बेग़म अख़्तर की पहली ग़ज़ल

बेगम अख़्तर
    • Author, प्रमोद द्विवेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

ग़ज़ल गायकी की मलिका कही जाने वाली बेग़म अख़्तर के मुरीद दुनिया भर में फैले हुए हैं.

उनके बारे में तमाम बातें कही-सुनी जाती हैं. बेगम अख़्तर से जुड़ी कुछ ऐसी बातें साझा कर रहे हैं पत्रकार प्रमोद द्विवेदी.

दीवाना बनाना है...

बेगम अख़्तर ने अख़्तरी बाई के तौर पर पहली ग़ज़ल गाई थी, 'तूने बुते हरजाई, कुछ ऐसी अदा पाई...'. लेकिन प्रचारित यह किया जाता है कि बहज़ाद लखनवी की 'दीवाना बनाना है तो...' उनकी पहली ग़ज़ल थी.

असल में इस ग़ज़ल ने उन्हें बेपनाह नामवरी दी. पंडित जसराज ने छह साल की उम्र में इसे सुना और ताउम्र उनके दीवाने बने रहे.

बेगम अख़्तर

तीस के दशक की शुरुआत में वो अपना नाम अख़्तरी बाई फैज़ाबाद बताती थीं, फैज़ाबादी नहीं.

गले में संक्रमण के कारण बाद में उनकी आवाज़ ऊपर जाकर चटक जाती थी. शस्त्रीय गायन के हिसाब से यह ऐब था. लेकिन आवाज़ के इस टूटने को बेगम की सितमगर 'पत्ती' कहा गया. बेगम अख़्तर ने इसे सुधारने की कोशिश भी नहीं की. वह पत्ती बेगम अख़्तर की ग़ज़लों की फूलदार पत्ती बनी.

आख़िरी फ़िल्म

हज यात्रा पर जातीं बेगम अख़्तर

उनकी गायकी पर सबसे ज़्यादा असर उस्ताद बहरे वहीद ख़ां का था. उस ज़माने की एक लोकगायिका प्रेमा बाई का असर उनके दादरों में देखा जा सकता है.

महबूब खां की 'रोटी' (1941-42) मुंबई में उनकी आखिरी फ़िल्म थी. संगीतकार अनिल विश्वास के कहने पर अख़्तरी बाई को फ़िल्म में लिया गया. उस जमाने में उन्हें 22 हज़ार रुपए दिए गए. लेकिन विवाद के कारण अख़्तरी बाई के गानों का रिकार्ड नहीं बन पाया.

बेगम अख़्तर की कब्र

इस घटना के बाद वो लखनऊ लौट गईं. अख़िरी बार उन्होंने सत्यजीत रे की बांग्ला फ़िल्म 'जलसाघर' में काम किया.

बैरिस्टर अब्बासी से शादी के बाद कई साल तक उन्होंने नहीं गाया. लखनऊ रेडियो के अधिकारी लव कुमार मल्होत्रा के कहने पर उन्होंने बेगम अब्बासी के नाम से गाया. बेगम अख़्तर नाम उन्हें मल्होत्रा ने ही दिया, जो ताउम्र उनके साथ रहा.

ज़िंदगी बना दी

एक बार पंजाब के शायर-कवि सुदर्शन फ़ाख़िर ने मंच पर जाकर उनसे अनुरोध किया कि वो एक बार उनकी ग़ज़ल गा दें तो जिंदगी बन जाएगी. इसके बाद बेगम अख्तर ने उनकी ग़ज़ल को वहीं सुर दिए और कहा कि ये बड़े गुनी शायर हैं. इसके बाद फ़ाख़िर मुशायरों की शान बन गए.

इसी तरह बहज़ाद लखनवी और याहिया जसदनवाला इसीलिए विख्यात हुए कि उनकी रचनाओं को बेगम अख़्तर ने आवाज दी.

बेगम अख्तर ने अख़िरी बार कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल गाई थी. लेकिन मौत के पहले ( अक्तूबर 1974 में ) अहमदाबाद में एक जलसे में क्रिकेटर मंसूर अली ख़ां पटौदी की फरमाइश पर एक ग़ज़ल गाई थी. यह उनकी आख़िरी ग़ज़ल थी.

कम लोगों को ही पता होगा कि बरसों तक लखनऊ के पसंद बाग़ में बेगम अख़्तर की क़ब्र पर ताला लगा रहा. अब उनके प्रशंसकों ने इसे खुलवा कर स्मारक बनवाया है जहां हर साल उन्हें याद किया जाता है.

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