हमरा नाम है कुरथी महतो

झारखंड, कोयला तस्कर
    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

रांची-पटना हाइवे पर कुजू के पास है गांव सोनडिहा चैनपुर. यहीं पर रहते हैं कुरथी महतो. 58 साल के कुरथी को एक बार टीबी हो चुकी है.

गिधनी (बोकारो) की एक बंद पड़ी खदान से कोयला खरीदना, उसे साइकिल से रांची ले जाकर बेचना इनका पेशा है. इसमें उन्हें हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है.

कोयला तस्कर

दस किलो की साइकिल पर 150 किलो कोयला. इस साइकिल के साथ करीब 60 किलोमीटर का रास्ता. यह दूरी पैदल तय करने के बावजूद कुरथी 29 मार्च को खुश थे.

कुरथी महतो

उन्होंने हड़िया पी, पोते-पोतियों के लिए पेप्सी की एक लीटर वाली बोतल खरीदी. उस रात उनके घर में मुर्गा-भात बना.

आप जानना चाहेंगे कुरथी के इत्मीनान और बच्चों के इस ट्रीट की वजह.

कुरथी ने तीन दिन, दो रात सड़क पर गुजारने के बाद उस दिन रांची के पंडरा में कोयले को बेचा.

इससे उन्हें 1300 रुपये मिले. यह कोयला उन्होंने गिधनी से सिर्फ 250 रुपये में खरीदा था. मतलब, 1050 रुपये का मुनाफा. खुशी की वजह यही कमाई है.

कुरथी का सोनडिहा चैनपुर में कच्चा, खपरैल का मकान है. इस घर के अपने हिस्से वाले इकलौते कमरे में वह अपनी पत्नी शनिचरी के साथ रहते हैं.

चाचा, आप तो कोयला तस्कर हुए न?

"नहीं सर, हम त कोयला बेचते हैं. तस्कर वह है जो बच्चों और महिलाओं से कोयला खुदवाता है. गिधनी के बंद पड़ी खदान से."

यह उनकी अपनी परिभाषा है. पुलिस उन्हें तस्कर ही मानती है. जब भी पकड़ती है, 10 से 50 रुपये तक का चढ़ावा देना पड़ता है.

हालांकि मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार अजय कुमार कहते हैं, "मुख्यमंत्री जी का स्पष्ट आदेश है कि साइकिल से अपने घर के लिए कोयला ढोने वालों को पुलिस तंग नहीं करेगी. हां, व्यावसायिक उपयोग के लिए हो रही तस्करी पर पूरी तरह लगाम लगाना सरकार की प्राथमिकता में है."

झारखंड कोयला तस्कर

क्यों करते हैं, कैसे करते हैं?

"क्या करेंगे बाबू. दूसरा कुछ आता नहीं. यही काम ठीक है."

रोजगार नहीं

कुरथी ने बताया कि उनकी साइकिल का टायर हर छह महीने में घिस जाता है. बीस-बीस किलो की प्लास्टिक की बोरियों में करीब 150 किलो कोयला लादना आसान काम नहीं.

पिछले साल टीबी हुई थी. खांसी अब भी आती है. उन्होंने बताया कि पहले दिन कोयला लादने के बाद करीब 20 किमी की दूरी तय की जाती है.

फिर कहीं पर आराम. सोने के लिए सिर्फ उतनी ही जगह चाहिए, जितनी उनकी हाइट. चादर की जरूरत नहीं. दूसरे दिन अल सुबह निकलना. फिर सुस्ताते, टहलते 30 किमी की और दूरी.

झारखंड कोयला तस्कर

शाम ढलते ही वह ओरमांझी के उकरीद पहुंच जाते हैं. यहीं एक लाइन होटल में उनकी तरह के कई और लोग अपनी साइकिलें खड़ी कर सो रहे हैं.

कुरथी यहीं सो जाते हैं. सुबह 3 बजे ही निकलते हैं ताकि धूप निकलने से पहले रांची पहुंच जाएं. इस तरह सात बजे वह रांची पहुंच जाते हैं.

कोयला बिकता है, खरीदारी होती है और फिर बस की छत पर साइकिल लादकर घर वापसी. कुरथी महतो की यही कहानी है.

एक दिन आराम करने के बाद वह फिर से कोयला लादेंगे. वह सप्ताह में रांची के दो चक्कर लगाते हैं. औसत कमाई 2,000 रुपये प्रति सप्ताह. अगर बीमार नहीं हुए तो करीब 8000 रुपये महीना.

हजारों कुरथी महतो

झारखंड कोयला तस्कर

चुटुपालु-दुलमी, रामगढ़-बोकारो और बरही-हजारीबाग और पतरातू-रांची के बीच हमारा साक्षात्कार कई और कोयला तस्करों से होता है.

सबकी कहानी एक-सी. सबके रुटीन एक-से. कमाई एक-सी. सुस्ताने के अड्डे एक. परिवार की माली हालत भी एक ही जैसी.

इन सबके पास नाम मात्र ज़मीन है. खेती-किसानी से पेट नहीं भरता. रोजगार का दूसरा साधन नहीं.

यह झारखंड में साइकिल से कोयला तस्करी करने वालों की जिंदगी का वह कड़वा सच है, जो जानती सब सरकारें हैं, समझने की कोशिश कोई नहीं करती.

तस्करी रोकना मुश्किल

जेबी तुबिद
इमेज कैप्शन, झारखंड के पूर्व गृह सचिव जेबी तुबिद का कहना है कि तस्करी रोकना आसान नहीं है.

झारखंड में कोयले की 2,000 से भी ज्यादा छोटी-बड़ी खदानें हैं. कोयला तस्करी का कारोबार करोड़ों रुपये का है.

यहां हज़ारों लोग हर साल होने वाली करीब सवा सात लाख टन कोयले की तस्करी में शामिल होते हैं. साइकिल से कोयला तस्करी करने वालों की संख्या करीब 35,000 है.

झारखंड के पूर्व गृह सचिव जेबी तुबिद कहते हैं, "झारखंड में यह पुराना मामला है. सरकार जब तक इनके पुनर्वास का प्रबंध नहीं करेगी, तस्करी रोकना मुश्किल है. इसके साथ ही बंद घोषित खदानों को बालू से पूरी तरह भरना होगा ताकि उनसे खनन न हो."

"इनके लिए स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराकर पहले तो इनकी जांच करायी जानी चाहिए. फिर इनके लिए रोजगार के वैकल्पिक अवसर उपलब्ध कराए जाएं. तस्करी तभी रुक सकेगी."

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