रायगढ़ भूस्खलन: अब तक 22 की मौत, मलबे में दबे लोगों की तलाश जारी, क्या बचाई जा सकती थी जानें?

रायगढ़ में भूस्खलन
    • Author, दीपाली जगताप
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई, रायगढ़ से
  • प्रकाशित

‘हमने पुनर्वास की मांग की, नौकरी मांगी. लेकिन हमें कुछ नहीं मिला. बहुत भारी बारिश हो रही थी, तो हमने हमने तलहटी में अपनी झोपड़ी बना ली. लेकिन वन विभाग के अधिकारियों ने उसे भी तोड़ दिया.' - इरशालवाड़ी हादसे में बचे लोगों का कुछ ये कहना है.

महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के इरशालवाड़ी गांव में गुरुवार को भारी बारिश के बाद हुए भूस्खलन से 22 लोगों की मौत हो चुकी है, 21 लोग घायल हैं जबकि 86 लापता लोगों की तलाश जारी है.

प्रशासन के अनुसार भूस्खलन प्रभावित 229 लोगों में से 143 लोगों को खोज निकाला गया है.

ये पहाड़ के पास बसा एक दूरदराज का गांव है. प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर इस गांव में महज़ 48 घर हैं. यहां की आबादी सिर्फ़ 228 है.

रायगढ़ में भूस्खलन
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे
इमेज कैप्शन, भूस्खलन से प्रभावित रायगढ़ के इरशालवाड़ी गांव पहुंचे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे.

गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली कोई सड़क ही नहीं है. इस वजह से गांव के लोगों को शिक्षा और इलाज जैसी मूलभूत सुविधाएं भी मुहैया नहीं हैं.

गांव के लोगों का कहना है कि उनसे लिए रोज़गार की भी समस्या है. इसलिए गांव के लोगों ने पुनर्वास की मांग की थी, लेकिन उनका कहना है कि ये मांग अब तक पूरी नहीं हो पाई है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर गांव के लोगों को कहीं और बसा दिया जाता तो क्या इस हादसे में मरने वालों की जानें बचाई जा सकती थीं.

इरशालवाड़ी के एक निवासी
इमेज कैप्शन, इरशालवाड़ी के एक निवासी जो कहते हैं कि उन्होने सरकार से पुनर्वास की मांग की थी लेकिन उनकी मंग को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
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सरकार पर उठ रहे सवाल

लोग कह रहे हैं कि जब राज्य के कई इलाक़ों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई, ख़ासतौर से कोंकण इलाके में, तब सरकार ने ऐसे संवेदनशील इलाक़े के लोगों की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी क़दम क्यों नहीं उठाए?

विपक्ष का आरोप है कि सरकार, कुर्सी बचाने के लिए विधायकों की जोड़-तोड़ में ही व्यस्त रही और बारिश और बाढ़ से निपटने के उसने पर्याप्त इंतज़ाम किए ही नहीं.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता अमित ठाकरे ने इस तरह के आरोप लगाए.

हालांकि सरकार का कहना है कि हादसे के फ़ौरन बाद बचाव और राहत का काम शुरू कर दिया गया था.

20 जुलाई को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ प्रदेश सरकार के कई और मंत्री भी दुर्घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. उप मुख्यमंत्री अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस भी कंट्रोल रूम से स्थिति पर नज़र बनाए हुए थे.

लेकिन सरकार पर लगातार सवाल ये उठ रहे हैं कि ऐसे ज़रूरी क़दम क्यों नहीं उठाए गए जिससे ये हादसा होता ही नहीं.

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लापरवाही के आरोप पर सरकार का पक्ष

महाराष्ट्र पिछले एक साल से राजनीतिक उठापटक से जूझ रहा है. यहां पार्टियों में बग़ावत, विधायकों की जोड़-तोड़, मुक़दमेबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नेता राज ठाकरे कहते हैं, “इरशालवाड़ी में हुआ हादसा बेहद दुखद है. मैं घायल लोगों के स्वस्थ होने की कामना करता हूं."

"मैं हादसे के फ़ौरन बाद ज़्यादा कुछ नहीं बोलना चाहता था लेकिन अगर ज़िला प्रशासन इस बात का अनुमान नहीं लगा पा रहा है कि कौन से इलाक़ों में भूस्खलन हो सकता है तो ये किस तरह का ज़िला प्रशासन है”.

रायगढ़ में भूस्खलन

कांग्रेस नेता नाना पटोले ने 20 जुलाई को दुर्घटनास्थल का दौरा किया. उन्होंने हादसे में बचे लोगों से मुलाक़ात की.

उन्होंने कहा, “अगर इरशालवाड़ी के लोगों को समय रहते सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया जाता तो ये हादसा नहीं होता. सरकार ने समुचित क़दम नहीं उठाए."

"अगर राज्य में भारी बारिश की चेतावनी थी तो भूस्खलन की आशंका वाले इलाक़ों से लोगों को हटाया जाना चाहिए था. तब कई लोगों की जान बच सकती थी.”

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वहीं बीबीसी मराठी से बात करते हुए राहत और पुनर्वास मंत्री अनिल पाटिल कहते हैं, "गांव के पुनर्वास पर विचार विमर्श चल रहा है. 2021 तक ये नियम था कि किसी हादसे के बाद वहां के लोगों का पुनर्वास किया जाता है."

"लेकिन 2021 के बाद से ये तय किया गया कि ऐसे ख़तरनाक इलाक़ों को पहचाना जाए और वहां के लोगों का पहले ही पुनर्वास करा दिया जाए. ये गांव भी इस लिस्ट में है."

उनका कहना है, "पहले ये इस लिस्ट में नहीं था. अब कलेक्टर को कह दिया गया है कि लोगों का पुनर्वास कराया जाए.”

मुख्यमंत्री एकनाश शिंदे गुरुवार को हादसे की जगह पर गए. उन्होंने बताया कि स्थानीय अधिकारियों से गांव के लोगों के स्थाई पुनर्वास को लेकर चर्चा की गई.

उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि गांव बेहद दूरदराज के इलाक़े में हैं और वहां पहुंचना बेहद दुर्गम है.

उन्होंने कहा कि ये गांव बेहद संवेदनशील इलाक़ों की श्रेणी में नहीं आता और यहां इससे पहले इस तरह का कोई हादसा कभी नहीं हुआ.

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ

पश्चिमी घाट के इकोसिस्टम पर रिसर्च के लिए बनाई गई गाडगिल कमेटी ने अगस्त 2011 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी.

विपक्ष ने इसी को लेकर सरकार से पूछा कि इस कमेटी की रिपोर्ट पर अमल क्यों नहीं किया गया?

संवेदनशील इलाक़े में रहने वाले लोगों का पुनर्वास क्यों नहीं कराया गया. क्या सरकार हादसे का इंतज़ार कर रही थी?

इसके जवाब में उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि सरकार ने गाडगिल कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक़ संवेदनशील गांवों की पहचान कर ली है और इन्हें लेकर राज्य सरकार की जो योजना है वो केंद्र सरकार को सौंप दी गई है.

वहीं वरिष्ठ पर्यावरणविद माधव गाडगिल सरकार की आलोचना करते हुए कहते हैं, "वेस्टर्न घाट्स बायोडार्विसिटी एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट सरकार को सौंपी जा चुकी है. अगर इस रिपोर्ट में की गई सिफ़ारिशों पर समय रहते अमल कर लिया जाता तो कई हादसे टाले जा सकते थे."

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