपनी आकांक्षाओं को लेकर अधिक सजग हैं. इसके बाद हुए चुनाव को व्यापक रूप से निष्पक्ष और काफ़ी हद तक सभी की भागीदारी वाला माना गया, जिसमें बीएनपी भारी जनादेश के साथ सत्ता में आई.''
हुमायूं कबीर ने लिखा है, ''इन दोनों घरेलू घटनाक्रमों का सीमा पार भी असर पड़ा है और इससे यह प्रभावित हुआ है कि बांग्लादेश भारत, चीन, अमेरिका और अन्य महत्वपूर्ण साझेदारों को किस नज़र से देखता है.भारत स्वाभाविक रूप से यह समझना चाहता है कि नई सरकार की सोच और प्राथमिकताएं क्या हैं. इन सवालों पर भारत के लिए प्रधानमंत्री से बातचीत करना सबसे बेहतर होगा, क्योंकि अंततः फैसले लेने वाला वही व्यक्ति होता है. भारत को भी यह समझना होगा कि बांग्लादेश किसी के अधीन या किसी का पिछलग्गू नहीं बनेगा.''
तारिक़ रहमान की माँ बेगम ख़ालिदा ज़िया जब प्रधानमंत्री थीं तब भी रिश्तों में तनाव रहता था. सौरभ कुमार शाही कहते हैं कि उसकी वजह भी यही थी कि तब भी हमने अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में रखे थे, यानी शेख़ हसीना की टोकरी में.
शाही कहते हैं, ''इससे पहले मैंने कभी नहीं देखा कि बांग्लादेश के किसी प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए इस तरह खुले तौर पर ज़िद की गई हो. मुझे लगता है कि रिश्ते को मैनेज करने और संकट को कम करने की कोशिश है. बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं हैं और होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि आपने एक व्यक्ति को इतना अनक्रिटिकल सपोर्ट दिया है.''
किसके लिए झटका?
अगर तारिक़ रहमान अगले महीने 12-13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स समिट में नहीं आते हैं तो यह किसके लिए झटका होगा? सौरभ कुमार शाही कहते हैं, ''बांग्लादेश ब्रिक्स का सदस्य नहीं हैं. गेस्ट के तौर पर बुलाए जा रहे हैं. ऑप्टिक्स ख़राब होंगे, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं, क्योंकि उम्मीद पहले से बहुत ऊँची नहीं है. ऐसा नहीं है कि आपके साथ किसी के अच्छे रिश्ते थे और वह नहीं आया. जिस व्यक्ति के साथ आप संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह नहीं आता है, तो उतनी बड़ी बात नहीं है.''
''लेकिन एक बात और है. चूंकि भारत ने निमंत्रण दे दिया है, इसलिए दबाव अब बांग्लादेश पर है, इंडिया पर नहीं. दबाव तारिक़ रहमान पर है कि आपके पड़ोसी देश ने बुलाया है, और आप नहीं आते हैं तो यह सिर्फ़ भारत की बेइज्जती नहीं होगी; ब्रिक्स की भी बेइज्जती होगी, क्योंकि आपको एक मल्टीलेटरल फोरम में बुलाया गया है.
''यह कोई आधिकारिक द्विपक्षीय यात्रा का निमंत्रण नहीं है. आप भविष्य में ब्रिक्स का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आप नहीं चाहेंगे कि आपको इस कोशिश में असहयोगी के रूप में देखा जाए. इसलिए यह मोदी से ज़्यादा तारिक़ रहमान के लिए मुश्किल स्थिति है. मोदी ने जो करना था, कर दिया, पहले ही निमंत्रण दे दिया.''
कहा जा रहा है कि ब्रिक्स समिट में शामिल होने का न्योता बांग्लादेश अस्वीकार करता है तो वह भारी मन से ही ऐसा करेगा.
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के असोसिएट प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि तारिक़ रहमान पर दोनों तरफ़ से दबाव है.
डॉ त्रिपाठी कहते हैं, ''जनता का दबाव होगा कि भारत न जाएँ. लेकिन डिप्लोमेसी के अपने कुछ उसूल होते हैं. जिस मल्टीलेटरल फोरम का आप भविष्य में सदस्य बनना चाहते हैं, उसमें आपको बुलाया गया है कि बैठकर उसकी कार्यवाही देखिए. अब आप क्या करेंगे? इसलिए यह मोदी के मुक़ाबले तारिक़ रहमान के लिए ज़्यादा कठिन स्थिति है.''
डॉ त्रिपाठी कहते हैं, ''कोर्स करेक्शन हो रहा है. यह भी समझिए कि हसीना पर अब बहुत दबाव डाला जा रहा है कि तुम यहाँ से निकलो. ऐसा न लगे कि भारत उन्हें दूसरी पार्टी के हवाले कर रहा है, वह बहुत ख़राब ऑप्टिक्स होंगे. लेकिन वे ख़ुद ही ऐसी स्थिति में निकल जाएँ, तो अलग बात है.''
तारिक़ रहमान के लिए मुश्किल इसलिए है क्योंकि शेख़ हसीना की पार्टी के ख़िलाफ़ ही उनका पूरा मैंडेट रहा है.
शेख़ हसीना की पार्टी के ख़िलाफ़ ही उन्होंने चुनाव लड़ा है और वहाँ सुप्रीम कोर्ट में शेख़ हसीना के केस भी है. ऐसे में तारिक़ रहमान यहाँ आएंगे तो ढाका में उनके लिए स्थिति और जटिल हो सकती है.
डॉ त्रिपाठी कहते हैं, ''तारिक़ रहमान की दिक़्क़त ये है कि जैसे वो नई दिल्ली आएंगे, उनका राजनीतिक कद बांग्लादेश में प्रभावित होगा. इसीलिए वो इससे बचने की कोशिश कर रहे हैं. एक बड़ा प्रेशर तब हटेगा जब शेख़ हसीना भारत से वापस चली जाएंगी, चाहे बांग्लादेश या किसी और देश.''
बांग्लादेश के लिए असहज स्थिति?
अगर तारिक रहमान ब्रिक्स समिट में नहीं आते हैं, तो क्या यह बांग्लादेश के लिए असहज स्थिति होगी या भारत के लिए एक झटका होगा? इसके जवाब में डॉ त्रिपाठी कहते हैं, ''मेरे ख़्याल से इसे सेटबैक कहना थोड़ा ज़्यादा होगा, लेकिन निश्चित रूप से एक कमी रहेगी.''
''एक महत्वपूर्ण स्पेस ख़ाली रहेगा. उन्हें आना चाहिए, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे अभी हाल-फ़िलहाल भारत आएंगे, जब तक कि डिप्लोमैटिक लेवल पर कोई बहुत बड़ी बात न हो. हो सकता है कि वो किसी और को भेज दें. अपना कोई प्रतिनिधि या विदेश मंत्री भेज दें.''
हुमायूं कबीर कहते हैं, ''भारत को बांग्लादेश के पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर चिंता हो सकती है, लेकिन हम भारत को आश्वस्त कर सकते हैं कि यह दो देशों के बीच एक सामान्य संबंध है. बांग्लादेश अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी तीसरे देश को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं होने देगा.
''चीन के साथ हमारे संबंध भी भारत के लिए अनावश्यक चिंता का कारण नहीं होने चाहिए. चीन दशकों से बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे के विकास में शामिल रहा है, क्योंकि बांग्लादेश को उस सहायता की ज़रूरत है और चीन उसे उपलब्ध करा सकता है. तुर्की भी बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है, क्योंकि बांग्लादेश रोज़गार के अवसर पैदा करने और अपने आर्थिक साझेदारों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.