बंदूकें नहीं रोक पाईं हौसलों की उड़ान

ज़ाहिद कुरैशी
इमेज कैप्शन, ज़ाहिद कुरैशी ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में 89वीं रैंक हासिल की है.
    • Author, हाज़िक क़ादरी
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित कश्मीर के एक अनाथ छात्र ज़ाहिद कुरैशी ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में 89वीं रैंक हासिल की है लेकिन उनके पास फ़ीस देने के लिए पैसे नहीं हैं.

ज़ाहिद इस बात को लेकर सुर्खियों में आ गए हैं कि वे आईआईटी में दाखिला ले भी पाएंगे कि नहीं.

उनकी कहानी प्रतापगढ़ के आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास करने वाले दलित समुदाय के उन ग़रीब लड़कों जैसी ही है जिनके बारे में जानने के बाद मदद करने वालों का तांता लग गया था.

कश्मीर के चरमपंथ प्रभावित इलाकों से आने वाले नौजवान लड़के-लड़कियों की संघर्ष की कहानी बहुत लंबी है. अपने सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें अक्सर कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है.

मुसीबत

कश्मीर

सबसे पहली मुसीबत हथियारबंद चरमपंथी आंदोलन रहा है, जिसने कश्मीर में ऐसा माहौल बना दिया जो छात्रों के अनुकूल नहीं है.

इसकी वजह से कश्मीर में उच्च शिक्षा के लिए आधारभूत ढांचा तैयार नहीं हो पाया है.

हालांकि हाल के वर्षों में कश्मीर की नई पीढ़ी ने अपने रास्ते में आने वाली मुसीबतों से उबरना सीख लिया है.

हाल ही में फ़ौजी वर्चस्व वाले इलाकों से मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक सेवा और अकादमिक क्षेत्र में लड़के-लड़कियों का बेहतर प्रदर्शन उम्मीद जगाता है.

ज़ाहिद सिर्फ दो महीने की उम्र में अनाथ हो गए थे. उनके पिता की किसी अज्ञात बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी.

ज़ाहिद कुपवाड़ा के रहने वाले हैं जहां भारतीय फ़ौज और चरमपंथियों के बीच अक्सर गोलीबारी होती रहती है.

ज़ाहिद को आर्मी सदभावना प्रोजेक्ट के तहत आईआईटी की ट्यूशन मिली थी. इस प्रोजेक्ट के तहत 'कश्मीर सुपर-30' प्रोग्राम चलाया जाता है.

सुविधा

शाहिद नबी
इमेज कैप्शन, शाहिद नबी को एम्स में प्रवेश मिला है.

सोपोर और तराल कश्मीर के दो ऐसे इलाके हैं जो चरमपंथियों के गढ़ माने जाते हैं.

इन इलाकों से कई नौजवान लड़के चरमपंथी संगठनों में शामिल हुए और कई इनमें से गोलीबारी में मारे भी गए हैं.

लेकिन पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में यहां के नौजवानों की उल्लेखनीय उपलब्धियां एक दूसरी ही कहानी बयां करती है.

एक 19 साल के लड़के शाहिद नबी ने हाल ही में ऑल इंडिया कॉमन इंट्रेस टेस्ट में आठवां स्थान हासिल कर और एम्स की प्रवेश परीक्षा में चयनित होकर इलाके का नाम रोशन किया.

कश्मीर से हर साल बहुत ही कम छात्रों का एम्स में दाखिला हो पाता है.

शाहिद नबी का कहना है, "मेरे गांव में कोई स्कूल नहीं है. मेरे लिए दूसरे गांव में जाकर पढ़ना वाकई बहुत मुश्किल भरा काम था."

शाहिद ने बताया कि उनके पिता एक किसान हैं और वे उनके लिए बड़े स्कूल या दूसरी सुविधाओं का बंदोबस्त नहीं कर सकते थे.

सकारात्मक संदेश

कश्मीर

राज्य की दसवीं की परीक्षा में तराल की दो लड़कियों ने पहला और दूसरा स्थान हासिल किया था.

15 साल की अनीका शब्बीर ने पहला और उनकी दोस्त शाहीरा शमीम ने दूसरा स्थान हासिल किया. उनका गांव चरमपंथ के लिहाज से सबसे ख़राब इलाकों में माना जाता है.

अनीका कहती हैं, "हमारे यहां अक्सर कर्फ्यू की हालत बनी रहती है और ऐसे में मेरे लिए पढ़ाई पर ध्यान दे पाना बहुत मुश्किल था. लेकिन कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय किसी भी समस्या का समाधान है."

राजनीतिक विश्लेषक वाहिद रहमान पारा का कहना है कि इन नौजवान छात्रों की सफलता ने इलाके के दूसरे नौजवानों को एक बहुत ही सकारात्मक संदेश दिया है.

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