वाजपेयी भी मना नहीं पाए थे बोस के पोते को

चंद्र कुमार बोस
    • Author, रजत रॉय
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

सुभाषचंद्र बोस के भाई के पोते चंद्र कुमार बोस भारतीय जनता पार्टी के दूसरे उम्मीदवारों से हटकर हैं.

वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं और बिल्कुल निश्चिंत हैं. वे क़ानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर गर्मागर्म बातें भी नहीं करते.

ममता बनर्जी

बोस इसके बदले सुशासन और विकास का मुद्दा उठाते हैं. वे कहते हैं, "मैं ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ कोई व्यक्तिगत बात नहीं करूंगा. मैं सुशासन जैसे गंभीर मुद्दे उठाऊंगा, जो यहां बिल्कुल नहीं है."

वे कहते हैं कि 2011 में जिन बदलावों की बात कहकर ममता बनर्जी सत्ता में आईं, वे बदलाव नहीं हुए.

मगर वे साफ़ करते हैं कि असहिष्णुता और धार्मिक मुद्दों पर उनके विचार भाजपा से मेल नहीं खाते. उनसे हुई बातचीत के अंश -

सुभाष चंद्र बोस के परिजन नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज के साथ
इमेज कैप्शन, सुभाष चंद्र बोस के परिजन नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज के साथ

मेरे परिवार का राजनीति में भाग लेने का इतिहास रहा है. मेरे पिता अमियनाथ बोस ने आरामबाग से चुनाव लड़ा था और तब वित्तमंत्री सचिन चौधरी को हराया था. बाद में 1980 में वे भाजपा में शामिल हो गए और इसके उपाध्यक्षों में एक थे. मैं राजनीति समझने के लिए उनकी सभाओं में जाता था.

अटल बिहारी वाजपेयी 1987 में भाजपा अध्यक्ष थे, उन्होंने मुझे पार्टी में शामिल होने के लिए चिट्ठी लिखी थी. पर तब मैं टाटा स्टील में काम करता था. वाजपेयी ने मुरलीमनोहर जोशी को मुझे समझाने-बुझाने के लिए कोलकाता भेजा था. मैं उनसे मिला, पर कोई नतीजा नहीं निकला. मैं अपनी नौकरी छोड़ राजनीति में आने को तैयार नहीं था.

नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें सार्वजनिक
इमेज कैप्शन, नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें सार्वजनिक

2001 में मैंने टाटा स्टील से वीआरएस लिया और कंसल्टेंसी कंपनी खोली. कुछ समय बाद मैं फॉरवर्ड ब्लॉक में शामिल हो गया. पर मैं यह देख परेशान था कि उसके लोग नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें सार्वजनिक करने के मुद्दे पर ज़ोर नहीं दे रहे थे. कांग्रेस मेरी पसंद हो नहीं सकती थी.

इसने 1939 में नेताजी को पार्टी से बाहर निकालने का फ़ैसला अब तक वापस नहीं लिया है. इसके अलावा कांग्रेस वंशवाद पर चलने वाली पार्टी बन चुकी थी. साम्यवाद अब अतीत की चीज हो चुकी है, लिहाज़ा इस सिद्धांत ने मुझे आकर्षित नहीं किया. मैं कभी कम्यूनिस्ट नहीं रहा. एक बार मेरे मन में आज़ाद हिंद पार्टी के नाम से नई पार्टी शुरू करने की बात भी आई, पर बाद में मैंने यह विचार भी छोड़ दिया.

नेताजी से जुड़ी फ़ाइलों में क्या है?
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मैंने 2011 में 'द ओपन प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर नेताजी' नाम से एक मंच बनाया. इसका मक़सद नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें सार्वजनिक करने के लिए दवाब बनाना था. इस सिलसिले में मैं नरेंद्र मोदी के संपर्क में आया. मैं उनसे 2013 में कोलकाता में मिला. उन्होंने इसमें दिलचस्पी ली. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपना वचन पूरा किया. मोदी धर्मनिरपेक्ष हैं. वे सबको साथ लेकर चलते हैं और विकास के लिए काम करते हैं. इस तरह भाजपा मेरी पसंद की पार्टी बन गई.

