तुकाराम मुंढे: खाने के सामान में मिलावट के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले आईएएस कौन हैं?

तुकाराम मुंढे

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इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र में एफ़डीए आयुक्त तुकाराम मुंढे की एनालॉग पनीर और मिलावटी खाद्य सामग्री के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाइयों के चलते वो अन्य राज्यों में भी चर्चा में आ गए
    • Author, नितिन सुलताने
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

"अगर कोई आदत बदलनी हो तो पहले पुरानी आदत छोड़नी पड़ती है और नई आदत अपनानी पड़ती है. इस दौरान काफ़ी उलझन होती है. शोर होता है, विरोध होता है और तनाव पैदा होता है."

तुकाराम मुंढे ने हाल ही में एक इंटरव्यू में यह बात कही थी. यह विचार उनकी अब तक की कार्यशैली से भी मेल खाता है.

शायद इसी वजह से उन्हें अपनी सेवा के कुल सालों से भी ज़्यादा बार तबादलों का सामना करना पड़ा है. लेकिन उनका कहना है कि हर तबादला बदलाव लाने का एक नया मौक़ा होता है.

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफ़डीए) आयुक्त बनने के बाद उन्होंने मिलावटी, केमिकल युक्त, नक़ली और नियमों के ख़िलाफ़ रंगों का इस्तेमाल करने वाले खाद्य उत्पादकों और कारोबारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू की.

उनकी कार्रवाई की चर्चा पूरे महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में भी हो रही है. ख़ास तौर पर घटिया पनीर के ख़िलाफ़ कार्रवाई और उसके बाद एक साल के लिए एनालॉग पनीर पर प्रतिबंध की वजह से वो चर्चा में हैं.

हालाँकि सख़्त कार्रवाई की यह उनकी पहली घटना नहीं है. इससे पहले भी वो जिस विभाग में गए, वहाँ उन्होंने इसी तरह काम किया. इसी कारण उनके बार-बार तबादले होने की चर्चा होती रही है.

बीबीसी मराठी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि तबादले सरकारी सेवा का हिस्सा होते हैं, इसलिए वो इसकी चिंता किए बिना अपना काम करते रहते हैं.

बीड ज़िले के एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ उनका सफ़र आज महाराष्ट्र के सबसे चर्चित अधिकारियों में गिना जाता है. आइए उनके इस सफ़र को समझते हैं.

तुकाराम मुंढे कौन हैं?

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इमेज कैप्शन, तुकाराम मुंढे 2005 में आईएएस बने, उन्होंने पूरे भारत में 20वीं रैंक हासिल की थी

तुकाराम मुंढे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर के अधिकारी हैं. फ़िलहाल वो महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के आयुक्त हैं.

महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा चर्चा में रहने वाले अधिकारियों में उनका नाम शामिल है. उनकी कार्यशैली अक्सर मीडिया की सुर्ख़ियों में रहती है.

बीड के ताडसोन्ना गाँव के रहने वाले मुंढे किसान परिवार से आते हैं. आर्थिक कठिनाइयों के बीच संघर्ष करते हुए उन्होंने आईएएस बनने तक का सफ़र तय किया.

उनके साथ काम करने वाले अधिकारी, कर्मचारी और कई बार जनप्रतिनिधि भी उनकी कार्यशैली की शिकायत करते रहे हैं.

काम के दबाव को लेकर शिकायतें

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इमेज कैप्शन, तुकाराम मुंढे कहते हैं कि वो नियमों के दायरे में रहकर काम करते हैं
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तुकाराम मुंढे की कार्यशैली को लेकर कई बार कर्मचारी भी नाराज़ रहे हैं.

नई जगह कार्यभार संभालने के बाद वो सबसे पहले कर्मचारियों की अनुशासन व्यवस्था पर ध्यान देते हैं. दफ़्तर आने का समय भी उनके लिए महत्वपूर्ण होता है.

एफ़डीए में आने के बाद छत्रपति संभाजीनगर के कुछ कर्मचारियों ने भी शिकायत की थी.

कर्मचारियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें दो शिफ़्टों में काम करना पड़ रहा है. साथ ही शनिवार, रविवार और सार्वजनिक छुट्टियों में भी काम करने के आदेश दिए गए हैं. ख़ाली पदों की वजह से काम का बोझ बढ़ने की बात भी कही गई थी.

एबीपी माझा को दिए एक इंटरव्यू में तुकाराम मुंढे ने स्पष्ट किया था कि किसी को भी नियमों के ख़िलाफ़ काम के लिए मजबूर नहीं किया गया. पहले जो काम नहीं हो रहा था, उसे नियमानुसार शुरू किया गया है.

