बंधन में जकड़ी आईआईटी इंजीनियरों की टोली

    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, मानपुर पटवा से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

बिहार के गया ज़िले की मानपुर पटवा टोली हाल के वर्षों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी की नर्सरी के रूप में सामने आई है.

यहां के युवकों की ज़बरदस्त कामयाबी के साथ मानपुर का पटवा समाज भी बदल रहा है.

नब्बे के दशक की शुरुआत तक यहां बाल-विवाह का प्रचलन था. लेकिन अब हालात बदले हैं.

श्रीदुर्गाजी पटवा जातीय सुधार समिति के सभापति गोपाल पटवा दावा करते हैं, "जहां एक ओर बाल-विवाह पर पूरी तरह रोक लग गई है. वहीं अब लड़कियों की शिक्षा पर भी ज़्यादा तवज्जो दी जा रही है."

गया के मानपुर पटवा टोली से आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होने वाली पहली छात्रा दीपा कुमारी
इमेज कैप्शन, गया के मानपुर पटवा टोली से आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होने वाली पहली छात्रा दीपा कुमारी

दीपा कुमारी की सफलता गोपाल की बातों पर मुहर लगाने जैसी है.

<link type="page"><caption> डेढ़ सौ से अधिक आईआईटियन वाला गाँव</caption><url href="http://sauida.shop/hindi/india/2015/07/150705_bihar_village_iit_student_rns%22 platform="highweb"/></link> (पढ़ें)

दीपा इस चर्चित मोहल्ले से आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होने वाली पहली लड़की हैं.

विवाह पर बंधन

लेकिन अब भी ये समाज शादी को लेकर एक ख़ास नियम के बंधन में जकड़ा है.

जो इस नियम को नहीं मानते वे समाज से बाहर कर दिए जाते हैं.

दरअसल, यहां अब भी पटवा समाज से बाहर शादी करने वालों को समाज से बाहर किए जाने का चलन है.

और 'पटवा समाज' का मतबल है सिर्फ मानपुर पटवा टोली और आसपास के कुछ मोहल्ले में रहने वाले पटवा जाति के लोग.

श्रीदुर्गाजी पटवा जातीय सुधार समिति के सचिव युवराज प्रसाद पटवा बताते हैं, "हाल के चार-पांच सालों में यहां के करीब सात परिवारों को 'जाति' से बाहर शादी करने के कारण समाज से बाहर किया गया है."

'समाज से बाहर' किए जाने का मतलब बताते हुए वे कहते हैं, "समाज से बाहर शादी करने वाले परिवारों के साथ खाना-पीना और आवागमन बंद कर दिया जाता है. और बात आगे बढ़ी तो उनके साथ व्यापारिक संबंध भी तोड़ लिए जाते हैं."

एक की 'समाज-वापसी'

मानपुर पटवा टोली के निवासी

हाल के सालों में जिन परिवारों को समाज से बाहर किया गया है उनमें से सिर्फ एक परिवार की ही समाज में वापसी हो पाई है.

इंजीनियरों की सफल उड़ान शुरू होने के वर्षों पहले सीताराम प्रसाद पटवा टोली से सबसे पहले डॉक्टर बने थे.

लेकिन समाज के इस सफल बेटे को भी अपने बेटे के कारण 'समाज से बाहर' होना पड़ा था.

मानपुर से बाहर बेटे की शादी करने की वजह से उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया. काफी कोशिशों के बाद वे अपने समाज में वापस शामिल हो पाए हैं.

और अब इस घटना पर सीताराम प्रसाद किसी तरह की बातचीत करने को तैयार नहीं होते.

राय अलग-अलग

मानपुर पटवा टोली की एक दुकान

पटवा टोली के आकाश कुमार एनआईटी, इलाहाबाद में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं.

वे इस परंपरा पर कहते हैं, "मन में आता है कि अपनी ही जाति के बीच शादी का बंधन क्यों है? जब हर जगह इंटरकास्ट मैरिज की इजाजत है तो हमारे यहां ही ऐसा क्यों है?"

वे कहते हैं कि इस बंधन के कारण वे अपने कॉलेज में भी लड़कियों से खुल कर बात नहीं कर पाते हैं.

लेकिन आकाश के हमउम्र और आईआईटी, बीएचयू के छात्र सुशीष कुमार की राय आकाश से अलग है.

उनका कहना हैं, "मुझे यह ठीक लगता है. यहां जो शादियां तय होती है उनमें दोनों परिवार एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं. लड़के-लड़की की सोच एक होती है."

सुशीष के मुताबिक ऐसी शादियों के बाद ज़िंदगी में परेशानियां कम आती हैं.

'बदलाव होगा'

पीताम्बर कुमार
इमेज कैप्शन, गया की पटवा टोली से 27 साल बाद यूपीएससी की परीक्षा में सफल हुए पीताम्बर कुमार अपने पिता के साथ

पीतांबर कुमार पटवा टोली से 27 वर्षों बाद इस साल यूपीएससी की मुख्य परीक्षा में सफल हुए हैं.

वे इस चलन पर कहते हैं, "आने वाले वर्षों में यहां एक नया पटवा समाज होगा. बहुत मुमकिन है कि आने वाली पीढ़ियों की सोच ऐसी न हो, क्योंकि उनकी परवरिश बिल्कुल अलग माहौल में होगी."

पीतांबर के मुताबिक नई पीढ़ी बदलाव भी लाएगी और बदलावों को स्वीकार भी करेगी.

वहीं जातीय सुधार समिति के सचिव युवराज प्रसाद पटवा मौजूदा परंपरा में थोड़ी छूट के हिमायती हैं.

वे कहते हैं, "अगर भारत में कहीं भी रहने वाले पटवा जाति के लोग बिना दहेज के हमारे यहां शादी करने को तैयार हों तो इसकी इजाजत दी जानी चाहिए."

हालांकि वे यह बताना नहीं भूलते कि यह उनकी निजी राय है.

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