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'पितृसत्ता ध्वस्त करो': क्या राहुल गांधी कांग्रेस से करेंगे इसकी शुरुआत?
- Author, विनायक होगाडे
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का पुणे में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम ख़ास और अलग था, क्योंकि इसमें उन्होंने 'पितृसत्तात्मक व्यवस्था' पर बात की.
कार्यक्रम की शुरुआत 'मनुस्मृति' के एक उद्धरण से हुई और अंत 'डिस्ट्रॉय पैट्रियार्की' (पितृसत्ता को ख़त्म करो) के संदेश के साथ हुआ.
दरअसल, पुणे में आयोजित यह ख़ास कार्यक्रम सिर्फ़ लड़कियों के लिए रखा गया था.
शहरी और ग्रामीण पृष्ठभूमि, आदिवासी, मुस्लिम और दलित समुदायों समेत अलग-अलग पृष्ठभूमि की लड़कियों ने राहुल गांधी के साथ उन अलग-अलग चुनौतियों पर खुलकर बातचीत की, जिनका वे आये दिन सामना करती हैं.
इस कार्यक्रम का कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा?
राजनीतिक मंच से पितृसत्ता पर बात करना कितना अहम है?
मनुस्मृति और बीजेपी
राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम में मुख्य बातें कही गईं वो थीं- 'भारत की 70 करोड़ महिलाएं भारत की सबसे बड़ी ताक़त हैं', 'मनुस्मृति में लिखी बातें शर्मनाक हैं', 'लड़कियों, अपने आसपास पुरुष सत्ता के बनाए पिंजरे को तोड़ो.'
हालांकि राहुल गांधी का ये कार्यक्रम 'गैर-राजनीतिक' था, लेकिन इसका अंत राजनीतिक संदेशों के साथ हुआ.
उन्होंने कहा कि मनुस्मृति लौट आई है और इसके तर्क में उन्होंने योगी आदित्यनाथ, मोहन भागवत, मनोहर लाल खट्टर और नरेंद्र मोदी के कुछ बयानों का ज़िक्र किया.
वरिष्ठ पत्रकार जयदेव डोले ने मौजूदा राजनीतिक माहौल में इस बयान के असर के बारे में बात की.
उन्होंने कहा, "राम मनोहर लोहिया के 70 साल बाद किसी राजनेता ने इस तरह का रुख़ अपनाया है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. 70 साल पहले राम मनोहर लोहिया जैसे नेता ने इस तरह का स्पष्ट, दृढ़ और समानता पर आधारित रुख़ अपनाया था."
उन्होंने कहा, "अब तक महिलाओं की आज़ादी और पितृसत्ता पर टिप्पणी केवल प्रोफ़ेसरों, बुद्धिजीवियों, समाजशास्त्रियों और गैर-संसदीय राजनीति से जुड़े कार्यकर्ताओं ने ही की है. लेकिन ऐसी राजनीति के बावजूद इस मुद्दे पर बात करना बहुत सराहनीय की बात है."
लेकिन 'प्रगतिशील राजनीति' के नाम पर इससे बड़ा विरोधाभास और क्या होगा कि दशकों तक बाबासाहेब और आंबेडकरवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और आंबेडकरवादी नारीवादियों को नज़रअंदाज किया जाए और फिर जब कोई ऊंची जाति का नेता वही बातें दोहराए तो उसकी तारीफ़ की जाए?
वंचित बहुजन आघाड़ी की नेता अंजलि मायदेव ने यही सवाल उठाया है.
जयदेव डोले ने कहा, "समाजशास्त्रीय नज़रिए से देखें तो किसी ऊंची जाति के नेता का इस बारे में बोलना ज़्यादा प्रभावी और असरदार होगा. बदलाव की राजनीति में आपकी जाति, लिंग और जन्म जैसी चीजें मायने नहीं रखतीं. इसके अलावा, राहुल गांधी के बयान से कांग्रेस के भीतर भी हलचल जरूर हुई होगी."
पत्रकार अलका धुपकर ने बीबीसी मराठी से कहा, "यह मुद्दा इतना गंभीर है कि कोई एक व्यक्ति कभी इसका समाधान नहीं दे सकता. मेरा मतलब है कि फुले-शाहू-आंबेडकरी आंदोलन इस मुद्दे पर बात करता रहा है और फिर भी यह मुद्दा आज भी बना हुआ है और आगे भी रहेगा."
