वेतन आयोगः बाबुओं की मुस्कान, कौन हलकान

सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट
    • Author, टीएसआर सुब्रमणियन
    • पदनाम, पूर्व कैबिनेट सचिव, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट सरकार को 19 नवंबर 2015 को सौंपी गई. इसमें केंद्र सरकार के सभी कर्मचारियों के वेतन में क़रीब 24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की सिफारिश की गई है.

इस रिपोर्ट से केंद्र सरकार के क़रीब 47 लाख कर्मचारियों और पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोगों को 24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का फायदा मिलेगा.

इसे एक जनवरी 2016 से लागू किया जाना है. अगले वित्त वर्ष में यह भारत की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद के 0.5 प्रतिशत के बराबर बैठेगा.

आज़ादी के बाद से देश में लगभग हर दशक में वेतन बढ़ोत्तरी की यह प्रक्रिया दुहराई जाती है.

समय के साथ साथ, उच्चतम और न्यूनतम वेतन बढ़ोत्तरी का अनुपात, जो कि अबकी बार 12:1 है, 1950 के दशक से बिल्कुल अलग है.

इस बार न्यूनतम वेतन (ग्रुप डी के कर्मचारियों के लिए) 18,000 रुपये के मुक़ाबले अधिकतम वेतन 2.5 लाख रुपए (कैबिनेट सेक्रेटरी स्तर के कर्मचारियों के लिए) की सिफारिश हुई है.

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1950 के दशक में यह अनुपात 180:1 का हुआ करता था.

दूसरे शब्दों में सालों से वेतन बढ़ोत्तरी की दर कर्मचारियों के ग्रुप के अनुपात के उलट हुआ करती था, यानी ऊंचे रैंक के अफ़सरों के मुक़ाबले निचले ग्रुपों के कर्मचारियों की वेतन बढ़ोत्तरी आनुपातिक रूप से कहीं ज़्यादा होती थी.

आज के हालात में सी और डी (लोवर क्लेरिकल और चपरासी/ड्राइवर) के वास्तविक वेतन, निजी क्षेत्र के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हैं और अगर निजी मालिकाने वाले लघु एवं मध्यम उद्योगों से तुलना करें तो यह बहुत अधिक है.

सत्तर के दशक के बाद से, जब अफ़सरों का वेतन बहुत कम हुआ करता था, वेतन काफी बढ़ा है.

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और अगर मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को जोड़ें तो इसने बड़े अफ़सरों को बहुत आरामदायक स्थिति में ला दिया है.

इस तरह कुल मिलाकर, सरकारी कर्मचारियों को सालों से मिलने वाले आर्थिक लाभ आम तौर पर संतोषजनक रहे हैं.

एक तरफ़ सातवें वेतन आयोग से केंद्रीय करदाताओं पर सालाना एक लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा, लेकिन इसकी पूरी संभावना है कि आठ से 18 महीनों के अंदर राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों की वेतन बढ़ोत्तरी में इसी का अनुसरण करें.

एक संघीय ढांचे में यह तो होगा ही.

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अगर राज्यों के कर्मचारियों की संख्या को शामिल कर लें, जोकि केंद्रीय कर्मचारियों (शिक्षक, पुलिसकर्मी और ज़िला/तहसील के कर्मचारी) की संख्या का तीन गुना है, तो वेतन बढ़ोत्तरी का राष्ट्रीय स्तर पर बोझ प्रति वर्ष 4-5 लाख करोड़ रुपये के बराबर बैठेगा.

यह बहुत वाजिब सवाल है कि क्या भारत जैसा ग़रीब देश, समय समय पर होने वाले इस तरह के अतिरिक्त खर्च को वहन कर सकता है.

वेतन आयोग ने खुद को मुख्य रूप से वेतन से संबंधित सिफारिशों तक समेटे हुए है और कार्य परिस्थितियों, कार्यक्षमता के मुद्दे, जवाबदेही और काम करने की तौर तरीक़ों पर आम तौर पर बात नहीं की जाती है.

उदाहरण के लिए यह सवाल पूछा जा सकता है कि आज के सूचना तकनीक वाले युग में क्या वाकई हमें इतने सारे सरकारी कर्मचारियों की ज़रूरत है.

असल में, कर्मचारियों की संख्या को कम करने के सरकार द्वारा कई कोशिशें की गई हैं, इसका कोई नतीजा नहीं निकला.

इस तरह के मुद्दों और कुशलता से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है. इसी तरह समय समय पर जनता की क़ीमत पर छुट्टियां घोषित करने के ढर्रे पर भी कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई है.

वेतन बढ़ोत्तरी

सार्वजनिक छुट्टियों में कमी की ज़रूरत है. असल में 1990 के दशक में चौथे वेतन आयोग में सार्वजनिक छुट्टियों में कटौती के लिए कहा गया था लेकिन इसमें भी बहुत कम आगे बढ़ा जा सका है.

हालांकि सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को अभी विस्तृत पढ़ा जाना बाकी है, लेकिन इसमें कोई ऐसी अहम बात नहीं है जिस पर बात की जाय.

इस रिपोर्ट में ‘कामकाज के पैमाने को और कड़ा किए जाने’ और ‘उपलब्धियों के आधार पर वेतन’ का ज़िक्र किया गया है.

लेकिन इनको लागू करने में आने वाली बाधाओं का अध्ययन किया जाना बाकी है; आज के समय में कामकाज के पैमाने को और कड़ा करने की सिफ़ारिश करना थोड़ा अजीब है.

क्योंकि नीतियां बनाने या सामान्य प्रबंधन से जुड़ी अधिकांश सरकारी नौकरियों में, कामकाज के पैमाने तय करना बहुत आसान नहीं है.

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निजी क्षेत्र से अलग, कई सरकारी नौकरियों में इस तरह के पैमाने नहीं तय किए जा सकते, क्योंकि निजी क्षेत्र में पैमाने का संबंध, तय समय में लक्ष्य या पैसा हासिल करने से जुड़ा होता है.

वेतन आयोग का विचार अब पुराना पड़ चुका है और शायद कामकाज के प्रदर्शन, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधार को वेतन के साथ जोड़कर इसमें बदलाव लाए जाने की ज़रूरत है.

फ़ायदों के मुक़ाबले इस तरह की वेतन बढ़ोत्तरी से जनता पर पड़ने वाले बोझ पर भी विचार किया जाना फायदेमंद होगा.

करदाताओं पर बोझ बढ़ाने और वर्तमान और रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान लाने को अलग रख दें तो कोई भी पूछ सकता है कि सातवें वेतन आयोग ने क्या हासिल किया.

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