दादरी: 'मोदी की चुप्पी और भारतीयता का विसर्जन'

दादरी घटना
    • Author, शिव विश्वनाथन
    • पदनाम, समाजशास्त्री
  • प्रकाशित

विरोध सांकेतिक भी होता है, उसका अपना एक व्याकरण भी होता है. जब कोई लेखक विरोध करता है, तो इससे उसका राजनीतिक रुझान भी स्पष्ट होता है.

नयनतारा सहगल का साहित्य अकादमी सम्मान लौटाना, एक तरह से उनका राजनीतिक बयान ही है.

वास्तविकता में उन्होंने एक बहस को फिर से हवा दी है, जो अब तक दमदार दिख रही है.

इस बहस ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को अपने अपने आधारभूत विचारों पर ला खड़ा किया है.

बीजेपी और कांग्रेस के बीच की लड़ाई, दो राजनीतिक शैलियों की लड़ाई है. अगर गंभीरता से देखें तो सहगल का मोदी विरोध, विचारों का विरोध है.

विरोध

नयनतारा सहगल

जब नयनतारा सहगल ने अपना सम्मान लौटाया, तो यह बस एक सम्मान लौटाने भर का मसला नहीं था.

उन्होंने अपने बयान में कहा है कि वे भारतीय हैं. ऐसी लेखिका हैं, जिसे भारत ने सम्मानित किया है और अब वह भारत के भविष्य और मोदी के शासन में भारतीयता के विचार को लेकर चिंतित हैं.

उनके विरोध की तात्कालिक वजह भी है लेकिन इसके मूल कारण कहीं ज़्यादा गंभीर हैं.

उन्होंने यह भी कहा है कि बहुमत के आक्रोश को संतुष्ट करने के लिए एक नागरिक की जान की कोई अहमियत नहीं है.

आखिर अख़लाक जैसे एक लोहार को गौ-मांस खाने के संदेह में मार दिया गया, यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था में चूक का मामला नहीं है.

इससे लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा खतरे में आ गया है. भारतीयता का विज़न और आदर्श दोनों अचानक से भरभरा गए हैं.

भारतीयता पर ख़तरा

एम एम कलबुर्गी

नयनतारा सहगल को निश्चिय ही यह मालूम होगा कि वह शासन की गुणवत्ता पर बहस नहीं कर रही हैं, ना ही विकास के पैमाने की सत्यता पर वह सपने के मिट जाने के साथ साथ धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और विविधता भरे भारत के ख़त्म होने के मुद्दे पर बहस कर रही हैं.

उन्होंने ना केवल बयान दिया, बल्कि सम्मान भी लौटा दिया. जब साहित्य अकादमी के कर्ताधर्ताओं ने पुरस्कार की राशि पर सवाल उठाए तब तक सहगल ने अकादमी के एक लाख रुपए लौटा कर यह बताया कि हिसाब किताब और जबावदेही में अंतर है.

लिखना एक तरह से जिम्मेदारी और संरक्षण का काम है और लेखक भारतीयता की रक्षा करने वाला प्राणी है. यह भारत, प्रस्तावना और संविधान वाला भारत है.

सहगल विरोध और नाटक के अंतर को समझती हैं लिहाजा उन्होंने इस मुद्दे पर बहुत कुछ नहीं कहा, लेकिन उनका संदेश एकदम स्पष्ट है. कलबुर्गी से लेकर अख़लाक तक, भारतीयता पर ख़तरा बढ़ा है.

उदासीनता

कलबुर्गी शोक सभा

किसी भी महान नाटक के दौरान होने वाले इंटरवल में हम दोयम दर्जे की चीजों को देखते ही हैं.

संगीत सोम, महेश शर्मा और साहित्य जगत के कुछ नुमाइंदों ने इस विरोध को तमाशा बनाने की कोशिश की है, वे इस पूरी घटना को ही खारिज कर रहे हैं, इनका तर्क है कि ना तो दादरी की घटना और ना ही सहगल के विरोध को इस रुप में देखा जाना चाहिए.

आम जनता इसे समझ रही है और मोदी की चुप्पी ने इस भौंडेपन को बढ़ा दिया है. भारत को लेकर उनके विचार पर सवाल उठ रहे हैं और वह चुप्पी साधे हुए हैं मानो गोपनीय निर्वासन पर हों.

जब मोदी ने बयान दिया भी तो वह लीपापोती जैसा बयान था. उनकी देरी ने उनसे उम्मीदें बढ़ा दी थीं.

कम से कम कलबुर्गी और दादरी के मामले में वे ऐसे प्रधानमंत्री साबित हुए जो मौजूद भी हैं और गायब भी हैं. देरी, उदासीनता के बाद उनके बयान ने निराशा भी बढ़ा दी.

उन्होंने इस घटना पर ना तो दुख जताया, ना ही माफ़ी मांगी. हां थोड़ा भाव जरूर दिखा और उन्होंने इसे दुर्भाग्य बताया और इसका दोष उन्होंने विपक्षी पार्टियों पर मढ़ दिया.

संवेदनहीनता

नरेंद्र मोदी

इन सब कोशिशों में वे कांग्रेसी नेता की तरह ही नज़र आए. उन्होंने इस घटना को कमतर बताने की कोशिश की और इंकार वाला भाव उन पर हावी रहा. सांकेतिक तौर पर, उन्होंने इस घटना पर संवेदनशील ढंग से पेश आने का मौका गंवा दिया, इससे उनका ही खेल बिगड़ा है.

इंटरव्यू में उनका हाव-भाव सतही था और तो और उनकी जुबान लड़खड़ाती नजर आई.

सहगल के सहज विरोध का जवाब मोदी ने सीधे सीधे नहीं दिया. इसके अलावा राजनीतिक तौर पर भी, उनका जवाब ख़ास नहीं था.

वे अपने पार्टी और खुद को अच्छे आचरण का प्रमाणपत्र देते नजर आए. देश उनके जवाब के इंतज़ार में था और उनका जवाब आत्मकेंद्रित नजर आया.

ऐसा लगा कि वे सामान्य होने का दिखावा कर रहे थे. ऐसा जाहिर कर रहे थे जैसी हत्या मामूली बात हो. उन्होंने संशय और बेचैनी को बढ़ाया है.

सस्ता विकल्प

मेक इन इंडिया

इससे जाहिर तो यही हुआ कि प्रधानमंत्री खुद भारत और भारतीयता को लेकर बहुत परेशान नहीं हैं. सांकेतिक लड़ाई वे हार चुके हैं. लेकिन संदेश स्पष्ट है, अगर बीजेपी बिहार में चुनाव जीतती है तो कलबुर्गी और अख़लाक कोई मसला नहीं हैं.

नियमों और मूल्यों को लेकर होने वाले संघर्ष से चुनावी जीत ज्यादा प्रभावी होते है.

नयनतारा सहगल का अंदेशा सही साबित होता दिख रहा है. मोदी के शासन में विविधता भरे लोकतंत्र की महान भारतीयता ख़तरे में है.

एक लेखक ने सत्ता की राजनीति के खालीपन को सबके सामने उजागर कर दिया. भारतीयता और भारत की विविधता को मोदी ने खो दिया है. इस भारतीयता और भारत की विविधता का मेक इन इंडिया सस्ता विकल्प है.

(शिव विश्वानाथन ने लेखकों के सम्मान लौटाने और दादरी पर मोदी के बयान का विश्लेषण किया है. ये उनके निजी विचार हैं.)

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