दिल्ली पुलिस विरोध-प्रदर्शन की अनुमति ना देकर क्या मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर रही है?

राहुल गांधी
इमेज कैप्शन, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफ़े की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन के दौरान संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन परिसर में बैठे हुए
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दिल्ली पुलिस केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन की इजाज़त नहीं दे रही है.

विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को विरोध प्रदर्शन करने पर हिरासत में ले रही है.

दिल्ली पुलिस के इस रुख़ पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

पहला सवाल यही है कि क्या दिल्ली पुलिस भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में हर नागरिक को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन कर रही है?

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान के इसी अनुच्छेद में निहित है और लोकतंत्र में इसे बहुत ही अहम माना गया है.

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी दिल्ली पुलिस के रुख़ पर सवाल उठाते हुए कहा है, "शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार सरकार की अनुमति पर निर्भर नहीं है. यह भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के तहत संरक्षित है."

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (b) भारत के सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों प्रावधानों को मिलाकर प्रदर्शन के अधिकार का संवैधानिक आधार माना है.

मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में 23 जुलाई 2018 को दिए गए फ़ैसले के पैराग्राफ 61 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "निस्संदेह, लोगों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन और विरोध करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत दिया गया मौलिक अधिकार है."

वीडियो कैप्शन, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के तरीक़े पर प्रदर्शनकारी क्यों उठा रहे सवाल - ग्राउंड रिपोर्ट

संविधान में क्या है प्रावधान?

भारत के पूर्व गृह सचिव और मोदी सरकार में मंत्री रहे आरके सिंह ने भी दिल्ली पुलिस के रुख़ को मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया है.

आरके सिंह ने एक्स पर लिखा है, ''भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के प्रदर्शन करना या जुलूस निकालना नागरिकों का मौलिक अधिकार है. पुलिस दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से क्यों रोक रही है? आईएएस और आईपीएस संविधान और क़ानून के अनुसार काम करने की शपथ लेते हैं. दिल्ली पुलिस को इसी हिसाब से काम करना चाहिए न कि किसी नेता के अवैध आदेश के अनुसार.''

पुलिस का विरोध प्रदर्शन की अनुमति से इनकार किसी विशेष गतिविधि पर लगाया गया प्रतिबंध है, न कि अनुच्छेद 19 का निलंबन. इसकी वैधता क़ानून, इनकार के कारणों और इस बात पर निर्भर करेगी कि वह संवैधानिक रूप से उचित प्रतिबंध की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं. पुलिस अनुमति की व्यवस्था को शांतिपूर्ण सभा पर मनमानी रोक लगाने के अधिकार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकती.

आर के सिंह का कोट कार्ड
दिल्ली पुलिस
इमेज कैप्शन, 6 अक्तूबर, 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग के कार्यालय के सामने तैनात पुलिसकर्मी
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सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रहे दुष्यंत दवे कहते हैं कि पुलिस अब संविधान और क़ानून का पालन नहीं करती है बल्कि सत्ताधारी पार्टी के आदेशों का पालन करती है.

दुष्यंत दवे ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''विरोध का अधिकार तो हमारा एक मौलिक अधिकार है. अगर देशवासी ये चाहते हैं कि सरकार के कोई निर्णय या सरकार के कोई भी एक्शन के ख़िलाफ़ उनको विरोध करना है, तो वो अपना विरोध कर सकते हैं. इसे संविधान में एक गारंटी मिली है. लोकतंत्र तो बिना विपक्ष के चलेगा ही नहीं.''

दवे कहते हैं, ''अगर आप बोलते हैं कि हिंदुस्तान एक वाइब्रेंट डेमोक्रेसी है, तो ये प्रोटेस्ट तो ज़रूर होने चाहिए. जब भी बीजेपी कोई रैली चाहती है, तो उनको तुरंत परमिशन दी जाती है. आज ही नरेंद्र मोदी की बड़ी रैली हो रही है. उनको तुरंत परमिशन मिल जाती है. पुलिस सत्ताधारी पार्टी को सब सुविधाएं देती है. जब यही मांग विपक्ष की तरफ़ से होती है तो बिल्कुल अलग व्यवहार होता है.''

