सालों से इस यात्रा का था इंतज़ार और नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पहुंचते ही मैसेज आना हो गए बंद

    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, भारत संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

सुदीप्तो भट्टाचार्य को बुधवार की सुबह उनकी पत्नी का आख़िरी मैसेज मिला.

इस मैसेज में उनके पासपोर्ट पर प्रस्थान की मुहर लगी थी.

नेपाल सीमा पर आव्रजन प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी. उनकी पत्नी सुभ्राश्री ने सुबह 7:57 बजे लिखा, "हम चीन में दाख़िल होने का इंतज़ार कर रहे हैं."

लेकिन इसके छह मिनट बाद, स्थानीय समयानुसार 08:03 बजे सुभ्राश्री के मैसेज आने बंद हो गए.

सुभ्राश्री चक्रवर्ती और उनके साथ यात्रा कर रहा समूह कैलाश पर्वत की तीर्थयात्रा के अगले चरण के लिए तिब्बत में दाख़िल होने का इंतज़ार कर रहा था.

माना जाता है कि कैलाश पर्वत हिंदू देवता शिव का पवित्र हिमालयी निवास है. सुभ्राश्री कई सालों से यहां जाने का सपना देख रहीं थीं.

सुभ्राश्री का कोई परिजन नहीं था साथ

43 वर्षीय सुभ्राश्री नेपाल की तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ के बाद लापता हुए कम से कम 290 भारतीयों में शामिल हैं.

लापता लोगों में से कई तीर्थयात्रा पर थे. यह धार्मिक यात्रा महामारी और फिर भारत-चीन के बीच तनाव के कारण बाधित होने के बाद पिछले साल फिर से शुरू हुई थी. कई हज़ार भारतीय पिछले कई सालों से हर साल कैलाश पर्वत की यात्रा करते आ रहे हैं.

सुभ्राश्री 30 लोगों के एक समूह के साथ यात्रा कर रही थीं. इस समूह में उनके परिवार का कोई और सदस्य नहीं था.

सुभ्राश्री को शहर के एक अस्पताल में गहन चिकित्सा इकाई में मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट होने के नाते आपात स्थितियों से निपटने का अनुभव और अभ्यास था.

उन्हें सीपीआर और गहन चिकित्सा प्रक्रियाओं की समझ है. उनके पति बताते हैं कि वो शारीरिक रूप से भी स्वस्थ हैं.

लेकिन इस सबके बावजूद, उनके पति सुदीप्तो भट्टाचार्य को यह नहीं पता चल सका कि आख़िरी संदेश के बाद क्या हुआ था.

वो कहते हैं, "सुबह 8:03 बजे के बाद क्या हुआ? हमें कुछ नहीं पता."

कई सालों से था इसका इंतज़ार

सुभ्राश्री कई सालों से इस यात्रा का इंतज़ार कर रही थीं.

काठमांडू से उन्होंने जो तस्वीरें घर भेजी थीं, वो उनके लापता होने से कुछ ही दिन पहले ली गई थीं. यात्रा को लेकर उत्साह की झलक इन तस्वीरों में दिखाई देती है.

एक तस्वीर में, वह एक मंदिर के सजे हुए अहाते में नीले रंग की कुर्ती पहने खड़ी हैं और कैमरे की ओर धीरे से मुस्कुरा रही हैं.

एक अन्य तस्वीर में, वो लाल रंग के कपड़े पहने हुए, काठमांडू घाटी के ऐतिहासिक दरबार स्क्वायर की प्राचीन ईंट और नक्काशीदार लकड़ी की वास्तुकला की इमारतों के बीच पोज़ दे रही हैं.

सुभ्राश्री ने अने पति को बताया था कि नेपाल का ग्रामीण इलाक़ा बेहद ख़ूबसूरत है.

सरकारी अधिकारी भट्टाचार्य कहते हैं, "वो बहुत उत्साहित थीं. यह उसकी सपनों की यात्रा थी."

यह यात्रा शुक्रवार, 21 अगस्त को शुरू हुई थी.

