सऊदी अरब और यूएई में तनाव से क्या पाकिस्तान की बढ़ेंगी मुश्किलें?

सऊदी अरब और यूएई के क्राउन प्रिंस  की तस्वीरें
    • Author, सारा हसन
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच यमन में अलगाववादी समूहों को समर्थन देने के मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद फ़िलहाल थमता दिख रहा है.

हालाँकि, विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देशों के बीच तनाव में यह कमी अस्थायी हो सकती है और भविष्य में किसी अन्य मुद्दे पर यह फिर से उभर सकता है.

हाल ही में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में एक हवाई हमला किया, जिसमें यूएई से आए कथित हथियारों और सैन्य वाहनों को निशाना बनाया गया.

इसके बाद सऊदी अरब ने मांग की थी कि यूएई यमन सरकार के अनुरोध पर अमल करते हुए 24 घंटे के भीतर अपनी सेना वापस बुलाए.

इस मांग की प्रतिक्रिया में यूएई ने सभी आरोपों का खंडन तो किया, लेकिन अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा भी की.

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विश्लेषकों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सऊदी अरब और यूएई के रणनीतिक और आर्थिक हित एक-दूसरे से किसी हद तक अलग हो गए हैं.

यही वजह है कि मध्य-पूर्व के इन दो महत्वपूर्ण देशों के बीच की 'अघोषित प्रतिस्पर्धा' अब खुलकर सामने आ रही है.

यमन का गृह युद्ध हो या अफ़्रीकी देशों में बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों की स्थापना, यूएई अपने आर्थिक हित साधने के लिए कोशिश करता नज़र आता है.

सऊदी लेफ़्टिनेंट जनरल अब्दुल्लाह अल सालेह (रिटायर्ड) और पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ 2017 में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए
इमेज कैप्शन, यमन में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) राहील शरीफ़ ऊँचे ओहदे पर हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

पाकिस्तान के लिए दुविधा

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बीबीसी मॉनिटरिंग के अनुसार, एक ऐसे वक़्त में जब सऊदी अरब क्षेत्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाते हुए निवेश का केंद्र बनने पर ज़ोर दे रहा है, तो यूएई अफ़्रीका और लाल सागर में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अपनी शक्ति और संसाधनों का इस्तेमाल कर रहा है.

इसकी एक मिसाल यूएई का 'अब्राहम एकॉर्ड' में शामिल होना था. एक ऐसे समय में जब मुस्लिम देश इसराइल को मान्यता देने के लिए सऊदी अरब की ओर देख रहे थे, यूएई ने आगे बढ़कर इसराइल को मान्यता दे दी.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों के दौरान यूएई कई मौक़ों पर खाड़ी के देशों और मुस्लिम जगत में सऊदी अरब की केंद्रीय भूमिका को चुनौती देता नज़र आया है.

मुस्लिम दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति पाकिस्तान के संबंध पारंपरिक रूप से सऊदी अरब और यूएई, दोनों के साथ बहुत पुराने और दोस्ताना रहे हैं.

लाखों पाकिस्तानी इन दोनों देशों में नौकरी करते हैं और हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक रणनीतिक रक्षा समझौता भी किया है.

ऐसे में मध्य-पूर्व के इन दो देशों के बीच बढ़ता तनाव और मतभेद पाकिस्तान सहित पूरी मुस्लिम दुनिया को प्रभावित करेगा.

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मतभेद को कम करने में अपनी भूमिका अदा करने की कोशिश तो करेगा, लेकिन विवाद बढ़ने की स्थिति में पाकिस्तान तटस्थ नहीं रह सकेगा.

बीबीसी उर्दू ने विश्लेषकों से बात करके यह जानने की कोशिश की है कि भविष्य में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव बढ़ने की आशंका क्यों है और यह पाकिस्तान पर कैसे असर डाल सकता है?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान ने इस साल सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं

पाकिस्तान तटस्थ रह पाएगा?

