सूखा बुंदेलखंड कुछ पर बरसा रहा है ‘सोना’

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के सात ज़िले आते हैं. पिछले तीन सालों से सूखे की मार और पानी की कमी ने किसानों का जीना भले ही दूभर कर दिया हो और वो गांव छोड़ने पर मजबूर हो रहे हों, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह इलाक़ा वरदान साबित हो रहा है.

पूरे बुंदेलखंड में खनन का कारोबार ज़ोरों पर है और इससे जुड़े लोगों के लिए यहां की लाल मिट्टी वाली सूखी धरती सोना उगल रही है.

नदियों का जलस्तर घट जाने का लाभ उठाते हुए खनन कारोबारी दिन रात रेत यानी बालू की खुदाई में लगे हैं.

महोबा ज़िले में खनन का कारोबार कुछ ज़्यादा ही फल-फूल रहा है. यहां जगह-जगह पुकलैंड और जेसीबी मशीनें खनन करती दिखेंगी और बड़े-बड़े ट्रक इन पत्थरों को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाते मिलेंगे.

स्थिति ये है कि पहाड़ों तक को खोद दिया गया है और कई जगह तो पहाड़ मैदान बन चुके हैं. महोबा ज़िले के गुगौरा गांव के निवासी एसएस परिहार कहते हैं कि खनन से निकलने वाली धूल और ज़हरीले कण पर्यावरण को तो नष्ट कर ही रहे हैं यहां के लोगों के सेहत को भी नुक़सान पहुँचा रहे हैं.

परिहार बताते हैं कि जहां उनका घर है, वो सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी है. इस सड़क पर कोई भी वाहन 15 टन से ज़्यादा लादकर नहीं ले जा सकता, लेकिन कोई भी ट्रक पचास टन से कम नहीं लादता और दिन भर में कम से कम 200 ट्रक इस सड़क से निकलते हैं.

बांदा, हमीरपुर जैसे कुछ ज़िलों में लोग खनन की दोहरी मार सह रहे हैं. एक ओर पहाड़ काटकर पत्थर निकाले जा रहे हैं और क्रेशर प्लांट में उनसे गिट्टी बनाई जा रही है, दूसरी ओर नदियों के किनारे बालू खनन ज़ोरों पर किया जा रहा है जिससे नदियों के जलग्रहण क्षेत्र पर बुरा असर पड़ रहा है.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन उद्योग में बड़े और रसूखदार लोग शामिल हैं इसलिए पुलिस और प्रशासन भी उन पर हाथ डालने से बचता है.

बांदा के सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर बताते हैं कि इस इलाक़े का किसी भी पार्टी का बड़ा छोटा नेता ऐसा नहीं होगा जो कि इस खनन उद्योग में सीधे या परोक्ष रूप से न जुड़ा हो.

आशीष सागर ने इस मामले में हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल की है जिसके फ़ैसले का अभी उन्हें इंतज़ार है.

खनन के लिए कुछ मानदंडों के आधार पर पट्टे दिए जाते हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि ज़्यादातर खनन अवैध तरीके से ही हो रहा है. पूरे बुंदेलखंड को खनन से 500 करोड़ रुपए का सालाना राजस्व मिलता है.

योगेश कुमार

हालांकि बांदा के ज़िलाधिकारी योगेश कुमार कहते हैं कि अवैध खनन का मामला उनके संज्ञान में है और उन्होंने अपने मातहतों को इस बारे में कड़े क़दम उठाने के निर्देश दे दिए हैं.

योगेश कुमार कहते हैं कि अवैध खनन करने वालों को रोकने और उन्हें डराने का पूरा प्रयास कर रहे हैं लेकिन अभी उनकी प्राथमिकता जल संकट से निपटने की है.

जानकारों का कहना है कि बुंदेलखंड के जल संकट के लिए काफी हद तक खनन और वनों की कटाई भी ज़िम्मेदार है.

बांदा-चित्रकूट परिक्षेत्र के वन संरक्षक केएल मीणा बताते हैं कि जंगलों से भरे रहने वाले इस इलाक़े में मात्र 5-6 प्रतिशत वन क्षेत्र रह गया है, जबकि मानकों के अनुसार कम से कम 33 प्रतिशत होना चाहिए.

मीणा कहते हैं कि नए पेड़ लगाने की कहीं जगह ही नहीं बची है, क्योंकि खनन उद्योग ने न सिर्फ़ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है बल्कि नए पेड़ों को लगाने की परिस्थितियां और जगह भी ख़त्म कर दी है.

ऐसा नहीं है कि स्थानीय लोगों को इसकी भयावहता का अंदाज़ा न हो, लेकिन इसके पीछे लगे लोगों की ताक़त के चलते जल्दी कोई हाथ नहीं लगाता.

सामाजिक कार्यकर्ता शैलेंद्र कौशिक कहते हैं कि अवैध खनन और जंगलों की कटाई पर यदि रोक न लगी तो वो दिन दूर नहीं जब पूरा बुंदेलखंड एक रेगिस्तान बन जाएगा.

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