उन्होंने कोलकाता से मिथिला एक्सप्रेस ली और 22 अगस्त को बिहार के रक्सौल पहुंचीं. वहां से उन्होंने नेपाल के बीरगंज में प्रवेश किया और बस से काठमांडू के लिए रवाना हुईं, और उसी रात वहां पहुंच गईं.

वह तीन रातें काठमांडू में रुकी और वहां पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया.

फिर, 25 अगस्त की सुबह, उनका ग्रुप काठमांडू से बस से यात्रा करते हुए स्याफ्रुबेसी के लिए रवाना हुआ. यह काठमांडू से लगभग 122 किलोमीटर उत्तर में स्थित एक छोटी पहाड़ी बस्ती है और लांगटांग क्षेत्र के प्रमुख ट्रेकिंग इलाक़े का प्रवेश द्वार भी है. इस यात्रा में उन्हें 12 घंटे लगे और यह पूरी तरह से सुगम भी नहीं थी.

भूस्खलन के कारण लगभग चार घंटे तक उनका रास्ता रुका रहा. बाद में सेना ने सड़क को साफ किया.

लेकिन जब सुभ्राश्री ने अपने पति सुदीप्तो से बात की तो बताया कि आसमान बिलकुल साफ़ है.

ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे आने वाले घटनाक्रम का अंदेशा हो सके.

फिर कनेक्शन टूट गया

सुदीप्तो बताते हैं, "वह बार-बार कह रही थी कि मौसम अच्छा है, उन्होंने बताया कि मौसम काफी गर्म था, बीच-बीच में बारिश भी हो रही थी."

अगली सुबह, 26 अगस्त को, सुभ्राश्री सुबह 7 बजे के कुछ ही समय बाद अपने होटल से निकल गई थीं.

भट्टाचार्य ने उनसे फ़ोन पर बात की और उसके बाद दोनों के बीच मैसेज का सिलसिला जारी रहा.

इसके क़रीब एक घंटे बाद सुभ्राश्री ने अपने पति को बताया कि नेपाल आव्रजन की औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं और उनका ग्रुप तिब्बत में दाख़िल होने के लिए इंतज़ार कर रहा है.

नेपाल आव्रजन प्रक्रिया पूरी करने के बाद तीर्थयात्री पैदल चलकर सीमा पार करते हुए ग्यिरोंग में स्थित चीनी आव्रजन केंद्र पर पहुंचते हैं.

भट्टाचार्य का मानना है कि जब यह हादसा हुआ तब उनकी पत्नी चीनी आव्रजन भवन के अंदर या उसके आसपास मौजूद रही होंगी, फिर कनेक्शन टूट गया.

उन्होंने कहा, "मुझे पता था कि तिब्बत की तरफ कनेक्टिविटी की समस्या होगी. इसलिए मैंने अगले संदेश का इंतज़ार किया."

दोपहर करीब 3 बजे उन्होंने मीडिया में बाढ़ की ख़बरें देखीं. इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ ग्रुप में गए बाक़ी लोगों को कॉल करना शुरू किया. किसी ने जवाब नहीं दिया.

उन्होंने टूर ऑपरेटर से संपर्क करने की कोशिश की और फिर समूह के साथ आए दो प्रबंधकों से भी. लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला.

तब से परिवार को सुभ्राश्री से कोई ख़बर नहीं मिली है.

भट्टाचार्य सवाल करते हैं, "क्या उन्हें बचा लिया गया है? क्या यह समूह चीन में बचाए गए लोगों में शामिल था? हम और अधिक जानना चाहते हैं."

उनका मानना है कि उनकी पत्नी और अन्य लोग बाढ़ आने से पहले ही चीनी क्षेत्र में प्रवेश कर चुके होंगे. लेकिन उन्हें इस बात की कोई पुख़्ता जानकारी नहीं मिली है कि कौन-कौन सीमा पार कर पाया या उसके बाद उनका क्या हुआ.

वो कहते हैं, "कृपया मुझे चीनी सरकार से एक सूची दिलवाइए, लापता, मृत और बचाए गए लोगों की सूची. हमें ताज़ा जानकारी चाहिए."

