ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन क्या तख़्तापलट की ओर बढ़ रहे हैं?

ईरान
    • Author, लीस डुसेट और बेहरंग ताजदिन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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महसा अमीनी की मौत के चार हफ़्ते बीत चुके हैं और इस दौरान ईरान ने हाल के सालों में अब तक के सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सामना किया है.

इन विरोध प्रदर्शनों को ईरान की धार्मिक सत्ता के लिए बड़े ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है. सरकार ने इसे दबाने के लिए अपनी पूरा ताक़त झोंक दी है.

अतीत में किसी मुद्दे पर लोगों को, ख़ास तौर पर देश की नौजवान पीढ़ी को, जिसमें लड़के-लड़कियां दोनों शामिल हों, इस तरह से आंदोलित होते नहीं देखा गया था.

ये वो नौजवान पीढ़ी है जिनके पूर्वज ईरान की व्यवस्था में बदलाव की नाकाम कोशिशें हार चुके थे.

सोशल मीडिया पर ईरान के विरोध प्रदर्शन से जुड़े ऐसे वीडियो भरे पड़े हैं जिनमें देश के सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीरों को जलाते हुए देखा जा सकता है.

"अगर हम एक नहीं हुए तो महसा अमीनी के बाद हमारा नंबर आएगा." ये आवाज़ एक प्रदर्शनकारी की थी.

वो उस नौजवान कुर्द लड़की का ज़िक्र कर रहे थे जिनकी मौत पुलिस हिरासत में हो गई थी और उन पर ये इल्ज़ाम था कि उन्होंने 'ठीक से' हिजाब नहीं पहना था.

ईरान को लेकर बीबीसी की स्पेशल कवरेज के रूप में बीबीसी फ़ारसी सर्विस के संवाददाता बेहरंग ताजदिन और वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय संवाददाता लीस डुसेट ने पाठकों के मन में उठ रहे कई सवालों का जवाब देने की कोशिश की है कि वहां क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है.

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इन विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई कौन कर रहा है?

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बेहरंग ताजदिन: इसका संक्षिप्त सा जवाब ये है कि कोई एक राजनीतिक व्यक्ति या समूह इन विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई नहीं कर रहा है.

ये विरोध प्रदर्शन उन ईरानी महिलाओं के नेतृत्व में चल रहे हैं जो सरकार की ज़ोर-जबर्दस्ती से परेशान हैं. वो इस बात से परेशान हैं कि सरकार उनकी ज़िंदगी के हर पहलू, यहां तक कि वो क्या पहनेंगी और क्या नहीं, पर अपना कंट्रोल रखना चाहती हैं.

इस आंदोलन में जो नारे और गीत सबसे ज़्यादा कहे-सुने जा रहे हैं, उसके बोल कुछ इस तरह से हैं... 'औरत, ज़िंदगी, आज़ादी...' और 'तानाशाह को मौत...' ये नारा साफ़ तौर पर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के लिए है.

इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल गुटों में जो बात कॉमन है, वो ये है कि वे ईरान की इस्लामी व्यवस्था, उसके अलोकतांत्रिक चरित्र और विचारधारा से जुड़ी नीतियों में बुनियादी बदलाव चाहते हैं.

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ईरान में कौन से लोग इन विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में हैं?

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बेहरंग ताजदिन: ये विरोध प्रदर्शन राजधानी तेहरान में या छात्रों के बीच नहीं शुरू हुए थे. इसकी शुरुआत कुर्दिस्तान प्रांत के साक़्क़ेज़ शहर से हुई और जंगल की आग की तरह पूरे मुल्क में फैल गई.

लेकिन अब इस आंदोलन में छात्र शामिल हैं. बड़े और छोटे शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. ये वो लोग हैं जिन्हें आम तौर पर रूढ़िवादी माना जाता है.

इनमें संपन्न तबके के लोग शामिल हैं तो देश के ग़रीब लोग भी सड़कों पर उतरे हुए देखे जा सकते हैं. इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि देश के किस तबके के कितने लोग और किस अनुपात में इस आंदोलन के लिए सहानुभूति रखते हैं.

लेकिन एक बात तय है कि ज़्यादातर लोग इसका समर्थन कर रहे हैं. हाल के सालों में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया था कि ईरानी समाज के हर तबके के लोग इतनी बड़ी तादाद में इस मुहिम के लिए हमदर्दी रखते हों.

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प्रेस कवरेज और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं इतनी कमज़ोर क्यों हैं?

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लीस डुसेट: पश्चिमी देशों की कई सरकारों ने ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन के सरकारी दमन के ख़िलाफ़ कड़ी प्रतिक्रियाएं दी हैं. उन्होंने नई पाबंदियां भी लगाई हैं.

