असम में बाढ़ के दौरान दिखी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मदद के लिए उठे कई हाथ - ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, शिवसागर से बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

असम की 67 साल की मनोवारा बेगम शिवसागर गुरुद्वारा साहिब के एक हॉल के कोने में उदास बैठी हुई हैं.

उनके बगल में बैठी अमिया गोगोई उन्हें दिलासा देती दिख रही हैं. इसी गुरुद्वारे में अबुल कासिम और राजू प्रसाद अपने परिवार के साथ रह रहे हैं.

बाढ़ ने इन लोगों का सबकुछ तबाह कर दिया है लेकिन इस गुरुद्वारे की छत के नीचे धर्म और जात से परे अगर कुछ दिखाई दिया था तो वो था एक-दूसरे के प्रति सम्मान और मोहब्बत.

अबुल कासिम कहते हैं, "बाढ़ के पानी में घर डूबने के बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर गुरुद्वारे में शरण लेने आ गया. मुझे न तो कोई डर लगा और न ही मेरे मन में कोई और विचार आया. इस मुश्किल समय में यहां हम सब लोग एक-दूसरे का ख्याल रख रहे हैं."

पिछले महीने असम में आई बाढ़ से शिवसागर ज़िले भारी बर्बादी हुई. अब भले ही बारिश कम हो गई है और कई इलाकों से बाढ़ का पानी उतर गया है. लेकिन दोबारा बसने की जद्दोजहद ने बाढ़ पीड़ितों के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

सैकड़ों ऐसे परिवार हैं, जिन्हें अब भी पीने का पानी ठीक से नहीं मिल पा रहा.

अबुल के बगल में खड़े राजू प्रसाद कहते हैं, "यहां किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान. हम यहां गुरुद्वारे में भाई-भाई की तरह मिलकर रह रहे हैं."

शिवसागर शहर से बीबीसी की टीम जैसे-जैसे नेपाली खुटी गांव की तरफ आगे बढ़ी, रास्ते में जितने भी गांव मिले ज्यादातर के घरों में मलबा और कीचड़ भरा हुआ था.

बाढ़ के कारण विस्थापित हुए कई लोग आज भी अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं. लेकिन इन मुश्किलों के बीच इलाके में इंसानियत की कई मिसालें भी देखने को मिल रही हैं.

जाति और धर्म से परे लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. बाढ़ पीड़ित न केवल एक साथ रह रहे हैं बल्कि हिंदुओं के पूजा स्थल में भरे मलबे को मुसलमान साफ कर रहे हैं तो मस्जिदों की सफाई हिंदू युवक करते दिख रहे हैं.

कई इलाकों से लोग मजदूरों को लेकर शिवसागर पहुंच रहे हैं ताकि अनके घरों से कीचड़ और मलबा साफ करवा सके.

यहां काम करने के लिए लाए जा रहे ज़्यादातर मजदूर बंगाली मूल के मुसलमान हैं, जिन्हें बोलचाल की भाषा में 'मियां' कहा जाता है.

विधानसभा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक राजनीति के कारण शिवसागर था सुर्ख़ियों में

महज चार महीने पहले अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान शिवसागर सांप्रदायिक राजनीति के कारण सुर्खियों में था. चुनाव से ठीक पहले शिवसागर ज़िले में 'मियां मुसलमानों' को खदेड़ने और पीटने की कई घटनाएं सामने आई थीं.

कुछ संगठनों ने जिले से मियां लोगों को खदेड़ने के लिए शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए थे. परंतु इस बाढ़ में लोगों ने जिस कदर एक-दूसरे की जान बचाई और मदद की, उसने एक नई मिसाल पेश की है.

शिवसागर गुरुद्वारे की संचालन कमेटी के अध्यक्ष त्रिलोचन सिंह कहते हैं, "हमारे गुरुद्वारे में हर समुदाय के लोग ठहरे हुए हैं. हम जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. बाढ़ ने यह दिखा दिया है कि वो किसी मजहब को देखकर तबाही नहीं लाती."

हालांकि शिवसागर शहर में प्रवेश करते ही असमिया भाषा में लिखा होर्डिंग दिख जाता है जिस पर इलाके से "मियां मुसलमानों" को बाहर निकालने और असम को बचाने का नारा लिखा है.

इस तरह के कई होर्डिंग कई अलग-अलग जगहों पर भी दिखाई देते हैं.

मुसलमान राजमिस्त्री ने बचाई छह लोगों की जान बचाई

शिवसागर ज़िले के नेपाली खुटी गांव में बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है. इस गांव में प्रवेश करते ही पहला मकान पेशे से सरकारी शिक्षक उत्पल बरुआ का है. बाढ़ में भारी नुकसान झेल चुके बरुआ 19 जुलाई की शाम को याद कर रोने लगते हैं.

