कमज़ोर आंखों का असल कारण क्या है?

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    • Author, डेविड रॉबसन
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
  • प्रकाशित

निकट दृष्टि दोष हमारी सबसे आम शिकायतों में से एक है. लेकिन क्या हमने इसके कारण और उपचार को मौलिक तौर पर ग़लत समझा है?

जब मैं किशोर अवस्था में था तो मेरी आँखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होने लगी और मुझे चश्मा पहनना पड़ा. पहले चश्मे का लेंस पतला था लेकिन फिर यह मोटा, और मोटा होता चला गया.

मैंने आखों के डॉक्टर से पूछा कि ऐसा क्यो हो रहा है? आईचार्ट पर आकृतियाँ धुंधली क्यों दिखने लगी हैं. नेत्र चिकित्सक की प्रतिक्रिया हमेशा एक जैसी ही होती - 'आपके जीन्स या पढ़ाई के प्रति प्रेम.'

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शायद आपके डॉक्टर ने भी निकट दृष्टि दोष के मामले में ऐसा ही कुछ कहा होगा. ताज़ा शोध से संकेत मिलते हैं कि ये मान्यताएं ग़लत हो सकती हैं.

विशेष रिपोर्ट पढ़ें

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आधुनिक पर्यावरण में कई चीज़ें ऐसी हैं जो आंखों की रोशनी कम होने की वजह हो सकती हैं. और कुछ सरल उपाय अपनाकर हम अपने बच्चों की आंखों की रोशनी को धुंधली पड़ने से बचा सकते हैं.

आंखों के कमज़ोर होने की वजह अनुवांशिक है, यह दलील वास्तव में कभी मुझे सच नहीं लगी. चश्मे के बिना मैं एक राइनो और एक चट्टान का अंतर नहीं बता सकता था.

और यदि ये समस्या अनुवांशिक होती तो बिना चश्मे के जंगलों में इधर-उधर धक्के खाते हुए मेरे पूर्वज तो जीन पूल से बाहर हो जाते.

सच्चाई ये है कि दुनियाभर में निकट दृष्टि दोष एक महामारी बनता जा रहा है.

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यूरोप और अमरीका के लगभग 30-40 प्रतिशत लोगों को चश्मे की ज़रूरत है और कुछ एशियाई देशों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुँच गया है.

यदि हम में निकट दृष्टि दोष का जीन था तो अदभुत है कि हमारी पूर्वजों की पुश्तें इन स्पष्ट कमियों के बावजूद हज़ारों साल से आगे कैसे बढ़ती रहीं.

वास्तव में, कनाडा में एस्किमो के अनुभवों से लगभग 50 साल पहले ही इस सवाल को सुलझा लिया जाना चाहिए था.

वहाँ पुरानी पीढ़ी में लगभग किसी को भी निकट दृष्टि दोष नहीं था. लेकिन उनके बच्चों में से 10 से 25 प्रतिशत को चश्मे की ज़रूरत पड़ी.

कोपेनहेगेन में ग्लोसट्रप यूनिवर्सिटी की नीना जैकबसन कहती हैं, “ऐसा एक अनुवांशिक बीमारी के कारण कभी न होता.”

बदलता पर्यावरण

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महत्वपूर्ण है कि इसी दौरान एस्किमो को पश्चिमी जीवनशैली प्रभावित करने लगी थी. वे अपनी परंपरागत जीवनशैली जैसे मछलियों का शिकार करने से दूर होने लगे थे.

डब्लिन स्थित चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के इयान फ़्लिटक्रॉफ्ट कहते हैं, “निकट दृष्टि दोष एक औद्योगिक बीमारी है.”

वे कहते हैं, "संभव है कि हमारे जीन अब भी निकट दृष्टि दोष तय करने में भूमिका निभा रहे हों, लेकिन पर्यावरण में बदलाव ही वो कारण था, जिससे समस्या इस कदर उभरी."

निकट दृष्टि दोष की जो आम वजह बताई जाती है वह है पढ़ाई.

पहली नज़र में ये सही भी लगता है. किसी भी यूनिवर्सिटी के व्याख्यान या कॉन्फ्रेंस में देखिए, अधिकतर लोग चश्मा लगाए हुए दिखेंगे.

पढ़ाई से रिश्ता

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नेत्र रोग अध्ययनों में पता चला है कि पढ़ाई का आंखों पर उतना असर नहीं पड़ता, जितना कि माना जाता है.

फ़्लिटक्रॉफ्ट कहते हैं, “हमने जितना इस पर शोध किया और लोगों की पढ़ने के घंटों को मापा, आंखों की रोशनी से इसका रिश्ता उतना कम होता मिला.”

ओहियो में बच्चों पर हुए शोध से पता चला कि ‘पढ़ाकू’ बच्चों और कमज़ोर आंखों के बीच कोई रिश्ता ही नहीं है.

वहीं यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में हुए अध्ययनों में पता चला कि जो लोग बंद कमरों के बाहर ज़्यादा समय गुजारते हैं, उनकी आंखें ज़्यादा स्वस्थ होती हैं.

सूरज की रोशनी

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लेकिन ऐसा क्यों है? आम तौर पर सूरज की रोशनी को इसकी वजह माना जाता है. बच्चों पर भी हुए शोध में पता चला कि जो बच्चे सूरज की रोशनी का ज़्यादा मजा लेते हैं, उन्हें चश्मों की ज़रूरत उतनी ही कम होती है.

शायद इसकी वजह ये है कि सूरज की रोशनी से विटामिन डी मिलता है, जो कि स्वास्थ्य प्रतिरक्षा तंत्र और दिमाग़ के साथ-साथ आंखों को स्वस्थ रखने में भी मदद करता है.

सूरज की किरणें सीधे आंख में ही डोपामाइन रिलीज़ करती हैं. डोपामाइन आंखों की स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है.

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फ़्लिटक्रॉफ्ट की सलाह है कि आंख के संदर्भ में जो भी कार्रवाई करें, बहुत सावधानी से करें.

ऐसा इसलिए क्योंकि आंखों के बारे में कई अवधारणाएँ बन गई हैं और उनमें से कई सही नहीं हैं.

एक अवधारणा है कि चश्मा नहीं लगाने से आंखों की रोशनी सुधरेगी. यह एकदम ग़लत है.

फ़्लिटक्रॉफ्ट कहते हैं, “मेरा निजी अनुभव है कि यह अवधारणा एकदम ग़लत है. इसी अवधारणा के तहत मैंने चश्मा लगाना छोड़ा और नतीजे बहुत ख़राब रहे, तीन साल बाद मेरे चश्मे का नंबर दोगुना हो गया.”

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