दुष्यंत दवे कहते हैं, ''निश्चित तौर पर यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन तो मौलिक अधिकार के तहत गारंटीड है. इस देश का दुर्भाग्य यह है कि हर सरकार पुलिस को पॉलिटिकल एजेंट के रूप में इस्तेमाल करती है. हमारे देश में सरकारी अधिकारी या न्याय प्रणाली कुछ भी अब स्वतंत्र नहीं है.

''मौलिक अधिकार के उल्लंघन की सूरत में आप अदालत जा सकते हैं लेकिन आज हमारी अदालतें भी स्वतंत्र नहीं रहीं. पुलिस आकर बोलेगी कि इस विरोध प्रदर्शन से लॉ एंड ऑर्डर सिचुएशन हो सकती है. पुलिस कुछ भी बहाने दिखा सकती है. ऐसे में विपक्ष बिना पुलिस की परमिशन के विरोध कर रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है.''

दिल्ली पुलिस किस आधार पर अनुमति नहीं दे रही है?

दिल्ली विरोध प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर आइसा और अन्य छात्र संगठनों के सदस्यों की ओर से निकाले गए विरोध मार्च के दौरान हिरासत में ली गईं आइसा नेता नेहा बोरा को ले जा रहे पुलिस वाहन पर कई समर्थक चढ़ गए

ऐसे में सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस किस आधार पर इस मौलिक का इस्तेमाल नहीं करने दे रही है?

दुष्यंत दवे कहते हैं, ''फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन को आप रोक सकते हैं. अगर फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का कोई दुरुपयोग करे और कोई आपत्तिजनक बयान करे जो देश के ख़िलाफ़, सरकार को हटाने की साज़िश करे और साथ-साथ हिंसा करे, लॉ एंड ऑर्डर का भंग करे, तब पुलिस इस अधिकार को सस्पेंड कर सकती है.''

दुष्यंत दवे कहते हैं, ''पर वो तो तब होगा जब आपने परमिशन दी हो और परमिशन का दुरुपयोग हो रहा है. आप पहले परमिशन ही नहीं दे रहे हैं. मैं समझता हूँ कि सरकार को और प्रधानमंत्री मोदी जी को ख़ुद समझना चाहिए कि ये विरोध एक लोकशाही का अहम हिस्सा है, जिसे रोकना नहीं चाहिए.''

पुलिस किस आधार पर इस अधिकार से वंचित करती है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है, जबकि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(3) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है. इसलिए प्रदर्शन के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने का यह अर्थ नहीं है कि हर प्रदर्शन को हर स्थान और हर समय अनुमति देना अनिवार्य है.

अनुच्छेद 19(2) आठ आधारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले क़ानूनों की अनुमति देता है:

1. भारत की संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा

2. स्टेट की सुरक्षा को ख़तरा

3. दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध को ख़तरा

4. लोक व्यवस्था को ख़तरा

5. शिष्टाचार या नैतिकता का उल्लंघन

6. न्यायालय की अवमानना

7. मानहानि

8. किसी अपराध के लिए उकसाना

दुष्यंत दवे का कहना है कि सरकार को जो बात पसंद नहीं है, वैसी बात करने भर से मौलिक अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है. लेकिन इसकी व्याख्या भी एक जटिल प्रक्रिया है.

उनका कहना है कि प्रतिबंध का क़ानूनी आधार होना चाहिए, वह संविधान में दिए गए आधारों के अंतर्गत आना चाहिए और उचित होना चाहिए. राजनीतिक आलोचना अपने आप में इन सूचीबद्ध आधारों में शामिल नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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