वो कहते हैं,"उस दिन पांच मिनट के अंदर पानी कमर तक आ गया था. घर में मेरे बुजुर्ग माता-पिता, पत्नी, छोटा बेटा और बहू थी. हम जब तक घर से निकलते पानी चारों तरफ तेजी से बढ़ गया था. कुछ मिनट बाद लगा कि अब हम में से कोई नहीं बचेगा."

"लेकिन मेरे नए घर पर काम कर रहे राजमिस्त्री नाज़िकुल अली ने समझदारी दिखाई. वह नए घर की छत से पानी में कूदे, कंस्ट्रक्शन के लिए लाए गए बांस इकट्ठा किए और उनकी मदद से सभी को एक-एक करके छत पर चढ़ाया. यह बहुत जोखिम भरा काम था, लेकिन नाज़िकुल ने हमारे परिवार को बचाने के लिए खुद को खतरे में डाला."

शिवसागर में सांप्रदायिक राजनीति से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए उत्पल बरुआ कहते हैं, "जो लोग हिंदू-मुस्लिम की बातें करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि संकट के समय एक इंसान ही दूसरे इंसान की मदद के लिए आगे आता है. मैं हिंदू हूं, फिर भी एक मुस्लिम ने ही मेरे परिवार की जान बचाई. अगर उस दिन नाज़िकुल वहां न होते, तो मेरा पूरा परिवार ख़त्म हो गया होता. हिंदू-मुस्लिम का जो भेद करते हैं, उस दिन अपने काम से नाज़िकुल ने बता दिया कि सबसे पहले इंसान है. नाज़िकुल हमारे लिए ईश्वर तुल्य है."

जब नाज़िकुल से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, "हिंदू-मुसलमान के नाम पर कौन क्या बातें करता है, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता. कोई भी इंसान आंखों के सामने किसी आदमी को मरने के लिए नहीं छोड़ सकता. मास्टर जी का परिवार मुसीबत में था, उस समय कौन हिंदू है,कौन मुसलमान है , यह बात कैसे कोई सोच सकता है? आदमी को बचाना है. हम मुसलमान हैं, वो हिंदू हैं, इस बात से ज़रूरी उस इंसान की जान है.मैंने बस इतना सोचा कि जो आदमी अभी मरने वाला है उसे मुझे बचाना है."

मोरीगांव के रहने वाले नाज़िकुल ने भी शिवसागर शहर में मियां मुसलमानों को खदेड़ने को लेकर लगाए गए पोस्टर देखे हैं.

वो कहते हैं,"इस तरह की बातों से दुख तो लगता है. लेकिन जिसे जो बोलना है, बोलने दीजिए. मेरे लिए इंसान सबसे पहले है."

'हिंदू-मुसलमान करने से क्या होगा'

बाढ़ में घर डूब जाने के बाद फ़िरोज़ा बेगम और उनका परिवार कई दिनों से हिंदू पड़ोसी के मकान में रह रहा है.

फ़िरोज़ा बेगम कहती हैं,"घर में जब पानी भर गया तो हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बची थी. यह बात जब हमारे पड़ोसी को पता चली तो उन्होंने हमारे परिवार को अपने घर पर रुकने की जगह दी."

जिस हिंदू व्यक्ति के मकान में फ़िरोज़ा रुकी हुई हैं, उनके ठीक सामने सड़क किनारे मियां मुसलमानों को असम से भगाने वाला बड़ा होर्डिंग लगा हुआ है.

फ़िरोज़ा कहती हैं, "जब लोग हिंदू-मुसलमान की बात करते हैं तो बहुत दुख होता है, खासकर इसलिए क्योंकि हम यहां एक साथ भाईचारे से रहते हैं. राजनीति सब कुछ खराब कर देती है."

बाढ़ वाले दिन मस्जिद की छत पर चढ़कर अपनी जान बचाने वाले गणेश महतो और दीनानाथ भी कुछ ऐसा ही कहते हैं.

19 जुलाई को गणेश महतो और दीनानाथ सोनटक के बाज़ार में सब्जियां और किराने का सामान बेचने गए थे. लेकिन शाम ढलने से पहले बाढ़ का पानी इतनी तेजी से आया कि वो अपना कोई सामान नहीं बचा सके.

उस भयानक मंजर को याद करते हुए गणेश महतो कहते हैं, "पानी तेज़ रफ्तार से बढ़ रहा था और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था. पास की मस्जिद के जुनाब ने ख़तरे को देखते हुए कहा कि मस्जिद में चलिए. वरना मुसीबत हो जाएगी. जब तक हम मस्जिद की तीन मंजिला छत पर गए, सड़क पर पानी 8-10 फीट ऊंचाई तक आ गया था. अगर मस्जिद में नहीं गए होते तो आज जिंदा नहीं होते."