"इसे ख़त्म करने के लिए जो भी प्रयास किए जा रहे हैं, उनका स्वागत है और यह एक महत्वपूर्ण 'राजनीतिक' प्रयास है, इसलिए हमें इसे इसी नज़रिए से देखना चाहिए."
हिंदू कोड बिल और नेहरू
लेखिका और प्रोफ़ेसर प्रज्ञा दया पवार इस घटना को हिंदू कोड बिल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखती हैं.
वह कहती हैं, "पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' को केवल राहुल गांधी की राजनीतिक रैली के सीमित अर्थ में नहीं समझा जा सकता. यह बहुत अच्छी बात है कि राहुल गांधी महिलाओं को मां, बहन और पत्नी की भूमिका के दायरे से बाहर निकालकर उन्हें स्वतंत्र व्यक्ति और सोचने-समझने वाले इंसान के रूप में देखते हैं और ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी पितृसत्तात्मक सोच वाले लोगों के ज़हन में महिलाओं के स्वतंत्र वजूद का ख़्याल डालना ज़रूरी समझते हैं."
दया पवार कहती हैं, "बाबासाहेब ने न सिर्फ 'ज्योतिबा फुले-सावित्रीबाई फुले' की विचारधारा का दायरा बढ़ाया और मनुस्मृति जलाई, बल्कि हिंदू कोड बिल तैयार करके भारत की सभी महिलाओं की आज़ादी का एक घोषणापत्र भी लिखा. उस समय कांग्रेस के कई बड़े नेता उनका कड़ा विरोध करने वालों में शामिल थे."
"नेहरू को यह विरोध स्वीकार नहीं था, लेकिन समझौते के तौर पर उन्हें कुछ हिस्से हटाने पड़े. बाबासाहेब ने क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया, क्योंकि 'हिंदू कोड बिल' को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया था. अब अगर उसी नेहरू के पड़पोते राहुल गांधी इस ऐतिहासिक ग़लती को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए."
अलका धुपकर कहती हैं कि देश के विपक्ष के नेता इन मुद्दों पर खुलकर बोल रहे हैं, यह अपने आप में ख़ास बात है.
वह कहती हैं, "भारतीय राजनीति में बड़े मुद्दे हैं, लेकिन उन्होंने किसी तरह इसकी जड़ पर ही चोट की है और जो संदेश दिया है, वह यह है कि आपके पास अधिकार है और आप किसी पर निर्भर नहीं हैं. यह महत्वपूर्ण है."
बदलती राजनीति के संकेत
अंजलि मायदेव ने फ़ेसबुक पर एक लंबी पोस्ट में लिखा है, "अब राहुल गांधी ने आंबेडकरवादी आंदोलन की ओर से दशकों से इस्तेमाल की जा रही अवधारणाओं और शब्दावली का श्रेय सिर्फ चुनावी फ़ायदे के लिए ले लिया है."
"मैंने 2024 से पहले उन्हें मनुस्मृति की कड़ी आलोचना करते हुए नहीं पढ़ा है. अब अगर यह रुख़ और सोच में आया बदलाव ईमानदार है, तो यह उम्मीद करने में कोई नुकसान नहीं है कि उनकी पार्टी इस रुख़ को गांव और बस्तियों के स्तर तक ले जाएगी."
दूसरी ओर, प्रज्ञा पवार कहती हैं कि भारत में कोई भी पार्टी पितृसत्तात्मक व्यवस्था से पूरी तरह मुक्त नहीं है, "राहुल गांधी को यह पूरी प्रक्रिया और सुधार अपनी पार्टी से भी शुरू करना चाहिए, क्योंकि वह पार्टी भी काफ़ी सामंती और पितृसत्तात्मक है."
जयदेव डोले कहते हैं, "राहुल गांधी की लगभग पूरी कांग्रेस पार्टी आज भी आरएसएस की आलोचना करने से डरती है. छोटे-बड़े कार्यकर्ता, विधायक और सांसद अब भी सीधे बोलने से बचते हैं. वे बीजेपी की बात करते हैं, लेकिन आरएसएस की बात करने से बचते हैं."
"वे धर्म की बात करते हैं, लेकिन हिंदुत्व और सनातनवाद पर सीधे बात करने से बचते हैं. ऐसे में एक राहुल गाँदी अगर इतनी हिम्मत दिखाकर लड़कियों से सीधे यह बात कहता है, तो ये बदलती राजनीति के संकेत हैं."
