क्या इन पांच वजहों से धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से देना पड़ा इस्तीफ़ा

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर देश के कई इलाक़ों में प्रदर्शन हुए, यह तस्वीर 24 जुलाई की कोलकाता की है
इमेज कैप्शन, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर देश के कई इलाक़ों में प्रदर्शन हुए, यह तस्वीर 24 जुलाई की कोलकाता की है
    • Author, इशाद्रिता लाहिड़ी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

नीट पेपर लीक के बाद कई हफ़्तों तक चले आंदोलन और देशभर में युवाओं के तेज़ होते विरोध प्रदर्शन के बीच शनिवार दोपहर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया.

इसे नरेंद्र मोदी सरकार के बड़े यू-टर्न के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि शुरुआत में सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने से इनकार किया था और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग के पक्ष में भी नहीं थी.

इस घटनाक्रम को बेहद असाधारण माना जा रहा है. मोदी सरकार के पिछले 12 सालों के कार्यकाल में पहली बार किसी मंत्री ने जनता के दबाव में आकर इस्तीफ़ा दिया है.

इससे पहले साल 2018 में ही ऐसा देखने को मिला था, जब #MeToo के आरोपों के बाद विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने इस्तीफ़ा दिया था.

इससे पहले विरोध प्रदर्शन के दबाव में सरकार ने साल 2021 में तीन कृषि क़ानूनों को वापस लिया था, जो सबसे बड़ा नीतिगत फ़ैसला था.

वहीं, साल 2020 मे नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ भी देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे, लेकिन सरकार ने तब ऐसा कोई क़दम नहीं उठाया था.

तो इस बार ऐसा क्या हुआ कि सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांग माननी पड़ी? बीबीसी ने राजनीतिक विश्लेषकों से ये समझा कि आख़िर धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा?

1. प्रदर्शन का पैमाना

जंतर-मंतर पर पेड़ पर चढ़े कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक
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बीबीसी ने जिन राजनीतिक विश्लेषकों से बात की, उनमें से ज़्यादातर का ये मानना है कि इस आंदोलन का अभूतपूर्व पैमाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता बना.

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सोशल मीडिया से शुरू हुआ ये आंदोलन कुछ हफ़्तों में देशभर में फैल गया और पिछले कुछ दिनों में कई शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन देखने को मिले.

राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडणीस का कहना है कि मोदी सरकार को लगा कि उनकी राजनीतिक साख़ धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही है.

उन्होंने कहा, "देशभर में जिस तरह ग़ुस्सा दिखा, वह सरकार के लिए चिंता की बात थी. दूसरी ओर साल 2024 में बिना पूर्ण बहुमत के मोदी सरकार सत्ता में वापस लौटी थी. सरकार के पास इससे निपटने की कोई ठोस रणनीति नहीं थी. सोशल मीडिया, जो कि इस आंदोलन का सबसे बड़ा माध्यम था, उस पर अलग-अलग टिप्पणियां और नैरेटिव तेज़ी से फैल रहे थे. कई मायनों में देखें तो सरकार इस स्थिति के लिए तैयार ही नहीं थी."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हरीश वानखेड़े भी मानते हैं कि आंदोलन के इतने व्यापक स्वरूप ने सरकार को अपना रुख़ नरम करने और धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा लेने पर मजबूर किया.

उन्होंने कहा, "इस आंदोलन का राष्ट्रीय स्वरूप सरकार के लिए चिंता का मुद्दा रहा होगा. यह अब सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित नहीं है. सरकार हमेशा युवाओं को अपना अहम वोट बैंक मानती रही है और उसे उम्मीद नहीं थी कि युवा इस तरह प्रतिक्रिया देंगे. प्रधानमंत्री की इंस्टाग्राम पोस्ट के बाद भी लोगों का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ."

2. संसद का मौजूदा सत्र

संसद के मौजूदा सत्र में सरकार के सामने विपक्ष लगातार सवाल खड़े कर रहा था
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वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी का कहना है कि संसद का मौजूदा सत्र भी एक वजह है कि सरकार गतिरोध को जल्द ख़त्म करना चाहती थी.

उन्होंने कहा, "सरकार इस सत्र में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन ये योजना धरी रह गई. परिसीमन बिल एक ऐसा कदम है जिस पर सरकार लंबे समय से विचार कर रही थी और वो इसे इसी सत्र में पास करवाना चाहती थी."

प्रोफ़ेसर वानखेड़े का कहना है कि इस सत्र में माहौल विपक्ष के पक्ष में बनता दिख रहा था, ख़ासकर इसलिए क्योंकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सड़कों पर उतरकर मोर्चा संभाला.

वानखेड़े ने कहा, "कई मायनों में इसने विपक्ष में नई जान फूंक दी. इस बार संसद के न चल पाने की ज़िम्मेदारी विपक्ष पर नहीं, बल्कि सरकार पर मानी जा रही थी."