उन्होंने कहा कि प्रयोगशालाओं में शिफ़्ट व्यवस्था पहले से मौजूद है, किसी कर्मचारी से रोज़ आठ घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाता.

"सप्ताह में 48 घंटे से ज़्यादा काम भी नहीं कराया जाता. लेकिन सभी लोग केवल सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ही काम करना चाहें तो यह संभव नहीं है."

मुंढे और विवाद: काम न होने पर 660 कर्मचारियों को नोटिस

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इमेज कैप्शन, वरिष्ठ पत्रकार सुनील माली का मत है कि मुंढे ईमानदार अधिकारी हैं लेकिन वो व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने में सफल नहीं हो पाते

सोलापुर में पहली नियुक्ति

प्रशिक्षण के बाद उनकी पहली नियुक्ति सोलापुर में सहायक ज़िलाधिकारी के रूप में हुई थी.

वहाँ उनकी पहली कार्रवाई ही विवादों में आ गई. बाद में अतिक्रमण हटाने के अभियान को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ.

उन्होंने सोलापुर में सहायक ज़िलाधिकारी, ज़िलाधिकारी और नगर निगम आयुक्त जैसे पदों पर काम किया.

ज़िलाधिकारी रहते हुए एक ट्रक दुर्घटना में कई वारकरी श्रद्धालुओं की मौत हुई थी. उस समय भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने पुलिस फ़ायरिंग के आदेश दिए थे. इस घटना की भी काफ़ी चर्चा हुई थी.

नागपुर में पहला कार्यकाल

2008 में वो नागपुर ज़िला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने.

उन्होंने शिक्षकों की समय पर उपस्थिति अनिवार्य की. ड्रेस कोड लागू किया. यहाँ तक कहा कि सुबह दस बजे तक शिक्षक नहीं आए तो पाँच मिनट बाद स्कूल का दरवाज़ा बंद कर दिया जाएगा.

इस वजह से विरोध भी हुआ. हालांकि उनके कार्यकाल में ज़िला परिषद को आईएसओ प्रमाण भी मिला.

बाद में वाशिम ज़िला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहते हुए उन्होंने एक ग्राम सेवक यूनियन नेता को निलंबित किया था. विवाद इतना बढ़ा कि उस नेता ने उन पर पेपरवेट फेंक दिया.

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इमेज कैप्शन, कोरोना काल में उनकी कार्यशैली को लेकर भी बहस हुई

पुणे सरकारी परिवहन कंपनी के सीईओ

पुणे महानगर परिवहन महामंडल लिमिटेड या पीएमपीएमएल में उनकी नियुक्ति के बाद भी कई विवाद हुए.

उन्होंने कई प्रशासनिक फ़ैसले लिए, जिन पर उन्हें आलोचना और प्रशंसा दोनों मिली.

एक मामले में उन्होंने 660 कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे. यह मुद्दा काफ़ी चर्चित रहा.

किराया वृद्धि, कर्मचारियों से टकराव और अन्य कारणों से भी वे चर्चा में रहे. एक साल के भीतर ही उनका तबादला कर दिया गया.

फिर नागपुर में नियुक्ति

महाविकास आघाड़ी सरकार के दौरान उनकी नियुक्ति नागपुर महापालिका आयुक्त के रूप में हुई. महापौर संदीप जोशी और तुकाराम मुंढे के बीच शुरू से मतभेद देखने को मिले.

कोरोना काल में उनकी कार्यशैली को लेकर भी बहस हुई.

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि वे किसी को विश्वास में नहीं लेते. मुंढे ने कहा कि सभी निर्णय संबंधित लोगों को बताए जाते हैं.

दिव्यांग कल्याण विभाग में भी उनके काम की प्रशंसा और आलोचना दोनों हुई. वहाँ उनका कार्यकाल केवल नौ महीने रहा. इसके बाद उनकी बदली एफ़डीए आयुक्त पद पर हुई.

नवी मुंबई में अविश्वास प्रस्ताव

नवी मुंबई नगर निगम आयुक्त रहते हुए उनके ख़िलाफ़ सत्ताधारी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था. यह प्रस्ताव बहुमत से पारित भी हो गया था. इसके बाद जनता ने उनके समर्थन में प्रदर्शन किया था.

'काम का फ़ायदा लोगों को मिलना चाहिए'

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इमेज कैप्शन, मुंढे बचपन में साप्ताहिक बाज़ारों में सिर पर टोकरी रखकर सब्ज़ियाँ बेचने भी जाते थे

तुकाराम मुंढे के तबादले के बाद बीबीसी ने कुछ पूर्व अधिकारियों से बात की थी और इस बारे में उनकी राय जानी.

