बिहार में भारी क्यों दिख रही है भाजपा?

बिहार चुनाव
    • Author, राजेन्द्र तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली चुनावी सभा के साथ ही बिहार में चुनावी माहौल यकायक गरम हो गया है.

टिकट बंटवारे के बाद एनडीए और महागठबंधन के भीतर उपजा असंतोष अब शांत हो चुका है.

शुक्रवार को नरेंद्र मोदी की सभा के बाद सोशल मीडिया पर उन लोगों के सुर बदल गए जो बराबरी का मुक़ाबला बता रहे थे.

मतलब, भाजपा नीत एनडीए का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है. ऐसा क्यों लग रहा है?

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लालू, नीतीश और मोदी

आइए पहले जातिगत विश्लेषण करते हैं टिकट बंटवारे का. टिकट बंटवारे में दोनों गठबंधनों ने अपने-अपने पक्के वोट बैंक को साधने की कोशिश की है.

एनडीए ने 85 सवर्णों को टिकट दिया है और 67 टिकट पिछड़े वर्ग को. महागठबंधन ने 105 टिकट पिछड़ों को दिए और 33 टिकट मुसलमानों को.

इन 105 पिछड़ों में 64 यादव उम्मीदवार हैं. एनडीए ने 25 टिकट यादवों को दिए हैं. जहां तक अति पिछड़े वर्ग का सवाल है तो एनडीए ने 19 और महागठबंधन ने 33 टिकट इस वर्ग के लोगों को दिए हैं.

अब इन वर्गों के रुझान की बात करते हैं. माना जा रहा है कि सवर्ण वोट एनडीए को ही मिलेगा और इसके साथ वैश्य भी पूरी तरह एनडीए के साथ हैं.

यहां यह बताना ज़रूरी है कि बिहार में वैश्य-मारवाड़ी पिछड़े वर्ग में हैं. दूसरी तरफ, मुसलमान वोट महागठबंधन का माना जा रहा है. मुसलमान बिहार का सबसे बड़ा समुदाय है.

दूसरे नंबर पर यादव हैं. यादवों को रिझाने की पूरी कोशिश लालू प्रसाद कर रहे हैं और इस क्रम में वे जातिवादी आह्वान करने से भी नहीं हिचकते हैं.

लालू फ़ैक्टर

लालू यादव

इसको लेकर चुनाव आयोग ने उनको नोटिस भी जारी किया है. बाकी पिछड़ों में जो जातियां (वैश्य, कुर्मी, कुशवाहा आदि) आती हैं, उनका अनुपात तुलनात्मक रूप से बहुत कम है और इनमें से कई एनडीए के साथ मानी जा रही हैं.

अति पिछड़े वर्ग व महादलित को नीतीश कुमार ने अपने 10 साल के शासन में तैयार किया. लेकिन लालू प्रसाद के शासनकाल में अति पिछड़ा भुक्तभोगी रहा और आज लालू प्रसाद के साथ नीतीश कुमार का गठजोड़ है.

ऊपर से लालू प्रसाद यादवों की बात डंके की चोट पर कर रहे हैं. इससे अति पिछड़ी जातियों में महागठबंधन को लेकर संशय की स्थिति बननी स्वाभाविक है.

दलित व महादलित की बात करें तो दलित नेता रामविलास पासवान और महादलित नेता जीतन राम मांझी, दोनों ही एनडीए में हैं.

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इन समुदायों का 100 फीसदी वोट एनडीए को जाएगा लेकिन एक बड़ा हिस्सा एनडीए में जाएगा, इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है.

फिर भी सबकुछ निर्भर करता है अति पिछड़ी जातियों के वोट पर. भाजपा के बड़े नेता निजी बातचीत में कहते हैं कि इस समुदाय का बड़ा हिस्सा उनके खाते में आएगा.

अगर ऐसा हुआ तो भाजपा को बढ़त मिल सकती है.

तीसरा मोर्चा

पप्पू यादव

अब इसी से जुड़ा मुद्दा है कि वाम मोर्चा, तीसरा मोर्चा (सपा, पप्पू यादव, एनसीपी) और एमआइएम (ओवैसी की पार्टी) किसको नुकसान पहुंचाएंगे?

अगर वाम मोर्चा न होता तो निश्चित तौर पर महागठबंधन फायदे में होता क्योंकि वाम को मिलने वाले वोट महागठबंधन को ही मिलते.

तीसरे मोर्चे को भी जो वोट मिलेंगे, वे महागठबंधन से ही कटेंगे. ओवैसी फैक्टर दूसरी तरह से काम करेगा.

ओवैसी जिस भाषा में बोलने के लिए जाने जाते हैं, वह भाषा बहुसंख्यक समुदाय में भाजपा के पक्ष में ही ध्रुवीकरण करेगी और जो मुस्लिम वोट उनको मिलेंगे, उनकी क़ीमत महागठबंधन को ही अदा करनी पड़ेगी.

दूसरी तरफ ऐसा कोई फ़ैक्टर दिखाई नहीं देता जो एनडीए और खासतौर पर भाजपा के ख़िलाफ़ जाता हो.

अब बात करते हैं शुक्रवार को बांका में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा की.

विकास का मुद्दा

नीतीश कुमार

इस सभा में प्रधानमंत्री ने बिहारी अस्मिता और गौरव को उभारा, देश की राजनीति में बिहार के नेतृत्व करने की बात स्वीकारी और कहा कि देश को आगे बढ़ना है तो बिहार को आगे बढ़ना होगा.

यह बात पहले नीतीश कुमार कहते थे. नीतीश को बिना नाम लिए धोखेबाज और अहंकारी बताया और कहा कि विशेष पैकेज भी ये अहंकारी महाशय वापस कर सकते हैं.

साथ ही प्रधानमंत्री ने अपनी ग़लती भी सुधारी कि जो पैसा वो दे रहे हैं, वह बिहार का हक़ है और ऐसा करके वो अपना कर्तव्य निभा रहे हैं न कि अहसान कर रहे हैं.

वह विकासवाद का नारा दे गए. ख़बर है कि अगले 30 दिन में प्रधानमंत्री लगभग 20 सभाएं करने वाले हैं. इससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि हवा का रुख क्या होगा.

यह बात दीगर है कि हवा का यह रुख वाकई बिहार व देश के लिए अच्छा होगा या नहीं.

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