विदेशों में बसे भारतीयों को क्यों भाई आप?

    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
  • प्रकाशित

लंदन की ठंड में छुट्टी के दिन जहाँ आम लोग ऊनी कपड़े और टोपी पहने घर में बैठना पंसद करेंगे, वहीं आम आदमी पार्टी के कई समर्थक पतली सी टोपी पहन बारिश में इकट्ठा हुए. मौका था आम आदमी पार्टी के लंदन दफ़तर का उद्घाटन. यहाँ ढोल नगाड़े नहीं थे लेकिन जोश और उत्साह में कोई कमी नहीं थी.

दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की सफलता का श्रेय विदेशों में बसे भारतीयों को भी दिया जा रहा है. चुनाव की पहली सफलता के बाद विदेशों में बसे भारतीयों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं तो वहीं आम आदमी पार्टी के तौर तरीकों को लेकर एनआरआई सवाल भी उठा रहे हैं.

हैदराबाद की अशरफ़ लंदन में अपनी पति अमीन के साथ रहती हैं और दोनों आईटी क्षेत्र में काम करते हैं. जब पति अमीन अन्ना आंदोलन और फिर आप से जुड़े तो वे इसके खिलाफ़ थी. लेकिन अशरफ़ कहती हैं कि केजरीवाल ने उन्हें अपना रुख़ बदलने पर मजबूर कर दिया.

आप के विरोध से समर्थन तक

बीबीसी से बातचीत में अशरफ़ ने कहा, "मैं आप की समर्थक हूँ लेकिन इससे जुड़ने की मेरी कहानी थोड़ी अलग है. मेरे पति जब इस आंदोलन से जुड़े थे तो मैने विरोध किया था. मुझे लगता था कि कोई बदलाव होने वाला नहीं है और हमें अपना वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहिए. मैं अपने पति को भी ज़्यादा प्रोतसाहित नहीं करती थी. लेकिन फिर जब मैने जंतर मंतर पर लोगों को देखना शुरु किया तो मुझे लगा कि अगर एक इंसान इस मुहिम से जुड़े तो वो इत्तेफ़ाक हो सकता है लेकिन अगर हजा़रों लोग इससे जुड़ रहे हैं तो ये इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता और इसमें ज़रूर कुछ न कुछ सच्चाई होगी. तभी मैने आप से जुड़ने का फ़ैसला किया."

लंदन में बसे लेखक शरद अवस्थी ने भी आप का दामन थामा है. उनका कहना है, मैं देशभक्त हूँ इसलिए आप से जुड़ा. हमारे अंदर एक ज़ज्बा था, जोश था कुछ करने का. आप ने हमें रास्ता दिखाया है. ब्रिटेन में बसे ऐसे कई भारतीयों से हमारी मुलाक़ात हुई जो अलग अलग कारणों से आप से जुड़े हैं.

एफ़डीआई जैसे मुद्दों पर आलोचना

दिल्ली चुनाव में मिली सफलता और विदेशों में बढ़ती पैठ से आप समर्थक काफ़ी ख़ुश हैं लेकिन इसी बीच कई मुद्दों को लेकर आप की आलोचना भी हो रही है, जिनमें वो मुद्दे भी शामिल हैं जिनका सरोकार आप्रवासी भारतीयों से भी है.

दिल्ली में अफ़्रीकी महिलाओं के साथ कथित नस्लभेद के आरोप आप नेता पर लगे हैं. दिल्ली में सत्ता में आने के बाद केजरीवाल सरकार ने रिटेल में एफ़डीआई लाने का फ़ैसला भी पलट दिया. जबकि कई आप्रवासी भारतीय एफ़डीआई के हक़ में बताए जाते हैं. लेकिन लंदन में आप नेता इन फ़ैसलों का बचाव कर रहे हैं.

ब्रिटेन में आप के संयोजक राज रेडिज गिल कहते हैं, "नस्लभेद के सवाल को लेकर हम बहुत संवेदनशील हैं, हम ब्रिटेन में रहते हैं और हम नस्लभेद की समस्या को समझते हैं. लेकिन ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं. जहाँ तक एफ़डीआई की बात है तो हमने दिल्ली के व्यापारियों से बात की थी. हमें लगा कि रिटेल में एफ़डीआई उनके लिए हानिकारक है. वे इसके हक़ में नहीं हैं. हमने जो मैनीफ़ेस्टो में लिखा था, वही किया है."

तारीफ़ और आलोचना के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम आदमी पार्टी को लेकर काफ़ी जिज्ञासा है.

एनआरआई की चिंताएँ

दावोस सम्मेलन में भी पार्टी का ज़िक्र किया गया था. ब्रिटेन की गोल्डस्मिथ यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में लेक्चरर मार्टिन वेब दुनिया में चल रही भ्रष्टाचार विरोध मुहिमों पर शोध कर रहे हैं और इसके तहत आप आदमी पार्टी का भी अध्ययन कर रहे हैं. दिल्ली चुनाव के दौरान वे भारत में थे.

उनका कहना है, "ये पूरा घटनाक्रम काफ़ी दिलचस्प है. एक नागरिक आंदोलन जो चुनाव जीतकर सत्ता में पहुँच गया है. पिछले कुछ सालों में कई देशों में ऐसा आंदोलन हुआ है लेकिन भारत में बिना हिंसा के इसे अंजाम दिया गया है. भारत में आप के साथ हर वर्ग के लोग जुड़े हैं."

लंदन में आप समर्थकों का कहना है कि भारत को लेकर उनकी चिंताएँ भी वही हैं जो भारत में रहने वाले लोगों की है.

लंदन की वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी में डेमोक्रेसी विभाग के अध्यक्ष और हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स सदस्य भीखू पारिख मानते हैं कि 'आप' को लेकर आप्रवासी भारतीयों में समर्थन काफ़ी हैं क्योंकि वे भी चाहते हैं कि उनका देश ऐसा हो जिसे लेकर शर्मिंदगी न हो.

आप की नीतियों पर उठते सवालों पर लॉर्ड भिखू पारिख कहते हैं, "विदेशों में यूँ तो हर पार्टी के समर्थक हैं चाहे वो भाजपा हो या कांग्रेस. लेकिन आप ये बताएँ कि इन पार्टियों के पास कौन सी पॉलिसी है. विदेशी नीति की ही बात करें तो भाजपा की नीति कितनी अलग है बीजेपी की नीति से."

दिल्ली में सत्ता का स्वाद चखने के बाद अब आम आदमी पार्टी की नज़र लोकसभा चुनाव पर है. बैठकों, सोशल मीडिया, इंटरनेट हैंगआउट के ज़रिए अभियान अभी से शुरु हो चुका है जहाँ कई मुद्दों पर बहस होती है. छोटे, बड़े, नए सदस्य इससे जुड़ भी रहे हैं. भारत ही नहीं, विदेशों में बसे भारतीयों की नज़रें इसी पर टिकी हैं कि क्या भारत की सबसे युवा पार्टी राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी छाप छोड़ पाएगी.

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