मध्य पूर्व में इस्तेमाल हो रहा यह अदृश्य हथियार क्या है, जिससे बढ़ा समुद्र में जहाज़ों के टकराने का ख़तरा

जीपीएस जैमिंग से ऐसा लग रहा है कि ईरान के तट के पास जहाज़ मिट्टी में पहुंच गए हैं
इमेज कैप्शन, जीपीएस जैमिंग से ऐसा लग रहा है कि ईरान के तट के पास जहाज़ ज़मीन पर पहुंच गए हैं
    • Author, क्रिस बारानियुक
    • पदनाम, टेक्नोलॉजी रिपोर्टर
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सैकड़ों की संख्या में जहाज़ लेकिन सब ग़लत जगह पर.

मिशेल वीज़ बॉकमैन विंडवर्ड नाम की एक समुद्री एआई कंपनी की सीनियर मरीन इंटेलिजेंस एनालिस्ट हैं. जब वह ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर के पास के पानी में चल रहे व्यवसायिक जहाज़ों की लाइव लोकेशन चेक कर रही थीं तो उनके मुंह से निकला, "हे भगवान"

होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आस-पास के इलाक़ों का नक्शा देखते हुए वह कहती हैं, "मैं अभी तक… 35 अलग-अलग क्लस्टर गिन चुकी हूं,"

जिन क्लस्टरों की वह बात कर रही हैं, वे नक्शे पर बनी अजीब-सी गोल आकृतियां हैं, और इनमें से हर आइकन एक असली जहाज़ को दर्शा रहा है.

लेकिन जहाज़ कभी भी इतने सटकर, इतनी परफ़ेक्ट गोल आकृतियों में इकट्ठा नहीं होते. और न ही वो ज़मीन के ऊपर तैर सकते हैं, जबकि कुछ क्लस्टर तो वहीं दिख रहे हैं. यानी इनके जीपीएस कॉर्डिनेट्स गड़बड़ा गए हैं, जिससे इनकी असली लोकेशन अस्पष्ट हो गई है.

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जंग सिर्फ़ गोलियों और बमों से नहीं लड़ी जाती. इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स भी युद्ध में काम आती हैं. नंगी आंखों से न दिखने वाला जीपीएस जैमिंग भारी गड़बड़ियां पैदा कर सकता है, कम्युनिकेशन बाधित हो सकते हैं, और जानलेवा हादसे भी हो सकते हैं.

जीपीएस जैमिंग दरअसल जीपीएस सिग्नल में जानबूझकर पैदा किया गया खलल या गड़बड़ी होती है, इसमें तेज़ रेडियो सिग्नल भेजकर असली जीपीएस सिग्नल को दबा दिया जाता है. इससे मोबाइल, जहाज़, ड्रोन या एयरक्राफ़्ट अपनी लोकेशन गलत दिखाने लगते हैं या उनकी लोकेशन मिलती ही नहीं है. युद्ध या सुरक्षा स्थितियों में इसे दुश्मन को भ्रमित करने या क्षेत्र की लोकेशन छुपाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

'अगर पता ही न चले कि आस-पास जहाज़ कहां हैं?'

पिछले कुछ सालों में यूरोप में कई एयरक्राफ्ट जीपीएस जैमिंग का शिकार हुए हैं, जिनमें यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट का विमान भी शामिल है. और यूक्रेन युद्ध में तो यह रोज़ की बात हो चुकी है. अब जब मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ा है, इलेक्ट्रॉनिक वारफ़ेयर और इलाक़ों में फैलता जा रहा है.

होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास जहाज़ों को जो दिक्कतें अभी हो रही हैं, वह पहली बार नहीं हैं. बॉकमैन पहले भी देख चुकी हैं कि जीपीएस जैमिंग से जहाज़ों के ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) पर असर पड़ता है.

गल्फ़ में जैमिंग ने उस सिस्टम में खलल डाल दिया है जिसका इस्तेमाल जहाज़ टकराने से बचने के लिए करते हैं
इमेज कैप्शन, गल्फ़ में जैमिंग ने उस सिस्टम में खलल डाल दिया है जिसका इस्तेमाल जहाज़ टकराने से बचने के लिए करते हैं
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पिछले साल इस इलाके़ में इसराइल और ईरान के बीच 12 दिन की जंग के दौरान भी यही हुआ था. और बाल्टिक सागर में भी इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस (दखल) ने जहाज़ों के नेविगेशन में भी दिक्कतें पैदा की थीं. लेकिन वह कहती हैं, "यह तो उससे भी एक कदम आगे की बात है."

"हम समुद्री नेविगेशन और सुरक्षा के लिए इस ख़तरे को कम करके नहीं आंक सकते."

