कश्मीर में पत्थर फेंकना अब महज़ रस्मी

कश्मीर, पत्थरबाज़ी, विरोध-प्रदर्शन
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित कश्मीर में पिछले कई सालों से युवकों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें होना आम बात हो चुकी है.

एक तरफ हाथों में पत्थर लिए युवक और दूसरी तरफ हथियारों से लैस सुरक्षा बल. युवक पत्थर फेंकते हैं तो सुरक्षा बल आंसू गैस और शूटर स्टिक का इस्तेमाल करते हैं.

श्रीनगर के डाउनटाउन में हर शुक्रवार को होने वाली पत्थरबाज़ी ने अब एक मज़हबी रस्म की शक्ल इख़्तियार कर ली है.

पत्थरबाज़ी के दौरान कई बार युवक पाकिस्तान तो कभी इस्लामिक स्टेट के झंडे लहराते हैं.

पत्थरबाज़ी को कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ नाराज़गी जताने का एक ज़रिया माना जाता है. पिछले कई सालों में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने के इल्ज़ाम में सैंकड़ों और हज़ारों युवकों पर मामले दर्ज किए जा चुके हैं.

कश्मीर में हथियारबंद आंदोलन साल 1990 में शुरू हुआ. 2008 के आसपास कश्मीर में सुरक्षा बलों पर पथर फेंकने का सिलसिला शुरु हुआ.

कश्मीर, पत्थरबाज़ी

श्रीनगर के डाउनटाउन में रहने वाले 19 साल के इक़बाल (बदला हुआ नाम) हर शुक्रवार को सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते हैं. इसके पीछे वो एक ख़ास वजह बताते हैं.

वो बताते हैं, "सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने का मक़सद ये है कि भारत की सेना ने हम पर ज़ुल्म किया है जब तक हिंदुस्तान हमें आज़ाद नहीं करेगा तब तक ये सब जारी रहेगा. हमारी मंज़िल आज़ादी है और वह हम लेकर ही रहेंगे."

कुछ युवक पत्थरबाज़ी जारी रखना चाहते हैं तो कई ऐसे भी हैं जो अब पत्थरबाज़ी को ग़लत मानने लगे हैं.

कश्मीर के ज़िला कुलगाम के रहने वाले 25 साल के इरफ़ान अहमद ने चार साल तक बढ़चढ़ कर पत्थरबाज़ी की. इरफ़ान इस समय पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "मैं ऐसे कुछ लोगों के संपर्क में आया जो कश्मीर मसले को सियासी होने के साथ-साथ धार्मिक मसला भी मानते हैं. मैं ये मानता था कि पत्थरबाज़ी करके मैं अपने धार्मिक रहनुमाओं और धार्मिक भावनाओं को पूरा कर रहा हूं. मैं ये भी समझता था कि मेरी पत्थरबाज़ी से भारत हमें आज़ाद कर देगा और कश्मीर में इस्लाम की बहार आएगी. लेकिन ये तो कोई धार्मिक मसला ही नहीं है."

कश्मीर, विरोध-प्रदर्शन

अब इरफ़ान कश्मीर मसले का बातचीत के ज़रिए हल चाहते हैं.

उन्होंने कहा, "हमने 2010 में हुए आंदोलन में 120 युवकों की पत्थरबाज़ी में जानें गंवा दीं, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ. इसके बाद मैंने इस्लाम को पढ़ना शुरू किया और देखा कि इस्लाम हमें अमन का सबक़ देता है."

तीन सालों तक पत्थरबाज़ी करने वाले 24 साल के इम्तियाज़ अहमद भट्ट की पत्थरबाज़ी के दौरान गोली लगने से एक आंख की रौशनी चली गई.

वो कहते हैं, "मैं पत्थरबाज़ी इस लिए करता था कि कश्मीर आज़ाद होगा. लेकिन जब मेरी आंख की रौशनी चली गई तो हमारा कोई नेता सामने नहीं आया. आंख का इलाज कराने में मेरे लाखों रुपए खर्च हुए."

इम्तियाज़ दो वर्ष तक गोली लगने के बाद बिस्तर पर पड़े रहे. आठवीं जमात तक पढ़ाई करने वाले इम्तियाज़ के पास फिलहाल कोई काम नहीं हैं.

कश्मीर, विरोध-प्रदर्शन

पत्थरबाज़ी कश्मीर में दो तरह से होती है. एक तो जब किसी को प्रदर्शन के दौरान गोली लगती है तब या फिर कोई गिरफ्तार होता है या हड़ताल होती है तब.

कश्मीर में पत्थरबाज़ी को सुरक्षा एजेंसियां एक चुनौती मानती हैं.

सीआरपीएफ के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के के शर्मा बताते हैं, "हमारे लिए ये एक परेशानी तो ज़रूर है लेकिन अब पत्थरबाज़ों की तादाद में कमी आई है. जो नये बच्चे ऐसा करते हैं, हम उन्हें समझाते हैं."

पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने साल 2011 में उन सभी पत्थरबाज़ों को आम माफ़ी देने का एलान किया था जिनके ख़िलाफ़ मामले दर्ज हैं.

पुलिस आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 634 लोगों को पत्थरबाज़ी के इल्ज़ाम में गिरफ्तार किया गया था.

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