इस दौरान पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ईज़ेड खोबरागड़े ने कहा कि सिविल सेवकों को किसी पद पर कम से कम दो साल काम करने का मौक़ा मिलना चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों को अपने काम का प्रचार करने के बजाय शांतिपूर्वक काम करना चाहिए. अगर कोई अधिकारी अच्छा काम कर रहा है तो सरकार और प्रशासन को उसका संरक्षण भी करना चाहिए.

सेवानिवृत्त अधिकारी महेश झगड़े ने कहा कि किसी अधिकारी का मूल्यांकन केवल विवादों से नहीं होना चाहिए. यह भी देखा जाना चाहिए कि उसके काम से आम लोगों को कितना लाभ हुआ.

राजनीतिक विश्लेषक रवि किरण देशमुख के अनुसार, तुकाराम मुंढे तेज़ी से काम करने वाले अधिकारी हैं. लेकिन उनकी कार्यशैली कई बार सरकारों को पसंद नहीं आती. वो जहाँ जाते हैं, बदलाव लाने की कोशिश करते हैं. इसी वजह से टकराव पैदा होता है और तबादले होते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राजा माने के अनुसार, उनकी कार्यशैली जनभावना से ज़्यादा क़ानून पर आधारित है. वो हर बात में नियम और जनहित को प्राथमिकता देते हैं.

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार सुनील माली का मत है कि मुंढे ईमानदार अधिकारी हैं और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते, लेकिन वो व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने में सफल नहीं हो पाते.

मुंढे इन सभी आलोचनाओं पर साफ़ कहते हैं कि वो हमेशा अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर काम करते हैं. उनके अनुसार लोगों की राय से ज़्यादा महत्वपूर्ण ईमानदारी से काम करना है.

कोरोना काल में उन पर प्रचार पाने के लिए काम करने का आरोप भी लगा था. उन्होंने इसे ख़ारिज करते हुए कहा था कि अधिकारियों को प्रसिद्धि की ज़रूरत नहीं होती.

संघर्ष से मिली सफलता

मुंढे

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इमेज कैप्शन, उनके बड़े भाई अधिकारी बने जो उनके प्रेरणास्रोत थे

शफ़ी पठान की पुस्तक "तुकाराम" में उनके निजी जीवन की कई बातें दर्ज हैं.

तुकाराम मुंढे का जन्म बीड ज़िले के ताडसोन्ना गाँव में हुआ था. बाद के वर्षों में कृषि संकट और अन्य कारणों से वहाँ के कई परिवार आर्थिक कठिनाई में आ गए. उनका परिवार भी उन्हीं में से एक था.

बचपन से ही उन्हें मेहनत और संघर्ष की आदत पड़ गई थी. पढ़ाई के साथ उन्हें खेतों में भी काम करना पड़ता था.

पुस्तक के अनुसार तीसरी कक्षा से ही वो हल चलाने जैसे काम करने लगे थे. उनके बड़े भाई अशोक मुंढे अधिकारी बने थे. वही उनके प्रेरणास्रोत थे.

वो साप्ताहिक बाज़ारों में सिर पर टोकरी रखकर सब्ज़ियाँ बेचने भी जाते थे.

उनके दूसरे भाई बाबासाहेब पोलियो से प्रभावित थे. तुकाराम उन्हें कंधे पर बैठाकर स्कूल ले जाते थे और उनकी देखभाल भी करते थे.

शुरू में उनके पिता उन्हें पढ़ाई के लिए औरंगाबाद भेजने के ख़िलाफ़ थे. लेकिन बड़े भाई अशोक मुंढे उन्हें अपने साथ ले गए.

इसके बाद उन्होंने औरंगाबाद में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई की. फिर पुणे, मुंबई और दिल्ली में एमपीएससी (महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन) और यूपीएससी की तैयारी की.

उन्होंने एमपीएससी भी पास की थी. नीट परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी और फ़ैलोशिप प्राप्त की थी.

आईएएस बनने का रास्ता आसान नहीं था. काफ़ी संघर्ष के बाद 2005 में उनका सपना पूरा हुआ. उन्होंने पूरे भारत में 20वीं रैंक हासिल की थी.

भविष्य में प्रशासनिक सेवा में आने वाले विद्यार्थियों को सलाह देते हुए मुंढे कहते हैं, "अगर आप सिर्फ़ अपना भला करने के लिए इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, तो प्रशासनिक सेवा में मत आइए. लेकिन अगर आप सार्वजनिक विकास और नैतिक मूल्यों के साथ काम करने के लिए तैयार हैं, तभी इस क्षेत्र में आइए."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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