96 की उम्र में बने एमए के स्टूडेंट

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

“ एकाध पेपर में फेल हो जाएगें तो कोई घर से थोड़े ही ना निकाल देगा.”

ये कहना है हमेशा खुश रहने वाले, पढ़ाकू और टीवी सीरियल के शौकीन 96 साल के ‘बड़के दादू’ का.

इस उम्र में राज कुमार वैश्य उर्फ बड़के दादू ने एमए में दाखिला लिया है.

उन्हेंने पटना स्थित नालंदा खुला विश्वविद्यालय में 8 सितम्बर को अर्थशास्त्र विषय में दाखिला लिया.

विश्वविद्यालय ने उनकी इस चाहत का सम्मान किया.

प्रशासनिक अधिकारी दादू का दाखिला कराने खुद पटना के राजेन्द्र नगर स्थित उनके घर गए.

अर्थशास्त्र में ही दाखिला क्यों ?

अप्रैल 1920 में बरेली में जन्मे राज कुमार वैश्य ने अर्थशास्त्र का कठिन विषय चुना है.

रोजाना 4 घंटे अखबार पढ़ने वाले दादू कहते है, “ अखबार पढता हूं. सब जगह खालीपन सा दिखता है. राजनीति हो या फिर कुछ और. दुनिया की सभी चीजें इकनॉमिक्स से चलती है. सो मैने तय किया कि पढ़ूंगा तो इकनॉमिक्स ही पढूंगा. ”

दादू की शादी 15 बरस की उम्र में हुई. उन्होंने 1938 में आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अंग्रेजी, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र से ली.

1940 में उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई की. इसके बाद कोडरमा ( झारखंड) में क्रिश्चन माइका इंडस्ट्रीज में बतौर लॉ ऑफिसर नौकरी की और वहां से जनरल मैनेजर के पद से 1980 में रिटायर हुए.

सीरियल के शौकीन है दादू

1989 में बेटे की अचानक हुई मृत्यु के बाद राज कुमार पटना आ गए. इस बीत 2003 में पत्नी की भी निधन हो गया जो उनके लिए बड़ा झटका था.

दादू फिलहाल क़ुरान शरीफ पढ़ रहे है. अखबार पढ़ना, कभी कभार थियेटर देखने के साथ साथ टीवी सीरियल देखना उनका शौक है.

वो कहते हैं, “ऐतिहासिक सीरियल पसंद है. पहले जोधा अकबर देखता था. अब अशोका, रजिया सुल्तान, महाराणा प्रताप देखता हूं और एक सीरियल सफेद इश्क देखता हूं जो विधवाओं की जिंदगी पर है.”

दादू की सेहत का राज़

इस उम्र में भी राज कुमार जी बिना चश्मे के पढ़ लेते है. चश्मे का पॉवर महज + 0.3 है. रोजाना सिर्फ़ तीन रोटी खाते है.

वो कहते हैं, “ हमने कभी शराब छुई नहीं, कोई बुरी आदत नहीं पाली और कभी स्वादिष्ट भोजन नहीं किया. हमेशा सादा खाना खाया. अभी भी तीन दांत मेरे बचे है और मैं फर्राटे से लिख सकता हूं.”

हालांकि कुछ साल पहले कमर में चोट आ जाने के चलते वो अब वॉकर के सहारे चलते है. लेकिन फिर भी उनकी सक्रियता सबको चौकाती है.

नालंदा खुला विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एस पी सिन्हा कहते है, “ जब मेरे पास इस दाखिले का प्रस्ताव आया तो पहला सवाल जो दिमाग में आया कि क्या वो लिख पाएगें. लेकिन जब मैने उन्हे लिखते देखा तो पाया कि उनके हाथ में कोई कंपन नहीं है. वो चीजों के प्रति बहुत अच्छे से रिसपांड करते है.”

पढ़ाई के लिए तैयारी शुरू

दादू ने पढ़ाई के लिए टाइमटेबल बना लिया है. नाश्ते के बाद 1 घंटा और शाम को 2 घंटे वो पढ़ाई करेंगें. दादू की किताबें भी आ गई है हालांकि वो हिन्दी में है जिसके चलते वो थोड़ा निराश है.

उधर दादू की बहू प्रोफेसर भारती एस कुमार जो पटना विश्वविद्यालय में इतिहास पढाती थी, उन्होंने भी अपने घर में बने इस नए छात्र के लिए तैयारी कर ली है.

प्रोफ़ेसर भारती कहती है, “ हमारे रोमांच का तो पूछिए मत. घर में सब रोमांचित है. बस अब बाबूजी का ध्यान सीरियल्स से थोड़ा हटाना है और पढ़ाई पर लगवाना है.”

एमए के बाद क्या करने का इरादा है, ये पूछने पर दादू कहते है, “ दो साल बाद तो और बूढ़े हो जाएगें. जो पढ़ेगें उसी को मथते रहेंगें. हो सकता है कोई नई चीज हम दुनिया को दे जाएं.”

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