सेफ़्टी पिन: वो छोटा सा 'हथियार' जिसका इस्तेमाल महिलाएं करती हैं यौन उत्पीड़न से लड़ने के लिए

सेफ़्टी पिन
    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

लगभग सभी महिलाओं ने भीड़-भाड़ वाले इलाके में यौन उत्पीड़न का सामना किया होगा, जब किसी ने उनके सीने पर हाथ रखा हो, चिकोटी काटी हो या फिर कोहनी से उनकी छाती पर मारा हो.

ऐसे मनचलों पर पलटवार करने के लिए महिलाओं के हाथ जो भी आता है वो उसका इस्तेमाल करती हैं. जैसे उदाहरण के तौर पर कोलकाता में कॉलेज के दिनों में मैं और मेरी दोस्त भीड़भाड़ वाली बसों में और ट्रामों में छतरियों का इस्तेमाल करते थे.

साल 1849 में सेफ़्टी पिन अविष्कार के बाद से दुनिया भर की महिलाओं के द्वारा कई कपड़ो का एक साथ पहनने और अचानक कपड़ों के ढ़ीलेपन या किसी तरीके की ख़राबी से निपटने के लिए किया जाता रहा है.

सेफ़्टी पिन का इस्तेमाल महिलाओं ने अपने उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए किया, यहां तक उन्होंने इसकी मदद से उत्पीड़कों का ख़ून तक निकाल दिया.

महिलाओं का पसंदीदा हथियार

कुछ महीने पहले भारत में कई महिलाओं ने ट्विटर पर यह स्वीकार किया कि वे हमेशा अपने हैंडबैग में या अपने पास एक पिन रखती हैं. भीड़-भाड वाली जगहों पर मनचलों से निपटने के लिए सेफ़्टी पिन उनकी पसंदीदा हथियार है.

इनमें से एक दीपिका शेरगिल ने ऐसी घटना के बारे में बताया कि उन्होंने इसकी मदद से ख़ून निकाल दिया था.

दीपिका शेरगिल ने बीबीसी को बताया कि ये तब हुआ जब वो बस से ऑफ़िस जा रही थी. वो बताती हैं कि ये घटना दशकों पहले की है लेकिन उन्हें अब तक घटना का छोटा हिस्सा याद है.

दीपिका शेरगिल
इमेज कैप्शन, दीपिका शेरगिल ने एक ऐसे शख्स के ख़िलाफ़ सेफ्टी पिन का इस्तेमाल किया, जिसने उन्हें महीनों तक परेशान किया था.

महीनों तक उत्पीड़न झेलने के बाद चुप्पी तोड़ी

दीपिका बताती हैं कि वो उस वक़्त 20 साल की थी और वो आदमी जो बस में उनका यौन उत्पीड़न करता था उसकी उम्र 40 से ऊपर होगी. वो हमेशा ग्रे सफ़ारी पहनता था. (जो भारतीय पुरुषों के बीच प्रचलित है और ज़्यादातर ये सरकारी नौकरी वाले लोग पहनते हैं).

दीपिका शेरगिल कहती हैं, "वह हमेशा मेरे बगल में आकर खड़ा हो जाता था, झुक जाता था, अपनी कमर को मेरी पीठ पर रगड़ता था, और हर बार ड्राइवर के ब्रेक लगाने पर मेरे ऊपर गिर जाता था."

दीपिका कहती हैं कि उन दिनों वह "बहुत डरपोक थी और अपनी ओर ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहती थी", इसलिए उसने महीनों तक चुप्पी साधे रखी.

लेकिन एक शाम जब उस आदमी ने "हस्तमैथुन करना शुरू कर दिया और मेरे कंधे पर स्खलित हो गया", तब उन्होंने तय किया कि ये तो हद पार हो गई.

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उन्होंने कहा, "मैं अशुद्ध महसूस कर रही थी. घर पहुंचने पर मैं काफ़ी देर तक नहायी. मैंने अपनी मां को भी नहीं बताया कि मेरे साथ क्या हुआ था."