पाकिस्तान के नेशनल हाइड्रोग्राफ़िक ऑफ़िस ने भी इस क्षेत्र में जहाज़रानी को प्रभावित करने वाले ऐसे इंटरफेरेंस को लेकर चेतावनी जारी की है.

जहाज़ एआईएस का इस्तेमाल आंशिक रूप से एक-दूसरे से बचने के लिए भी करते हैं. सैकड़ों हज़ार टन तेल ले जा रहा 300 मीटर लंबा टैंकर मुड़ने या रुकने में बहुत समय लेता है- और जब तक कोई जहाज़ पूरी तरह रास्ता बदले तब तक वह कई किलोमीटर तक आगे बढ़ सकता है.

अगर आपको यह पता ही न चल पए कि आस-पास जहाज़ कहां हैं, तो टक्कर का ख़तरा बढ़ जाता है, ख़ासकर रात में या कम दृश्यता वाली स्थिति में.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ सरे के ऐलन वुडवर्ड कहते हैं. "यही असली दिक्कत है. मुद्दा यह नहीं कि आपको पता है आप कहां जा रहे हैं- समस्या यह है कि आपको यह नहीं पता बाकी सब कहां जा रहे हैं."

जैमिंग का स्तर और ताक़त हैरान करने वाली

आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि जैमिंग के पीछे कौन है, लेकिन सैन्य विश्लेषकों का गहरा संदेह है कि जहाज़ों में गड़बड़ी ईरान की तरफ़ से की जा रही है. ईरान ने यह भी धमकी दी है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज़ पर हमला किया जाएगा.

रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट नामक थिंक टैंक के एसोसिएट फ़ेलो थॉमस विथिंग्टन कहते हैं कि ईरान द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) या जीपीएस जैमिंग उपकरण संभवतः घरेलू स्तर पर बनाए गए हैं या रूस और चीन से मिले उपकरणों से तैयार किए गए हैं.

वह यह भी संभावना जताते हैं कि इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य बल भी अपने बेस, कर्मचारियों और जहाज़ों को ड्रोन और जीएनएसएस-गाइडेड हथियारों से बचाने के लिए जैमिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हों.

सीन गॉर्मन ने यूक्रेन सहित कई देशों में जीपीएस जैमिंग की स्थिति का विश्लेषण किया है
इमेज कैप्शन, सीन गॉर्मन ने यूक्रेन सहित कई देशों में जीपीएस जैमिंग की स्थिति का विश्लेषण किया है

बीबीसी के संपर्क किए जाने पर, अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर ने कहा, "ऑपरेशंस सिक्योरिटी के कारण हम क्षेत्र में विशिष्ट क्षमताओं की स्थिति पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे."

सीन गॉर्मन जेफ़र.एक्सवाईज़ेड (Zephr.xyz) नाम की एक टेक कंपनी के सह-संस्थापक हैं, जिसने यूक्रेन सहित कई देशों में जीपीएस जैमिंग की स्थिति का विश्लेषण किया है. हवाई जहाज़ से मिलने वाले डेटा से अक्सर पता चल जाता है कि जीपीएस जैमिंग कब हो रही है, लेकिन ईरान का हवाई क्षेत्र अब बंद होने की वजह से गॉर्मन को अन्य स्रोत ढूंढने पड़े हैं.

पिछले कुछ दिनों में उन्होंने ईरान में हो रही जैमिंग को पकड़ने के लिए एक सैटेलाइट से मिले राडार डेटा का इस्तेमाल किया. हालांकि बीबीसी ने इस डेटा की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं की है, लेकिन गॉर्मन का कहना है कि जैमिंग डिवाइस राडार सिग्नलों में एक तरह का निशान छोड़ते हैं, जिससे देश भर में हो रही जीपीएस जैमिंग की घटनाओं का पता लगाया जा सकता है.

2024 में, उन्होंने और उनके सहयोगियों ने यूक्रेन में जीपीएस जैमिंग का अध्ययन करने के लिए ड्रोन पर स्मार्टफ़ोन बांधकर उड़ाए. ड्रोन उड़ते रहे और स्मार्टफ़ोन जीपीएस की जानकारी रिकॉर्ड करते रहे- और जो भी इंटरफेरेंस मिलता, उसे नक्शे पर दिखाया जा सकता था. वह बताते हैं, "हम उन सभी फ़ोनों के [जीएनएसएस] माप देख रहे थे. इससे आप जैमर की सटीक लोकेशन का हिसाब लगाकर उसका पता लगा सकते थे."

गॉर्मन कहते हैं, "मैं तो जैमिंग के स्तर और उसकी ताकत देखकर हैरान रह गया."