मोदी से पहले मैंने ममता बनर्जी से संपर्क किया था. मैंने नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें सार्वजनिक करने के मुद्दे पर दिसंबर 2012 में उन्हें कई चिट्ठियां लिखी थीं, पर उन्होंने किसी का जवाब नहीं दिया.

भाजपा और सीपीएम

पार्टी ने मुझसे कहा कि मैं चुनाव लड़ूँ. हालांकि मैं बहुत इच्छुक नहीं था, पर उनकी बात मुझे माननी पड़ी.

जैसा मैंने कहा, राजनीति में मेरी दिलचस्पी है और चुनाव में भाग लेना इसका एक अहम पहलू है. पहले कम्यूनिस्ट और अब तृणमूल कांग्रेस बंगाल में सुशासन देने में नाकाम रहे. मुझे यहां भाजपा की काफ़ी संभावनाएं दिख रही हैं.

नेताजी से जुड़ी फ़ाइलें देखते हुए लोग
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आधा काम तो हो चुका है. अब हमें दूसरे देशों की सरकारों के पास फ़ाइलों में क्या है, इसकी जानकारी लेनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया की सरकारों को ख़त लिखकर फ़ाइलों की जानकारी मांगी है. जर्मनी और ब्रिटेन ने कहा है कि वे इस पर काम कर रहे हैं. फ़ाइल मिल जाएं और उनका अध्ययन हो जाए, तो मामला ख़त्म किया जा सकता है.

एक बात साफ़ है. हम यह नहीं मानते कि नेताजी आज भी जीवित हैं, पर हम हवाई हादसे की थ्योरी भी नहीं मानते. यदि यह बात सही होती, तो कांग्रेस सरकार ने इसे दबाने की कोशिश क्यों की? जस्टिस मनोज मुखर्जी ने पाया था कि नेताजी की गुमशुदगी से जुड़ी फ़ाइल नष्ट कर दी गई. ऐसा इंदिरा गांधी के समय हुआ था.

सुभाष चंद्र बोस

नेताजी के अंतिम दिनों को लेकर जो आधिकारिक बयान हैं, उस पर संदेह के कारण मौजूद हैं. शरतचंद्र बोस अदालत में जिरह करने के लिए मशहूर थे. नेताजी के नजदीकी हबीबुर रहमान 1946 में कोलकाता आए थे और मेरे दादा शरत चंद्र से मिले थे.

मेरे घर पर बंद कमरे में उनके बीच तीन घंटे तक बात हुई थी. मेरे पिता अमियनाथ बाहर ही खड़े थे. शरतचंद्र ने बाहर निकलकर कहा था, 'हबीबुर सच नहीं बोल रहे हैं. वे वही कह रहे हैं जो उनके नेता ने उन्हें कहने को कहा है.'

शिशिर बोस ने भी हवाई हादसे में नेताजी के मरने की बात नहीं मानी थी. कांग्रेस में शामिल होने और 1982 में विधायक बनने के बाद ही वे इस थ्योरी को मानने लगे. उनके बेटे सुगत ने भी वही किया.

नरेंद्र मोदी

भाजपा की सभी बातें मानना मुमकिन नहीं है. हम साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर काम करेंगे. मेरे विचार से धर्म निजी पसंद की चीज़ है. भारत काफ़ी सहिष्णु देश है. सभी राजनतिक दलों में हाशिए पर खड़े कुछ तत्व होते हैं. हमें देखना है कि संयम से काम किया जाए ताकि हिंसा और नफ़रत न फैले. नेताजी सबको साथ लेकर चलने में यक़ीन करते थे. उनके परिजन के नाते मैं उनकी यह बात आगे बढ़ाऊंगा.

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