उदाहरण के लिए ब्रिटेन ने ईरान की 'मोरैलिटी पुलिस' को वहां के राजनीतिक और सुरक्षा अधिकारियों की तरह की प्रतिबंधित किया है.

लेकिन ईरान में विदेशी मीडिया प्रतिष्ठानों की मौजूदगी कम है. उन्हें भी ईरानी पत्रकारों की तरह ही पाबंदियों के दायरे में रहकर काम करना होता है.

बीबीसी जैसे कई आउटलेट्स वहां अपने पत्रकारों को भेजकर रिपोर्टिंग कराना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ईरान का वीज़ा नहीं मिलता है.

ऐसे में हमारी निर्भरता ईरानियों द्वारा भेजे गए वीडियो और उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर रह जाती है. ईरान में इंटरनेट सर्विस पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं और वहां के लोगों की इंटरनेट तक पहुंच भी सीमित ही है.

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क्या ये विरोध प्रदर्शन इस्लाम से लोगों की बढ़ती दूरी का संकेत है?

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बेहरंग ताजदिन: पिछले दो दशकों में ईरानी समाज पर धर्म का असर काफ़ी कम हुआ है.

इसकी वजह कुछ हद तक तो ये है कि शिया इस्लाम की सरकार ने इतनी कड़ी व्याख्या कर रखी है और इसे लोगों पर इतनी सख़्ती से थोपा गया है कि प्रतिक्रिया स्वरूप लोग धर्म से दूर हुए हैं.

इस्लामी मूल्यों को अपनाने में लोगों की हिचक के कारण सरकार को मोरैलिटी पुलिस जैसे संगठन बनाने पड़े.

सामान्य तौर पर समझें तो ईरान की हुकूमत ने धार्मिक मूल्यों को लागू करने की जितनी ज़्यादा कोशिश की और मज़हबी संगठनों और त्योहारों के आयोजन में जनता का पैसा जितना ज़्यादा खर्च किया गया, ईरानी लोग उतना ही इससे फ़ासला बढ़ाने लगे.

इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि क़ानून के तहत इस्लामी मूल्यों का आदर न करना, नास्तिकता की ओर क़दम बढ़ाना और यहां तक कि अन्य धर्म की ओर रुझान रखना भी जुर्म है और यहां तक कि इसके लिए सज़ा-ए-मौत भी दी जा सकती है.

इसलिए आप देखेंगे कि ईरानी लोग सार्वजनिक तौर पर धर्म के बारे में अपनी राय कम ही देते हैं.

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क्या पुलिस और आर्मी विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो सकती है?

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लीस डुसेट और बेहरंग ताजदिन: ईरान की आबादी लगभग नौ करोड़ है और दूसरे देशों की तरह यहां भी लोग भिन्न विचार रखते हैं. इसमें सुरक्षा बल भी शामिल हैं. ये जानना मुश्किल है कि इन विरोध प्रदर्शनों के बीच वे अब क्या सोच रहे हैं. सुरक्षा बलों का एक तबका हुकूमत के लिए वफ़ादार बना रहेगा क्योंकि उसे मालूम है कि उसका भविष्य इस्लामी गणराज्य के मुस्तकबिल से जुड़ा हुआ है.

लेकिन कुछ लोग ऐसे ज़रूर होंगे जो आंदोलन के दमन से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते होंगे. अभी तक दमन के लिए सबसे वफ़ादार इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को तैनात नहीं किया गया है. लेकिन कई लोग इस बात पर ज़रूर हैरत जताते हैं कि ईरान ने अगर इस आंदोलन को दबाने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी तो क्या होगा?

क्या वे वाक़ई देश की युवा और बुज़ुर्ग महिलाओं और समाज के हर तबके की भागीदारी वाली भीड़ पर ताक़त का इस्तेमाल करना चाहेंगे. मुमकिन है कि सुरक्षा बलों के परिवारों में प्रदर्शनकारियों की मांगों से सहमति रखने वाले लोग हों. ये भी मुमकिन है कि पुलिस और सुरक्षा बलों में भी कुछ लोग विरोध प्रदर्शनों के लिए सहानुभूति रखते हों.

लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि वो अपनी भावनाएं ज़ाहिर कर पाएंगे क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें इसके अंजाम का सामना करना पड़ सकता है. ईरान में पुलिस और सुरक्षा बलों में भर्ती के लिए इच्छुक उम्मीदवार को ये साबित करना होता है कि वो धार्मिक विचारों वाला व्यक्ति है, इस्लामी गणराज्य के लिए उसकी वफ़ादारी है और वो 'क्रांतिकारी मूल्यों' पर विश्वास रखता है.

