एफ़टीआईआई पर क्या कहता है फ़िल्म जगत

एफ़टीआईआई
    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

पुणे स्थित फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में छात्रों की हड़ताल खत्म होने के कोई संकेत नहीं हैं.

दो महीने से ज्यादा समय से जारी हड़ताल के दौरान जब कुछ छात्रों की गिरफ्तारी की गई तो विरोध और बढ़ गया.

आइए जानते हैं इस विवाद पर भारतीय फ़िल्मकारों का क्या कहना है.

निर्माता, निर्देशक सुधीर मिश्रा

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छात्र अपने भविष्य के बारे में नहीं सोच सकते या उनको हक़ नहीं हैं? जिस तरह से सरकार उनके साथ बर्ताव कर रही है उससे आज की युवा पीढ़ी में ग़लत संदेश जा रहा है.

छात्रों को यह कहने का पूरा हक़ है कि हमें कोई ऐसा आदमी दीजिए जो प्रेरणा दे सके और इंस्टीट्यूट में ऐसे कई लोग हैं.

मुझे आज तक एक बात समझ नहीं आई चैयरमेन पद के लिए 70 से 80 साल का ही आदमी क्यों होना चाहिए? संजय भंसाली, राजू हिरानी क्यों नहीं हो सकते. दोनों ही वहां के एडिटिंग कोर्स के स्टूडेंट रह चुके हैं. प्रकाश झा भी बन सकते हैं, जो इसके काबिल हैं.

मैं गजेंद्र चौहान के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन जिसका काम मार्गदर्शन देना हो वहां एक ऐसा आदमी होना चाहिए जिसने सिनेमा में नाम कमाया हो, जो अवगत हो हिंदुस्तान के सिनेमा से.

अगर कोई क्रिकेट स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट हो तो वहां हेड सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली या राहुल द्रविड़ होना चाहिए जिसे खेल की समझ हो, न कि कोई भी आदमी.

फ़िल्मकार दिबाकर बनर्जी

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एफटीआईआई की सिर्फ एक चीज़ बहुत महत्व की है जिस पर चर्चा की आवश्यकता है और वह है गजेन्द्र चौहान, अनघा घैसास, नरेंद्र पाठक, राहुल सोलपुरकर और अन्य की नियुक्ति.

इनका चयन राजनैतिक है क्योंकि इनका झुकाव हिंदुत्व की ओर है. तीन नामांकित व्यक्तियों ने इसके विरोध में इस्तीफ़ा दिया है और देश को जानना है क्यूं?

यह एक दुखद उदाहरण है, जिसे अगर चलने दिया गया तो यह दूसरे संस्थानों में हस्तक्षेप के रास्ते खोलेगा.

छात्रों ने पहले इसका औपचारिक स्पष्टीकरण माँगा था, फिर जवाब न मिलने पर सभ्य तरीके से विरोध किया, आखिर जब उन्हें 'नक्सली, हिन्दू विरोधी और देश विद्रोही' का दर्जा दिया गया तब उन्होंने सख़्ती से लेकिन सभ्य तरीके से इसका विरोध किया.

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इस मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए उन पर आरोप लगाया गया कि वह कोर्स खत्म नहीं कर रहे, टैक्स भरने वालों के पैसे बर्बाद कर रहे है और फिर पुलिस बुला ली गई.

लेखक, अभिनेता पियूष मिश्रा

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मैं 36 साल से क्रिएटिव आर्ट का काम कर देश और समाज के लिए काम कर रहा हूं लेकिन मुझे भी चैयरमेन का पद मिल जाए तो मैं खुद ही इसके लिए मना कर दूंगा. क्योंकि मैं ये बात अच्छी तरह जानता हूं कि मैं उसके लायक नहीं.

उस पद के लिए आदमी पढ़ा लिखा होना चाहिए, जिसे सिनेमा का पूरा ज्ञान हो, जिसे देखकर छात्रों को लगे कि वह चैयरमेन के काबिल हैं.

अभी यह सब देख कर ऐसा लग रहा हैं जैसे सरकार ज़िद पर अड़ गई है क्योंकि अगर उन्हें हटाया तो ऐसे बहुत सी जगहों से लोगों को हटाना पड़ेगा.

70 दिन से ज़्यादा से यह सब चल रहा है और गजेन्द्र चौहान को देख कर ऐसा नहीं लग रहा कि वह समझदार इंसान हैं. अगर समझदार इंसान होते तो ये सब तमाशा देखकर हट चुके होते.

छात्र इतना हो-हल्ला कर रहे हैं लेकिन उन्हें इतनी सी बात समझ नहीं आ रही कि वह इस पद के काबिल नहीं हैं. उन्हें फ़िल्म एक्टिंग के बारे में नहीं पता, उन्होंने सिर्फ टीवी में काम किया है.

फ़िल्मकार राकेश ओम प्रकाश मेहरा

सरकार को शर्म आनी चाहिए कि वह युवा पीढ़ी की आवाज़ दबा रही है. सरकार अपनी विचारधारा अगली पीढ़ी के फ़िल्मकारों पर थोप रही है.

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