'सुषमा ललित की ही मदद क्यों करना चाहती थीं?'

सुषमा स्वराज, भारत की विदेश मंत्री
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भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को ट्रैवेल डाक्यूमेंट दिलाने में मदद की थी.

ललित मोदी भारत में वित्तीय अनियमितता के आरोप झेल रहे हैं. जब से उनके ख़िलाफ़ आरोप लगे हैं, वो ब्रिटेन से भारत नहीं लौटे हैं. वो ख़ुद पर लगे आरोपों का खंडन करते रहे हैं.

सुषमा स्वराज और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने सफ़ाई में कहा है कि मानवीय आधार पर ललित मोदी की मदद की गई. लेकिन विपक्षी दल सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.

इसी मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह से बात की बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन ने.

पढ़ें बातचीत के ख़ास अंश

ललित मोदी, आईपीएल के पूर्व कमिश्नर

ये मामला सुषमा स्वराज के लिए कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है?

मेरा मानना है कि ये उनके लिए बड़ी मुसीबत है. लेकिन जिस तरह की राजनीति में आजकल चल रही है, जब भी किसी नेता या मंत्री पर आरोप लगता है तो पहली प्रतिक्रिया होती है कि हमारा नेता या मंत्री बेकसूर है. वही इस मामले में भी हो रहा है.

देश की लोकसभा में विपक्ष की नेता रहीं, और अब देश की विदेश मंत्री क़ानून से भागे हुए एक व्यक्ति के संपर्क में क्यों थीं? ये सवाल उनसे ज़रूर पूछा जाना चाहिए.

ये जुलाई, 2014 का मामला है. जिस व्यक्ति को देश का क़ानून, इनफोर्समेंट डायरेक्टर खोज रहा है, जिसके बारे में लुक आउट नोटिस है, जिसका पासपोर्ट एक बार रद्द किया जा चुका है (अदालत ने बाद में उसे लौटाने का आदेश दिया) ऐसे व्यक्ति से देश की विदेश मंत्री संपर्क में क्यों थीं? उसकी मदद क्यों कर रही थीं?

सवाल उठता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?

सुषमा स्वराज और भाजपा कह रहे हैं कि मानवीय आधार पर मदद की गई?

मानवीय आधार का तर्क बहुत लचर तर्क है. ये चलने वाला नहीं. ऐसा कोई आधार नहीं था.

ललित मोदी की पत्नी का ऑपरेशन होना था. वो पुर्तगाल में कैंसर की मरीज़ हैं. ललित मोदी ने बहाना किया था कि उनको डेक्लरेशन पर हस्ताक्षर करने थे. क़ानूनी आधार पर ऐसे किसी डेक्लरेशन की ज़रूरत नहीं होती.

अगर मानवीय आधार पर मदद करनी भी थी तो इसे सरकारी तौर पर करना चाहिए था. वो अपील करते, सरकार उस पर फ़ैसला करती. सरकार को देश को बताना चाहिए था कि एक ऐसा मामला आया है और हम मानवीय आधार पर उनकी मदद करना चाहते हैं.

लेकिन ब्रितानी हाई कमिश्नर से बात करना, वहाँ के एक सांसद से बात करना, और उसके बाद चिट्ठी लिखना, इससे पता चलता है कि वो जितना मदद पाने के इच्छुक थे उससे ज़्यादा इच्छुक सुषमा स्वराज मदद करने के लिए थीं.

ओटिवियो क्वात्रोची
इमेज कैप्शन, इतालवी कारोबारी ओटिवियो क्वात्रोची

इस मामले की तुलना क्वात्रोची मामले में की गई कथित मदद से हो रही है.

इसकी तुलना क्वात्रोची मामले से नहीं की जा सकती क्योंकि ललित मोदी को कहीं से भगाया नहीं गया है. लेकिन ये सवाल उससे बड़ा है.

अगर ये मामला ललित मोदी पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगने और जाँच शुरू होने से पहले का होता तो बात अलग थी.

लेकिन आपको पता है कि आपके देश की ही सरकार ने ब्रितानी सरकार को लिखकर दिया है कि इस व्यक्ति को ब्रिटेन से बाहर न जाने दिया जाए, अगर फिर भी ब्रितानी सरकार ऐसा करती है तो दोनों देशों के संबंध बिगड़ सकते हैं...तो ऐसे में आपको बताना पड़ेगा कि इसके पीछे क्या कारण हैं.

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