और इसके बाद उनकी पीड़ा झलकती है. वो कहते हैं, "मैं आपको क्या बताऊं? रातों की नींद हराम है, लगातार फ़ोन से चिपका हूं."

54 वर्षीय रीना बनर्जी के परिवार के लिए अनिश्चितता और भी बढ़ गई है.

उन्हें यह भी नहीं पता कि जब उनसे संपर्क टूटा तो वह सीमा के किस तरफ़ थीं.

कोलकाता की निजी शिक्षिका रीना उसी तीर्थयात्रा ग्रुप के हिस्से के रूप में एक टूर ऑपरेटर के साथ अकेले यात्रा कर रही थीं.

उनके भतीजे द्वैपायन मुखर्जी का कहना है कि काठमांडू में रहने के दौरान परिवार ने उनसे वीडियो कॉल के ज़रिए बात की थी. तब तक उनकी यात्रा बिलकुल ठीक चल रही थी.

वो कहते हैं, "वो बहुत ख़ुश थीं, वो बहुत लंबे समय बाद यात्रा पर जा रही थीं."

रीना पहाड़ों से अनजान नहीं थीं. वह पहले भी पहाड़ियों में यात्रा कर चुकी थीं और अपने परिवार के साथ हाइकिंग पर जा चुकी थीं.

मुखर्जी कहते हैं, "वह काफी फिट थीं. हम हाइकिंग पर गए थे. हमें पहाड़ों पर जाने की आदत है."

रीना ने अपने भतीजे को पिछले दिन रास्ते में हुए भूस्खलन के बारे में बताया था. रीना ने बताया था कि उनका समूह लगभग चार घंटे तक फंसा रहा था.

अगली सुबह टूर ऑपरेटर ने एक ग्रुप फोटो भेजी जिसमें रीना नेपाल आव्रजन केंद्र के बाहर खड़ी दिखाई दे रही थीं.

मुखर्जी का कहना है कि सुभ्राश्री की तरह उन्हें भी दाख़िल होने की मुहर मिल चुकी थी.

ये कहकर वो बिलकुल ख़ामोश हो गए.

मुखर्जी कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि उन्होंने सीमा पार की या नहीं. वे चीन की तरफ़ थीं या नेपाल की तरफ़, इस बारे में हम अभी भी सोच रहे हैं."

दो सप्ताह की यह यात्रा सुभ्राश्री की पहली तीर्थयात्रा थी और यह एक ऐसा सपना थी जिसे वो कई सालों से संजोए हुई थीं. रीना भी लंबे समय से यह तीर्थयात्रा करना चाहती थीं और पहाड़ों में यात्रा का उन्हें अच्छा अनुभव था.

इन दोनों ही महिलाओं में एक बात समान थी. दोनों को ही घुमक्कड़ी का शौक था.

भट्टाचार्य कहते हैं, "उन्हें यात्रा करने, नए स्थानों की खोज करने और पहाड़ों की ओर जाने का शौक. "

दोनों जीवन भर की तीर्थयात्रा के लिए एक ग्रुप में शामिल हुई थीं. ऐसा लगता है कि दोनों ने नेपाल आव्रजन प्रक्रिया पूरी कर ली थी और माना जा रहा है कि दोनों ने सीमा पार कर ली थी.

इन दोनों के नाम अब नेपाल सरकार की 500 से अधिक लापता लोगों की आधिकारिक सूची में शामिल हैं.

लेकिन सिर्फ़ इस सूची से परिवार के लिए सबकुछ साफ़ नहीं होता.

उनके परिवारों को अभी भी पता नहीं है कि वे कहां हैं या सुरक्षित हैं या नहीं. कोलकाता स्थित टूर ऑपरेटर का कहना है कि उन्हें अभी तक ग्रुप के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

दोनों परिवारों के लिए, यह यात्रा एक ही अनुत्तरित सवाल के साथ समाप्त हुई- क्या वे सीमा पार करने में सफल रहीं?

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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