"उस रात मैं सो नहीं पाई और यहां तक मैंने नौकरी छोड़ने का फ़ैसला कर लिया था. लेकिन फ़िर मैंने बदला लेने और उसे तक़लीफ पहुंचाने का सोचा. ताकि वो दोबारा ऐसा न करे."

अगले दिन दीपिका ने अपने फ्लैट जूतों को नुकीली हिल्स से बदल दिया और सेफ़्टी पिन के साथ बस में सवार हो गईं.

दीपिका कहती हैं, "जैसे ही वह मेरे पास आकर खड़ा हुआ मैं अपनी सीट से उठी और अपनी एड़ी से उसके पैरों कुचल दिए. उसे दर्द से तड़पते देख कर मुझे बेहद ख़ुशी हुई. फिर मैंने पिन से उसकी बांह को घायल कर दिया और ज़ल्दी से बस से उतर गई."

इसके बाद वो अगले साल तक उस बस से ऑफ़िस जाती रही लेकिन उन्हें वो व्यक्ति दोबारा नज़र नहीं आया.

दीपिका शेरगिल की कहानी चौंकाने वाली ज़रूर है. लेकिन अनूठी नहीं है.

बस में चढ़ती एक भारतीय महिला
इमेज कैप्शन, भारत में लगभग हर महिला के पास भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक परिवहन में यौन उत्पीड़न की कहानी है.

महिला यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज नहीं हो पाते

मेरे साथ काम करने वाली एक सहकर्मी ने एक घटना सुनाई जब वो 30 साल की थी. घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कोचीन और बेंगलुरु के सफ़र के दौरान एक आदमी ने बस में उन्हें बार-बार छूने की कोशिश की.

वो कहती हैं, "शुरूआत में मुझे लगा कि ऐसा ग़लती से हो रहा है."

लेकिन जब उस आदमी ने ऐसा करना जारी रखा तब उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है, और जिस सेफ़्टी पिन का इस्तेमाल उन्होंने अपने दुपट्टे को व्यवस्थित रखने के लिए किया था, उसी की वजह से वो 'उस दिन बच गई'.

वो कहती हैं, मैंने उसे पिन चुभाया फिर वो पीछे हटा, लेकिन वो बार बार कोशिश करता रहा और मैंने भी लगातार पिन चुभाना जारी रखा. अंत में उसने ऐसा करना बंद किया. मैं खु़श थी कि मेरे पास सेफ़्टी पिन था. लेकिन मैं नासमझ थी कि मैंने पीछे घूमकर उसे थप्पड़ नहीं जड़ा."

वो आगे कहती हैं, "लेकिन जब मैं छोटी थी, तो मैं सावधान थी कि अगर मैंने आवाज़ उठाई तो लोग मेरा समर्थन नहीं करेंगे."

एक्टिविस्ट का कहना है कि यह डर और शर्म की बात है कि ज़्यादातर महिलाओं को लगता है कि छेड़छाड़ करने वालों का हौसला बढ़ता है और समस्या इतनी व्यापक होती जाती है. .

एक ऑनलाइन सर्वे के मुताबिक़ 2021 में 140 भारतीय शहरों में 56 प्रतिशत महिलाओं ने सार्वजनिक परिवहन पर यौन उत्पीड़न की सूचना दी, लेकिन 2 प्रतिशत मामले पुलिस तक पहुंच पाए.

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ऐसी घटनाओं से जुझने वाले कई लोगों ने कहा कि उन्होंने ख़ुद ही कार्रवाई या स्थिति को अनदेखा करना चुना क्योंकि वो मामले को तुल नहीं देना चाहते थे.

52% से अधिक ने कहा कि उन्होंने "असुरक्षा की भावना" के कारण शिक्षा और नौकरी के अवसरों को ठुकरा दिया है.

