दरकी ज़मीन तो पानी बचाने के नुस्ख़े याद आए

    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में ज़मीन के भीतर पत्थरों और मिट्टी की परतों के बीच में मौजूद पानी को निकालने और सुरक्षित रखने के कई नायाब तरीके मौज़ूद थे.

इन सभी पर नज़र डालने से पता चलता है कि उस समय लोगों का ध्यान प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने पर था.

आइए हम बताते हैं कि कुछ ऐसे ही नायाब तरीक़ों के बारे में.

रेगिस्तान की बेरियां

बाहर से कुएं की तरह दिखने वाली बेरियां ज़मीन के नीचे फंसे पानी को ऊपर तक लाने में सफल रहतीं हैं.
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तालाब के बीच में भी बेरियां होती हैं. तालाब के सूख जाने पर भी इन बेरियों में तीन साल तक मीठा पानी मिलता रहता है.
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पुराने समय में बेरियां बनाने के लिए बड़े घुमावदार पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता था. इन पत्थरों को जोड़ने के लिए किसी भी चीज़ का इस्तेमाल नहीं किया जाता था.
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केरल की सुरंगें

केरल के कासरगोड ज़िले के किसान आज भी पीने के पानी के लिए प्राचीन सुरंगों पर ही निर्भर हैं. सख्त मिटटी वाली ज़मीन में खोदी गई इन सुरंगों से मीठा पानी मिलता है.
इमेज कैप्शन, केरल के कासरगोड ज़िले के किसान आज भी पीने के पानी के लिए प्राचीन सुरंगों पर ही निर्भर हैं. सख्त मिटटी वाली ज़मीन में खोदी गई इन सुरंगों से मीठा पानी मिलता है.
ज़मीन में सुरंगों की खुदाई तब तक चलती है जब तक पानी न मिले. पानी मिलने के बाद उसे एक तालाब की तरफ़ मोड़ दिया जाता है.
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अगर सुरंगे लंबी होतीं हैं तो उनके ऊपर वायु संचालन के तरीके भी दिए जाते हैं.
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तालपारिज, कर्नाटक

तालपारिज एक पानी के टैंक का वो बिंदु होता है, जहाँ से बालू वाली मिट्टी का पानी रिस कर ऊपर आता है. इस पानी का स्रोत बारिश होती है, जो पत्थरों के बीच में जमा होता है.
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कुन्डी भंडारा, बुरहानपुर, मध्य प्रदेश

मुग़ल राज्य के सीमावर्ती इलाक़े में ताप्ती नदी के पानी को सुरक्षा कारणों से शहर में नहीं लाया जाता था. पानी की आपूर्ति का एक नया तरीक़ा 1615 में ईजाद किया गया. इसमें पास की सतपुड़ा पहाड़ियों के ज़रिए शहर में पीने का पानी लाया जाता था.
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