अलका धुपकर कहती हैं, "कांग्रेस पार्टी में पितृसत्ता और परिवारवाद की आलोचना होनी चाहिए. इस पर आपत्ति होनी चाहिए. इन सबके बावजूद अगर राहुल गांधी इस मंच से बात कर रहे हैं, तो मैं इसका स्वागत करती हूं. क्योंकि हम किसी व्यक्ति ने पहले क्या किया, इसकी फेहरिस्त बना सकते हैं, लेकिन हमें मौजूदा राजनीति को देखते हुए इसका विश्लेषण करना चाहिए."
"मौजूदा स्थिति में इन मुद्दों को उठाना, छात्रों और विशेष रूप से लड़कियों के सामने इन्हें उठाना और ऐसे कार्यक्रमों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाना एक महत्वपूर्ण बात है."
हालांकि वह महिलाओं को 'राजनीति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले साधन' के रूप में देखने का भी विरोध करती हैं.
वह कहती हैं, "चाहे कांग्रेस सरकार के दौरान चलाई गई कई योजनाएं हों या मौजूदा लाडकी बहिन योजना (महाराष्ट्र में) हो, महिलाओं का इस्तेमाल सिर्फ मतदाताओं के रूप में किया गया है और उन्हें इसी नज़रिए से देखा गया है."
वह कहती हैं कि राजनीति, महिलाओं के अधिकारों पर आधारित होनी चाहिए, न कि उपयोगिता पर.
भारतीय राजनीति में महिलाओं की जगह
सामाजिक कार्यकर्ता और वकील परिक्रमा खोत पूछती हैं कि राहुल गांधी जिस 'जेंडर विमर्श' को मुख्यधारा में ला रहे हैं, उसका अगला क़दम क्या होगा?
वह कहती हैं, "सिर्फ राहुल गांधी के 'पितृसत्ता को ख़त्म करो' कह देने से यह जंज़ीर, हथौड़े की एक चोट से दो टुकड़ों में नहीं टूट जाएगी. इसे तोड़ने के लिए एक चोट काफ़ी नहीं है. यह चोट महत्वपूर्ण है."
"भाषा बदल रही है, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन हमें यह मानने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए कि भाषा बदलने का मतलब राजनीति बदलना भी है."
"अब जब यह जेंडर विमर्श मुख्यधारा में आ गया है, तो क्या हमें यहीं रुक जाना चाहिए? अगला सवाल यह है कि इसे ख़त्म करने के लिए ठोस कदम कैसे उठाए जाएं. इसे केजी से पीजी तक की शिक्षा और पाठ्यक्रम में, प्रतिनिधित्व से नेतृत्व तक और क़ानून से नीतियों तक सभी स्तरों पर कैसे लाया जाए."
अलका धुपकर कहती हैं, "अलग-अलग पार्टियों में दिखावे के लिए महिला मोर्चे हैं. लेकिन अब मुद्दा सिर्फ जेंडर प्रतिनिधित्व का नहीं है, बल्कि पितृसत्ता का विरोध करने का है. दोनों अलग मुद्दे हैं."
"जेंडर प्रतिनिधित्व पितृसत्ता को ख़त्म करने का एक छोटा सा समाधान है. इसके आगे बहुत कुछ है. उस दिशा में क़दम उठाए जाने चाहिए. इसकी शुरुआत कांग्रेस से ही होनी चाहिए."
महिलाओं का प्रतिनिधित्व
जेंडर प्रतिनिधित्व की बात करें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 8,360 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था, जिनमें सिर्फ़ 800 यानी 9.6 प्रतिशत महिलाएं थीं, जबकि सिर्फ 6 ट्रांसजेंडर उम्मीदवार थे. यह जानकारी एडीआर इंडिया की एक रिपोर्ट में दी गई है.
543 लोकसभा सीटों में से 152 यानी 28 प्रतिशत सीटों पर एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी.
मौजूदा राजनीति में अगर पार्टी के हिसाब से पुरुष और महिला विधायकों और सांसदों की कुल संख्या की तुलना करें तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों में यह अनुपात लगभग समान, सिर्फ 10 प्रतिशत है.
फ़िलहाल लोकसभा में कुल 74 महिला सांसद हैं.
इनमें कांग्रेस पार्टी की कुल 13 महिला सांसद हैं, जो कांग्रेस के कुल सांसदों का 13.13 प्रतिशत हैं. वहीं कांग्रेस के 86 पुरुष सांसद हैं.
बीजेपी के 209 पुरुष सांसद और 31 महिला सांसद हैं. यह बीजेपी के कुल सांसदों की संख्या का 12.9 प्रतिशत है.
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