36 शब्दों पर बैन लगाकर 'नियमों का पालन'

पहलाज निहलानी
    • Author, श्वेता पांडेय
    • पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत के फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड और विवादों का साथ नया नहीं है, लेकिन इन दिनों बोर्ड से जुड़े विवादों की झड़ी ही लग गई है.

लीला सैमसन के सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने पर काफ़ी विवाद हुआ. सैमसन ने बोर्ड के कामकाज़ में बाहरी दबाव होने का आरोप लगाया था.

सैमसन की जगह लेने वाले पहलाज निहलानी के कुर्सी संभालते ही उनके कुछ बयानों पर विवाद हुआ.

अब ताज़ा मामला बोर्ड की तरफ़ से फ़िल्मों में कुछ शब्दों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने का है जिसे लेकर तीखी बहस छिड़ गई है.

बीबीसी हिंदी ने इन्हीं मुद्दों को लेकर पहलाज निहलानी से की ख़ास बातचीत.

अचानक इतने विवाद?

बदलापुर

आख़िरकार उनके पद संभालने के बाद से ही विवाद थम क्यों नहीं रहे?

जवाब देने के लिए कुर्सी को धक्का लगाकर निहलानी टेबल के कुछ और क़रीब आकर कहते हैं, “विवाद पैदा किए जा रहे हैं. मैं तो सिर्फ़ गाइडलाइंस की बात कर रहा हूं."

वो कहते हैं, "जब मैंने गाइडलाइंस की टूटने की बात की, तो लोगों को बुरा लगा. मेरी बातों को पब्ल‍िक एक्ज़िबिशन बना दिया गया है.”

वह कहते हैं कि इन सब विवादों से बोर्ड के अध्यक्ष और प्रोड्यूसर के बीच बेवजह ग़लतफहमी बढ़ेगी.

नियम का पालन

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर

फ़ि‍ल्में तो पहले भी बनती थी और सेंसर भी होती थीं. सीन भी काटे जाते थे और डायलॉग में ‘बीप’ भी बजती थी.

लेकिन इतनी बेरुख़ी सेंसर ने कभी नहीं दिखाई कि फ़िल्मों में हिन्दी और अंग्रेजी के 36 शब्दों के प्रयोग पर रोक लगा दी हो.

आख़ि‍र नए बोर्ड अध्यक्ष, जो ख़ुद भी कई फ़ि‍ल्में प्रोड्यूस कर चुके हैं, उन्होंने एकसाथ इतने शब्दों को बैन क्यों किया?

इसपर वे कहते हैं, “फ़ि‍ल्मों में अनावश्यक अपशब्दों का प्रयोग होने लगा है. कई दफ़े डायलॉग न होने पर भी इनका प्रयोग किया जा रहा है. अपशब्दों का प्रयोग किसी भी प्रकार की रचनात्मकता को नहीं दिखाता.”

अपनी बात को ज़ोर देते हुए निहलानी कहते हैं कि इस प्रकार के सिनेमा से समाज पर बुरा असर पड़ता है.

उदाहरण देते हुए निहलानी ने बताया, “ख़जुराहो की प्रतिमाएं तो लोग नहीं लगाते न, तो फिर फ़ि‍ल्मों इस तरह की रचनात्मकता की बात क्यों करते हैं?”

जानकारी की कमी

आंधी

निहलानी ने यह भी साफ़ किया कि वे सिर्फ़ नियमों का पालन भर कर रहे हैं.

इस कार्रवाई में इतनी देर के कारण को बताते हुए कहते हैं, “मुझ से पहले जो भी अध्यक्ष बने, या तो उन्होंने गाइडलाइंस अच्छी तरह से पढ़ी नहीं, या उन्होंने दफ़्तर में बहुत कम वक़्त बिताया. इसलिए इसमें इतनी देर हुई.”

इसके अलावा वे फ़ि‍ल्मकारों की नई पीढ़ी को भी उलाहने देते हुए कहते हैं, “वर्ष 2006 से अब तक बनी फ़ि‍ल्मों में सेंसर गाइडलाइंस को ताक पर रखकर काम किया गया है.”

सुझाव देते हुए पहलाज कहा कि नए फ़ि‍ल्ममेकर्स को इन गाइडलाइंस को एक बार ज़रूर ध्यान से पढ़ना चाहिए, ताकि आगे उन्हें माली नुकसान का सामना न करना पड़ा.

रचनात्मकता का सवाल

पहलाज निहलानी

फ़िल्मों को साफ़ सुथरी क्या सिर्फ़ शब्दों को प्रतिबंधि‍त कर देना भर ही काफ़ी होगा?

इसके जवाब देते हुए पहलाज कहते हैं, “यदि कुछ हद से बाहर होगा, तो उसे सेंसर किया जाएगा. चाहे वो शब्दों हो या फिर सीन.”

लेकिन क्या इतने प्रतिबंध ज़रूरी हैं. इसके जवाब में कहा कि रचनात्मकता दिखाने के लिए भड़काऊ सीन और अपशब्द ज़रूरी नहीं हैं.

गालियों की लिस्ट

एम एस जी

कई बार कुछ अपशब्द स्वाभाविक भी होते है. ऐसे में उनको एकदम हटा देना, कितना सही है?

इस बात पर मुस्कुराते हुए वो बताते हैं, “इस बात से इनकार नहीं है, तभी कुछ प्रोड्यूसरों से जल्द ही मुलाक़ात करने जा रहा हूं. दरअसल, वे कुछ गालियों को फ़ि‍ल्म में प्रयोग करने की छूट चाहते हैं."

वो कहते हैं, "यदि सबकुछ ठीक रहा, तो उस सूची को लेकर सरकार के सामने जाऊंगा और उन्हें गाइडलाइंस में शामिल करने की कोशि‍श करूंगा.”

वहीं टेलीविज़न और पर्सनल वीडियो के बारे में निहलानी ने बताया कि वे सेंसर बोर्ड के दायरे में नहीं आते, उनकी अपनी अलग रेगुलेटिंग बॉडी है.

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