सऊदी अरब और यूएई के बीच यह तनाव ऐसे समय सामने आया, जब यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाह्यान एक निजी दौरे पर पाकिस्तान के रहीमयार ख़ान में मौजूद थे.

इस तनाव के तुरंत बाद पाकिस्तान ने दोनों देशों से संपर्क साधा है.

मंगलवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने रहीमयार ख़ान में शेख़ मोहम्मद बिन ज़ैद अल नहयान से मुलाक़ात की.

इसके बाद जारी सरकारी बयान में कहा गया है कि इस मुलाक़ात में द्विपक्षीय मामलों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा हुई.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इसहाक़ डार ने मंगलवार की शाम सऊदी विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान से संपर्क किया था.

इन दोनों मुलाक़ातों के बाद जारी सरकारी बयानों में यमन का ज़िक्र नहीं है, लेकिन विश्लेषकों की राय है कि दोनों देशों से संपर्क का मक़सद शायद तनाव को कम करना हो सकता है.

यमन में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन में पाकिस्तानी सेना सीधे शामिल नहीं है, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) राहील शरीफ़ ऊँचे ओहदे पर हैं.

क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर क़न्दील अब्बास का कहना है कि पाकिस्तान के इन दोनों देशों के साथ गहरे संबंध और आर्थिक हित जुड़े हैं.

इनमें तनाव बढ़ने से पाकिस्तान सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है.

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर क़न्दील ने बताया कि मुसलमानों के सबसे पवित्र स्थलों की मौजूदगी की वजह से सऊदी अरब ख़ुद को इस्लाम का केंद्र मानता है और अतीत में मुस्लिम दुनिया के कई अहम फ़ैसले सऊदी अरब ने किए हैं, लेकिन 2015 के बाद से उसकी यह केंद्रीय भूमिका कम हो रही है.

उन्होंने कहा कि इसका स्पष्ट उदाहरण गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों के बीच मतभेद हैं.

लेकिन संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के मामले में यह सहमति ज़रूर थी कि एक दूसरे को अगर कोई ख़तरा हुआ, तो दोनों मिलकर मुक़ाबला करेंगे.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने रहीमयार ख़ान में यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाह्यान से मुलाक़ात की
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने रहीमयार ख़ान में यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाह्यान से मुलाक़ात की

डॉक्टर क़न्दील अब्बास का कहना है कि अब दोनों देशों के बीच आपसी हितों के मामले में मतभेद है.

उमर करीम रियाद स्थित किंग फ़ैसल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऐंड इस्लामिक स्टडीज़ के रिसर्च फ़ेलो हैं.

उनके अनुसार, पाकिस्तान उन दोनों देशों के बीच इस तनाव को कम करने में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा सकता, क्योंकि वह आर्थिक रूप से दोनों पर निर्भर है.

उन्होंने कहा कि अगर यमन में यूएई समर्थित समूह एसटीसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई से तनाव बढ़ता है, तो पाकिस्तान 'न्यूट्रल' नहीं रह सकता है.

उन्होंने कहा कि सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान को सऊदी अरब का साथ देना पड़ेगा.

डॉक्टर क़न्दील अब्बास का कहना है कि पाकिस्तान ने हाल के तनाव के बाद दोनों देशों से संपर्क ज़रूर किया है और पाकिस्तान की कोशिश है कि यह तनाव कम हो, लेकिन "यूएई ने कई अहम मामलों में पाकिस्तान के बजाय भारत को अधिक महत्व दिया है."

उन्होंने कहा कि हालाँकि 21 लाख पाकिस्तानी वर्कर्स यूएई में हैं, इसलिए पाकिस्तान ने कभी यूएई की नीतियों पर खुलकर बात नहीं की.

क़न्दील अब्बास ने कहा कि अतीत में पाकिस्तान को शिकायत रही है कि दुबई पोर्ट अपने आर्थिक हितों के लिए पाकिस्तान के 'ग्वादर पोर्ट' की राह में रुकावटें डालता रहा है.