हिंदू-मुस्लिम के नाम पर होने वाली सांप्रदायिक राजनीति पर गणेश कहते हैं, "संकट के समय जान तो मस्जिद जाकर ही बची है. हिंदू-मुसलमान करने से क्या होगा? हम साधारण लोग हैं और किसी से नफ़रत नहीं करते. जो राजनीति में घुसे हुए हैं, वो लोग हिंदू-मुस्लिम के नाम पर छेड़खानी करते हैं. लेकिन हम सब यहां भाई-भाई की तरह रहते हैं."

दीनानाथ कहते हैं, "मस्जिद की छत पर महिलाएं और बच्चे सभी थे. उस समय सबको अपनी जान की पड़ी थी. जुनाब ने कहा कि अल्लाह ने भी सबसे पहले इंसान की जान बचाने की बात कही है. राजनीति वाले हिंदू-मुस्लिम करते रहें, उससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है."

मस्जिद के इमाम रियाजुर रहमान कहते है, "इंसान की जान बचाना फ़र्ज़ है. चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान हो. इसलिए उस रोज जब लोग बाढ़ के पानी में घिर गए तो मैंने उन सभी को मस्जिद में आने के लिए कहा. तीन मंजिला मस्जिद की छत पर लोग कई दिनों तक एक साथ रहे."

मदद के लिए आगे आ रहे हैं लोग

करीब साढ़े 13 लाख आबादी वाले शिवसागर ज़िले में जब से बाढ़ आई है, देशभर से लोग मदद के लिए आगे आए हैं. फिर चाहे सिख समुदाय के संगठन हों या जमीयत उलेमा-ए-हिंद.

बॉलीवुड की कई जानीमानी हस्तियों से लेकर उद्योग जगत तक के लोगों ने शिवसागर के लोगों का ख्याल रखा है.

जो संगठन कुछ महीनों पहले तक मियां मुसलमानों के ख़िलाफ़ थे, वे भी अब एक दूसरे की मदद के लिए ज़मीन पर काम करते दिख रहे हैं.

दरअसल मियां मुसलमानों को असम से भगाने वाले यह होर्डिंग 'जातीय संग्रामी सेना' नामक एक स्थानीय संगठन ने लगाए थे.

इस संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष सीटू बरुआ ने इस साल मार्च में कहा था, "स्वर्गदेव चाओलुंग सुकाफा, महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव, महापुरुष माधवदेव की इस धरती पर मियां लैंड बनाने की साजिश को उखाड़ फेंकेंगे. "

"यह असम यहां के प्रत्येक मूल निवासी भूमि पुत्र की पैतृक संपत्ति है. यहां हमारे पूर्वजों का योगदान है. यहां मियां लोगों का कोई योगदान नहीं है. उन्हें अपना हक़ जमाना है तो बांग्लादेश जाएं. हम मियां को किसी कीमत पर असम में रहने नहीं देंगे."

लेकिन बाढ़ की बर्बादी के समय पीड़ितों की मदद के लिए जिस कदर समूचे देश से लोगों ने मदद की, इसके बाद सीटू बरुआ भी सोचने पर मजबूर हो गए.

बाढ़ के बाद उन्होंने 30 जुलाई को कहा, "बाढ़ हिंदू-मुसलमान नहीं देखती. बाढ़ प्रभावित गांवों में छोटे बच्चे एक पानी की बोतल के लिए तरस रहे थे. भूखे बच्चे बिस्कुट के लिए गिड़गिड़ा रहे थे. इससे बुरा और क्या हो सकता है? संकट के इस समय में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद समेत कई मुस्लिम संगठन हमारी मदद के लिए आगे आए हैं."

उन्होंने आगे कहा, "यह हिंदू-मुस्लिम या असमिया-गैर असमिया जैसी बातें करने का समय नहीं है. जो लोग मियां खदेड़ने की बात को लेकर मेरी आलोचना कर रहे हैं, मैं उनकी निंदा करता हूं. संकट के इस समय में धर्म-जाति से परे हम सबको एक साथ हाथ पकड़कर आगे बढ़ने की ज़रूरत है."

भारत रत्न से सम्मानित संगीतकार डॉ. भूपेन हजारिका 1961 में "मानुहे मानुहोर बाबे" नाम का एक लोकप्रिय असमिया गीत लिखा था.

इस गीत की प्रासंगिकता आज के समय में सबसे ज्यादा महसूस हो रही है.

उस गीत की एक लाइन देखिए: मानुहे मानुहोर बाबे..जदीहे अकोनो नेभावे.

इसका मतलब है कि अगर इंसान एक-दूसरे के बारे में नहीं सोचेंगे, अगर वे ज़रा भी हमदर्दी नहीं दिखाएंगे-तो फिर कौन दिखाएगा?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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