सार्वजनिक स्थानों को महिलाओं के लिए सुरक्षित और समावेशी बनाने के लिए काम करने वाली एक सामाजिक संस्था सेफ़्टीपिन की सह-संस्थापक कल्पना विश्वनाथ कहती हैं, "यौन हिंसा का डर वास्तविक हिंसा की तुलना में महिलाओं के मानस और गतिशीलता को ज़्यादा प्रभावित करती है."

"महिलाएं खु़द पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर देती हैं और यह हमें पुरुषों के बराबर नागरिकता से वंचित करती है.महिलाओं के जीवन पर छेड़छाड़ के वास्तविक कृत्य की तुलना में इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है."

दिल्ली मेट्रो में महिलाओं का डिब्बा
इमेज कैप्शन, दिल्ली मेट्रो में हर ट्रेन में महिला यात्रियों के लिए एक डिब्बा आरक्षित होता है.

'मनचलों को आकर्षित करता है ट्रांसपोर्ट नेटवर्क'

कल्पना विश्वनाथ इस ओर इशारा करती हैं कि महिलाओं के साथ उत्पीड़न सिर्फ़ भारत की समस्या नहीं है, बल्कि ये वैश्विक समस्या है.

थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के 1,000 महिलाओं के सर्वे में पता चला है कि लंदन, न्यूयॉर्क, मैक्सिको सिटी, टोक्यो और काहिरा में ट्रांसपोर्ट नेटवर्क मनचलों को आकर्षित करते हैं, जो अपने ग़लत व्यवहार को छुपाने के लिए भीड़- भाड़ के वक़्त का इस्तेमाल करते थे ताकि पकड़े जाने के बाद वो भीड़-भाड़ का बहाना बना सकें.

कल्पना कहती हैं कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका की महिलाओं ने उनसे कहा है कि वे भी अपने पास सेफ़्टी पिन रखती हैं.

अमेरिका में स्मिथसोनियन मैगज़ीन की रिपोर्ट है कि महिलाओं ने 1900 के दशक में भी हैटपिन का इस्तेमाल उन पुरुषों को चुभाने के लिए किया था जो उनके काफ़ी क़रीब आते थे.

लेकिन सार्वजनिक उत्पीड़न के पैमाने पर कई वैश्विक सर्वेक्षणों में शीर्ष पर रहने के बावजूद भारत इसे एक बड़ी समस्या के तौर पर नहीं देखता है.

कल्पना का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि ख़राब रिपार्टिंग की वजह से अपराध के आंकड़े सामने नहीं आते है और सिनेमा जो हमें सिखाता है कि उत्पीड़न महिलाओं को लुभाने का एक तरीका है.

वीडियो कैप्शन, लेबनान में एक स्पेशल किचन खोला गया है, जहां विकलांग महिलाओं को नौकरी मिल रही है.

कल्पना विश्वनाथ कहती हैं कि पिछले कुछ सालों में कई शहरों की स्थिति में सुधार हुआ है.

राजधानी दिल्ली के बसों में पैनिक बटन और सीसीटीवी कैमरे हैं.बसों में पहले की तुलना में ज़्यादा महिला ड्राइवरों को शामिल किया गया है. ड्राइवरों और कंडक्टरों को महिला यात्रियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए गए और बसों में मार्शल तैनात किए गए हैं.

पुलिस ने भी एप्स और हेल्पलाइन नंबर लांच किए है, जिसकी मदद से महिला मदद ले सकती है.

कल्पना कहती हैं कि ये समस्या हमेशा क़ानून व्यवस्था की समस्या नहीं है.

वो कहती हैं, "मुझे लगता है सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि हम इस समस्या पर बात करें. यहां एक ठोस मीडिया अभियान होना चाहिए जो लोगों में ड्रिल करेगा कि स्वीकार्य व्यवहार क्या है और क्या नहीं."

लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, कल्पना, मेरी सहयोगी और लाखों भारतीय महिलाओं को सेफ़्टी पिन अपने साथ संभाल कर रखना होगा.

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