मकला, दक्षिण यमन की इस तस्वीर में सऊदी हमले में नष्ट हुए यूएई सैन्य वाहनों को दिखाया गया है
इमेज कैप्शन, मकला, दक्षिण यमन की इस तस्वीर में सऊदी हमले में नष्ट हुए यूएई सैन्य वाहनों को दिखाया गया है

तनाव का रुख़ क्या होगा?

यमन का ताज़ा विवाद दिखाता है कि भौगोलिक, राजनीतिक और जियो-इकोनॉमिक मुद्दों पर यूएई और सऊदी अरब के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं.

इन दोनों खाड़ी देशों के बीच 'ओपेक' में किए गए फ़ैसले अलग हैं. इसके अलावा सूडान, यमन और दूसरे सीमा विवादों के मामले में दोनों के स्टैंड अलग हैं.

दोनों देश अफ़्रीका में क्षेत्रीय शक्ति और प्रभाव बढ़ाने के लिए भी एक दूसरे के आमने-सामने नज़र आते हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के आर्थिक हितों की दिशा अब अलग-अलग है.

किंग फ़ैसल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऐंड इस्लामिक स्टडीज़, रियाद में रिसर्च फ़ेलो उमर करीम का कहना है कि सऊदी अरब के लिए अपनी रक्षा के मामले बहुत महत्वपूर्ण हैं और रियाद के लिए यह बर्दाश्त करना नामुमकिन है कि लाल सागर के उस पार वह समूह सक्रिय हों, जो सऊदी अरब की सिक्योरिटी के लिए ख़तरा है.

उन्होंने कहा कि रियाद से मुक़ाबले में अबू धाबी 'हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका' के देशों में कई समूहों को सपोर्ट कर रहा है और उसके पास ऐसे कई कार्ड्स हैं, जो सऊदी अरब के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.

उमर करीम के अनुसार सूडान, सोमालीलैंड, इथियोपिया और अदन की खाड़ी के मामलों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बहुत खुले हुए हैं.

विश्लेषक डॉक्टर क़न्दील अब्बास के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात क्षेत्र और अफ़्रीकी देशों में व्यापारिक कॉरिडोर और अड्डे हासिल करना चाहता है और तेल उत्पादन करने वाले दूसरे देश भी इस मामले में काफ़ी सक्रिय हैं.

उन्होंने कहा कि सूडान, लीबिया और फ़लस्तीन के मामले पर दोनों खाड़ी देशों के स्टैंड में बदलाव और मतभेद पूरी इस्लामी दुनिया पर असर डाल रहा है.

डॉक्टर क़न्दील अब्बास का मानना कि मौजूदा हालात को देखते हुए भविष्य में तनाव बढ़ने की आशंका है.

हालाँकि, उनका कहना है कि एक हद तक तो यह मामले ऐसे ही चलेंगे, लेकिन अगर तनाव बहुत ज़्यादा बढ़ता है तो वैश्विक शक्तियाँ अपनी भूमिका निभाएँगी.

उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व के क्षेत्र में ईरान और इसराइल की वजह से वैसे ही बहुत तनाव है और अमेरिका इस समय यह नहीं चाहेगा कि अरब देश भी आपस में लड़ने लगें.

इसलिए उनके अनुसार दोनों के साथ अमेरिका के गहरे संबंध हैं, इसलिए वह दोनों अरब देशों को मतभेद से दूर रखेगा.

यमन के मामले पर पिछले दिनों बढ़ते तनाव के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों से टेलीफ़ोन पर बात की थी.

हालाँकि विश्लेषक उमर करीम का कहना है कि अगर विवाद ज़्यादा बढ़ता है, तो अमेरिका के हस्तक्षेप के बावजूद यह जारी रह सकता है क्योंकि क़तर और खाड़ी के दूसरे देशों के बीच के विवाद में अमेरिका कोई ख़ास भूमिका नहीं निभा पाया था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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