सरकार के कुछ वरिष्ठ लोगों ने हिजाब या सिर ढंकने की अनिवार्यता और ताक़त के इस्तेमाल को लेकर अपनी चिंता जताई है. लेकिन अभी इस बारे में तस्वीर साफ़ नहीं है कि इन आलोचनाओं को कितनी तवज्जो दी गई है.

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क्या ईरान में कोई मानवाधिकार समूह सक्रिय है?

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बेहरंग ताजदिन: नहीं, वे लोग इस समय ईरान की स्थिति पर बाहर से नज़र रख रहे हैं. ईरान ग़ैर-सरकारी संगठनों को लेकर सशंकित रहता है और इसमें घरेलू संगठन भी शामिल हैं.

ईरान में ऐसे संगठनों पर अक़्सर ही जासूसी, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ छेड़छाड़ और तख़्तापलट की साज़िश रचने के आरोप लगाए जाते रहे हैं.

ऐसे में ईरान में किसी भी मानवाधिकार संगठन के लिए स्वतंत्र और सुरक्षित रूप से काम करना लगभग असंभव हो जाता है.

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अंतरराष्ट्रीय समाज ईरान की कैसे मदद कर सकता है?

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लीस डुसेट: बीबीसी पत्रकार के तौर हम किसी राजनीतिक आंदोलन का समर्थन नहीं कर सकते हैं. लेकिन कई मानवाधिकार संगठन और दूसरे नागरिक संगठन अपनी बात खुल कर रख रहे हैं. सरकारें और कंपनियां भी अपने स्तर पर क़दम उठा रही हैं.

इंटरनेट से मरहूम किए जा रहे ईरानी लोगों की मदद के लिए अमेरिकी सरकार भी कोशिश कर रही है ताकि उन्हें ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और सर्विस मुहैया कराई जा सके. अमेरिकी ट्रेज़री विभाग ने एक नया जेनरल लाइसेंस डी-2 जारी किया है जिससे ईरान को तकनीकी मदद पहुंचाने वाली कंपनियों को प्रतिबंध से छूट मिलती है.

एलन मस्क ने अपनी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक को ईरान में ऐक्टिवेट कर दिया है ताकि वहां के लोगों को बेरोकटोक इंटरनेट की सुविधा दी जा सके. गूगल और सिग्नल जैसी कंपनियां ईरानी नेटवर्क को बाइपास करने के लिए वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क्स) की सुविधा दे रही हैं.

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इमेज कैप्शन, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई

क्या ये विरोध प्रदर्शन तख़्तापलट की ओर बढ़ रहे हैं?

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लीस डुसेट: कुछ बड़े अधिकारियों ने बड़ी कार्रवाई को लेकर आशंका जताई है, लेकिन इसकी एक लक्ष्मण रेखा है और इस्लामी गणराज्य के अस्तित्व से जुड़ी हुई है.

ईरान में पहले भी कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. जैसे पानी की किल्लत को लेकर, महंगाई के मुद्दे पर और अब हिजाब को लेकर. साल 2019 में आर्थिक परिस्थिति के कारण हुए विरोध प्रदर्शन कहीं व्यापक थे, लेकिन समाज के सभी तबकों की उसमें भागीदारी नहीं थी.

सरकार को भले ही ऐसा लग रहा हो कि वे इन हालात से निपट सकते हैं, जैसा कि वे पहले कर चुके हैं. सुप्रीम लीडर ये कह चुके हैं कि कुछ प्रदर्शनकारियों से सांस्कृतिक तरीके से निपटा जाएगा तो बाक़ियों से क़ानून के डंडे की मदद से. लेकिन ज़्यादातर प्रदर्शनकारियों की उम्र 25 साल है और इसी पहलू से बदलाव की संभावना दिख रही है.

जैसा कि विश्लेषक वली नस्र कहते हैं, "व्यवस्था में बदलाव की जगह सरकार बदल सकती है. लेकिन ये तभी होगा जब सरकार ये स्वीकार कर ले कि इस विरोध प्रदर्शन का स्रोत ईरान के भीतर ही है न कि बाहर जैसा कि वे पश्चिमी देशों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं."

अतीत में ईरान में विरोध प्रदर्शनों को ताक़त के बूते पर दबाने के उदाहरण हमने देखे हैं. मध्य-पूर्व के देशों में इस तरह के विरोध प्रदर्शन पहले भी हो चुके हैं. अरब स्प्रिंग इसका उदाहरण है.

वैसे ही जब युवा पीढ़ी नेतृत्वविहीन हो और उसके विरोध प्रदर्शनों को मिलिट्री और अधिक संगठित इस्लामी संगठन हाइजैक कर ले, जैसा कि ईरान में फ़िलहाल जो रहा है, तब उसके भविष्य के बारे में पक्के तौर से कुछ कहना मुश्किल है.

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