हांगकांग में हंगामा क्यों है बरपा?

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हांगकांग की सड़कों पर उतरे हज़ारों प्रदर्शनकारी चीनी सरकार के चेतावनी के बावजूद सड़कों पर डटे हुए हैं. आइए जानते हैं इस प्रदर्शन से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब.

क्यों नाराज़ है लोग?

प्रदर्शनकारी 2017 के चुनाव में चीनी सरकार की ओर से दिए जाने वाले सीमित लोकतांत्रिक अधिकार को लेकर नाराज़ है.

यह एक सविनय अवज्ञा आंदोलन है जिसे 'ऑक्यूपाई सेंट्रल' के लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने शुरू किया.

हांगकांग के छात्रों ने सितंबर के आखिर में कक्षाओं का बहिष्कार कर एक अलग आंदोलन खड़ा किया और जब उनका आंदोलन सरकार के ख़िलाफ़ ज़्यादा आक्रोशित हुआ तो 'ऑक्यूपाई सेंट्रल' अपने अभियान से पीछे हट गया.

क्या हैं इस आंदोलन के इतने तीव्र होने का कारण?

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सड़कों पर उतरे हांगकांग के दसियों हज़ार आम नागरिकों में ज़्यादातर नौजवान हैं.

ऑक्यूपाई सेंट्रल का कहना है कि इस आंदोलन के पीछे कोई एक समूह नहीं है. प्रदर्शनकारी पुलिस की चेतावनी और आंसू गैस छोड़ने के बावजूद हटने के लिए तैयार नहीं है.

कितना हिंसक हो सकता है ये आंदोलन?

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ज़्यादातर प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक माहौल है लेकिन आगे इसकी स्थिति पुलिस की भीड़ पर होने वाली कार्रवाई पर निर्भर करेगी.

ऑक्यूपाई सेंट्रल ने जोर देकर कहा कि यह एक अहिंसक आंदोलन है लेकिन विरोध-प्रदर्शन में छात्रों की बढ़ती भागीदारी से ये परिदृश्य बदल भी सकता है.

क्या विरोध से चीन का इरादा बदल सकता है?

हांगकांग में स्थानीय लोगों के पास प्रत्यक्ष तौर पर सरकार चुनने का अधिकार नहीं होने के बावजूद अभिव्यक्ति और विरोध का अधिकार है.

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हांग कांग को पूरी आज़ादी देने का अर्थ है चीन पर उसके प्रशासन में पूरी तरह से उलटफेर. और ये संभव नहीं है कि चीन इसे स्वीकार कर ले.

क्योंकि जहां तक चीन का सवाल है ये उसके लिए एक ख़तरनाक शुरुआत हो सकती है.

क्या सभी लोग प्रदर्शनकारियों से सहमत है?

नहीं ऐसा नहीं है. हांगकांग में कई तरह के विचार वाले लोग हैं जिनके बारे में विश्लेषकों का कहना है कि उनका तेज़ी से धुव्रीकरण हुआ है.

लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता राजनीतिक सुधार और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव चाहते हैं जो अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुरूप हो.

लेकिन हांगकांग एक व्यावसायिक मानसिकता वाला शहर भी है और जिसकी वजह से वे सविनय अवज्ञा में शामिल होकर चीन को नाराज़ नहीं करना चाहेंगे.

कौन है प्रदर्शन के पीछे?

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ऑक्यूपाई सेंट्रल ने इस मुहिम में मुख्य भूमिका निभाई है. इसके नेता हैं क़ानून के प्रोफेसर बेनी ताई, समाजशास्त्री चान कीन-मैन और चर्च मिनिस्टर यु-मिंग.

इसे हांगकांग के कई राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है. लेकिन पिछले हफ़्ते छात्र नेता एलेक्स चाउ और लेस्टर शुम सामने निकल कर आए हैं.

जोशुआ वांग जो कि 'देशभक्ति पढ़ाने वाली शिक्षा' के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन के संचालक थे, वे भी हालिया आंदोलन की एक ताकत है.

चीन के सामने सबसे बड़ा ख़तरा क्या है?

चीन ऐसा कोई आंदोलन नहीं चाहता है जो उनके लिए चुनौती बने और ना ही वे ये चाहते हैं कि लोकतंत्र की मांग की आगे हांगकांग से चीन तक आ पहुंचे.

चीन ने आंदोलन की कड़ी निंदा की है.

तो अब क्या होने वाला है?

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प्रदर्शनकारी आंदोलन से हटने को तैयार नहीं है. 2017 में प्रत्यक्ष चुनाव कराने के लिए हांगकांग सरकार को काउंसिल के सामने समर्थन के लिए राजनीतिक सुधार का खाका प्रस्तुत करना होगा.

लोकतंत्र समर्थक सांसदों का कहना है कि वे चीनी फैसले पर आधारित किसी भी प्रस्ताव को समर्थन नहीं देंगे.

अगर प्रत्यक्ष चुनाव कराने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिलती है तो हांगकांग में पहले की तरह ही चुनाव होंगे जिसमें 1200 लोगों की एक समिति होगी और जिसके सदस्य चीन समर्थक होंगे.

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