3. आगामी चुनाव

पहली बार बाहरी दबाव में मोदी सरकार के किसी मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा है (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, पहली बार बाहरी दबाव में मोदी सरकार के किसी मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा है (फ़ाइल फ़ोटो)

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर चंद्रचूड़ सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री और बीजेपी के मन में कई राज्यों में आने वाले चुनावों का भी ख्याल रहा होगा. अगला बड़ा विधानसभा चुनाव 2027 में उत्तर प्रदेश में होना है और सरकार उस स्थिति से उबरने के लिए कुछ समय चाहेगी, जिसे विपक्ष अपनी जीत बता रहा है.

चंद्रचूड़ सिंह ने कहा, "वे इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि विपक्ष, जो अभी इस कथित जीत के जोश में है, उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले अपनी कुछ रफ़्तार खो देगा."

उन्होंने कहा, "साल 2029 के आम चुनाव में अभी कुछ समय है और भले ही उनकी छवि को कुछ नुक़सान पहुंचा हो लेकिन प्रधानमंत्री के पास स्थिति को संभालने का समय होगा."

नीरजा चौधरी का कहना है कि तमिलनाडु में विजय जैसी जेन-ज़ी से प्रेरित राजनीतिक जीत की मिसाल बीजेपी के दिमाग़ में रही होगी. पहली बार और दूसरी बार वोट देने वाले देश के मतदाता, संख्या के हिसाब से बहुत बड़ा हिस्सा हैं.

उन्होंने कहा, "सरकार उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के चुनाव से पहले उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहेगी."

ध्यान देने वाली बात ये है कि सत्ता में आने के बाद से ही बीजेपी 18 से 25 साल की उम्र के वोटरों के बीच अच्छी-खासी लोकप्रिय रही है.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के विश्लेषण में पाया गया है कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इस एज ग्रुप के 37 फ़ीसदी मतदाताओं ने बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था. साल 2019 में ये हिस्सेदारी बढ़कर 40 फ़ीसदी हुई और 2024 में ये 39 फ़ीसदी थी.

4. आरएसएस की भूमिका

शनिवार को दिल्ली में केंद्र सरकार और सीजेपी के प्रतिनिधियों के बीच तीसरे दौर की बातचीत हुई
इमेज कैप्शन, शनिवार को दिल्ली में केंद्र सरकार और सीजेपी के प्रतिनिधियों के बीच तीसरे दौर की बातचीत हुई

प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह कहते हैं कि आरएसएस का ध्यान चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने की अपनी कोशिशों में युवाओं पर हमेशा से रहा है. क्योंकि बीजेपी के साथ आरएसएस गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए वह यह नहीं चाहेगा कि युवा अपना गुस्सा पार्टी पर ज़ाहिर करें.

उन्होंने कहा, "आरएसएस चाहेगा कि जेन ज़ी उसके साथ रहे. भारत युवाओं का देश है. आरएसएस लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहा है और वह भारत के शैक्षणिक संस्थानों पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहेगा."

अदिति फडणीस कहती हैं कि स्टूडेंट्स, आरएसएस के इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा हैं और इस स्तर पर छात्रों का गुस्सा उन्हें नुकसान पहुंचाएगा.

वह कहती हैं, "आरएसएस और उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को पूरे भारत में इस तरह के युवाओं के प्रदर्शनों के फैलने से बहुत नुक़सान हो सकता है. उनकी बुनियाद भी छात्र समुदाय ही है. अब हमें पूरे देश में होने वाले छात्र संघ चुनावों और उन चुनावों में एबीवीपी के प्रदर्शन पर नज़र रखनी होगी."

5. भारतीय उपमहाद्वीप में छात्र प्रदर्शन

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग में पटना में हुए प्रदर्शन के सोशल मीडिया पर काफ़ी सुर्खियां बटोरीं, 22 जुलाई को पटना में हुए प्रदर्शन की तस्वीर
इमेज कैप्शन, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के लिए पटना में हुए प्रदर्शन ने सोशल मीडिया पर काफ़ी सुर्खियां बटोरीं, यह 22 जुलाई की पटना की तस्वीर है

नीरजा चौधरी ने बताया कि अपने इस्तीफे वाले पत्र में प्रधान ने "विघटनकारी ताक़तों" का ज़िक्र किया, जो इन प्रदर्शनों का इस्तेमाल ''अपने मक़सद के लिए कर रही हैं."

उनका कहना है कि इससे पता चलता है कि सरकार ने भारतीय उपमहाद्वीप और व्यापक दक्षिण एशिया के राजनीतिक माहौल पर भी विचार किया होगा.

वह कहती हैं, "बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में छात्र असंतोष की वजह से सरकारों को सत्ता छोड़नी पड़ी है. भारत इतना बड़ा देश और स्थिर लोकतंत्र है कि यहां ऐसा होना मुश्किल है. लेकिन कोई भी जोखिम क्यों लिया जाए?"

प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह भी इस बात से सहमत हैं.

उनका कहना है कि भारत के बांग्लादेश या नेपाल जैसी स्थिति का सामना करने की संभावना कम है, लेकिन यह बात सरकार के मन में ज़रूर रही होगी. सिंह ने कहा कि ऐसी स्थिति से प्रधानमंत्री और सरकार की वैश्विक प्रतिष्ठा कम हो जाती.

उन्होंने कहा, "इसका असर निवेश पर पड़ता और अर्थव्यवस्था मुश्किल स्थिति में पहुंच जाती."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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