जीपीएस जैमिंग से बचाव के लिए कई तकनीकें मौजूद हैं. समस्या को कम करने के लिए एक तरीका है जैमिंग या इंटरफेरेंस को ऑटोमैटिक रूप से पहचानकर दूसरी अप्रभावित फ़्रीक्वेंसी पर शिफ्ट हो जाना.

'हे ईश्वर, हम तो पागल थे'

डिफ़ेंस दिग्गज रेथियॉन लैंडशील्ड नाम का एक डिवाइस बनाती है. कंपनी का कहना है कि यह 'एंटी-जैम एंटीना सिस्टम' कारों से लेकर हवाई जहाज़ तक, अलग-अलग तरह के वाहनों में लगाया जा सकता है और यह जैमिंग से निपटने के लिए कई चैनलों का इस्तेमाल करता है.

रेथियॉन यूके के इंजीनियरिंग डायरेक्टर एलेक्स रोज़-पार्फ़िट कहते हैं, "इस समय हमारे एंटी-जैमिंग उत्पादों की मांग और उत्पादन क्षमता दोनों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो रही है."

दूसरी कंपनियों ने ऐसी नेविगेशन तकनीकें विकसित की हैं जो जीपीएस की कमियों को ध्यान में रखकर काम करती हैं. ऑस्ट्रेलिया स्थित एडवांस्ड नेविगेशन नाम की कंपनी ने एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर की रीडिंग के आधार पर किसी वाहन की लोकेशन तय कर सकता है. ये वही सेंसर हैं जिनसे आपके स्मार्टफ़ोन को यह पता चलता है कि उसे एक ओर घुमाया गया है.

स्मार्ट नेविगेशन जीपीएस की वैकल्पिक तकनीक पर काम कर रही है
इमेज कैप्शन, स्मार्ट नेविगेशन जीपीएस की वैकल्पिक तकनीक पर काम कर रही है

एडवांस्ड नेविगेशन के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी क्रिस शॉ कहते हैं कि जीपीएस उपलब्ध न होने या भरोसेमंद न रहने पर, किसी की भौगोलिक स्थिति पता करने के लिए उनकी कंपनी की तकनीक दूसरे विकल्प इस्तेमाल कर सकती है.

इसमें व्यक्ति की लोकेशन की ऑप्टिकल इमेजरी को सैटेलाइट तस्वीरों से मिलाना शामिल है, या फिर सिर के ऊपर दिखने वाले तारों की पोज़ीशन का कंप्यूटर आधारित विश्लेषण करना भी.

शॉ कहते हैं, "इमेज प्रोसेसिंग काफी एडवांस्ड है. स्टार-मैपिंग जैसा काम करना बहुत कम खर्चीला है."

हालांकि वह जोड़ते हैं, "बस इसकी सटीकता बहुत अच्छी नहीं होती." इसी वजह से कई तरह के लोकेशन और पोज़ीशन एनालिसिस को एक साथ इस्तेमाल करना पड़ सकता है.

अगर बेहतर सुरक्षा न मिले, तो अपने मौजूदा रूप में जीपीएस असुरक्षित ही बना रहेगा. सबसे अहम बात यह है कि जीपीएस आधारित सिस्टम जिन सिग्नलों पर निर्भर करते हैं, वे बहुत कमजोर होते हैं, इसलिए उन्हें जैम करना आसान होता है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सेनाओं के पास 'एम-कोड' (M-Code) जीपीएस होता है- यह तकनीक का एक प्रमाणित और एन्क्रिप्टेड संस्करण है, जैमिंग को लेकर इसकी प्रतिरोधक क्षमता काफ़ी अच्छी होती है.

रॉयल इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेविगेशन के डायरेक्टर रैम्ज़ी फैरागर कहते हैं कि ईरान के तट के पास हो रही जीपीएस जैमिंग समुद्री हादसे का जोखिम बढ़ाती है. उनका अनुमान है कि जैमिंग में लगातार हो रही बढ़ोतरी अंततः ज्यादा सुरक्षित विकल्पों की तरफ़ ले जाएगी. कुछ उसी तरह जैसे कभी खुले और सभी के लिए उपलब्ध वाई-फ़ाई नेटवर्क समय के साथ आज मौजूद पासवर्ड-सुरक्षित नेटवर्क में बदल गए.

वह कहते हैं, "बहुत जल्द हम इस दौर को पीछे मुड़कर देखेंगे, जब हम खुले जीएनएसएस सिग्नलों का इस्तेमाल कर रहे थे, और सोचेंगे- 'हे ईश्वर, हम तो पागल थे, यह सच में समझदारी भरा कदम नहीं था'."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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