बहादुरशाह ज़फ़र से नेताजी का नाता

नेताजी सुभाष चंद्र बोस
    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, आजमगढ़ से
  • प्रकाशित

मुबारकपुर, आज़मगढ़ के पास के गाँव ढकुआ में रहने वाले 'कर्नल' निज़ामुद्दीन ने सुभाष चंद्र बोस के साथ बिताए दिनों की याद ताज़ा कीं.

पिछली स्टोरी में आपने पढ़ा था निज़ामुद्दीन के मुताबिक़, कब और कैसे मिले वे सुभाष बोस से और उसके बाद उनके ड्राइवर बन गए.

<link type="page"><caption> पढ़ेंः नेताजी को कौन मारना चाहता था?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/05/150529_colonel_nizamuddin_claim_ra.shtml" platform="highweb"/></link>

आपने निज़ामुद्दीन के उस दावे को भी पढ़ा था, जिसमें उन्होंने नेताजी को ओर जा रहीं तीन गोलियों को अपनी पीठ पर ले लिया था.

बीबीसी से बातचीत में निज़ामुद्दीन ने ये भी बताया कि वे नेताजी बोस के साथ यूरोप और एशिया के देशों में गए थे.

बमबारी

कर्नल निज़ामुद्दीन

उन्होंने कहा, "बर्मा में नेताजी की बहुत इज़्ज़त थी. आज़ाद हिन्द फ़ौज का अपना रेडियो स्टेशन था, अपना बैंक था और हमारे अपने नोट भी छपते थे."

लेकिन 104 वर्ष की उम्र में भी निज़ामुद्दीन उस बात को याद करके भावुक हो उठते हैं, जिसके अनुसार नेताजी बोस को जंगलों में जगहें बदल-बदल कर रातें गुज़ारनी पड़ती थीं.

<link type="page"><caption> सुभाष चंद्र बोस की हत्या हुई या मृत्यु?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150418_subhash_chandra_bose_controversy_vr.shtml" platform="highweb"/></link>

उन्होंने बताया, "हवाई बमबारी का ख़तरा हमेशा रहता था, इसलिए सुभाष चंद्र बोस हर रात बर्मा के जंगलों में कम से कम दो जगह बदलते थे. मैं ख़ुद उनको रात में उठाता था, ये कहते हुए कि उठिए अंडा (बम) गिर सकता है. इसलिए हमें निकलना चाहिए."

निज़ामुद्दीन के अनुसार, सुभाष हर बार नींद से उठाए जाने पर जवाब देते थे, "नींद से अच्छी तो मौत है."

निज़ामुद्दीन के मुताबिक़, नेताजी बोस अपने सहयोगियों को लेकर इतने मिलनसार थे कि अक्सर उनके जूठे गिलास में भी पानी पी लिया करते थे.

बहादुरशाह ज़फर

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

'कर्नल' निज़ामुद्दीन 1940 के दशक की याद करते हुए बताते हैं कि, "उन दिनों ऐसा ही लगता था कि भारत को आज़ाद हिंद फ़ौज ही आज़ादी दिलाएगी."

उन्होंने बताया कि सुभाष बोस ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने आख़िरी मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फर की क़ब्र को पूरी इज़्ज़त दिलवाई.

वो बताते हैं, "ज़फर की कब्र को नेताजी बोस ने ही पक्का करवाया था. वहाँ कब्रिस्तान में गेट लगवाया और उनकी क़ब्र के सामने चारदीवारी बनवाई थी. मैं ख़ुद नेताजी के साथ कई मर्तबा ज़फर की मज़ार पर गया हूँ."

निज़ामुद्दीन के अनुसार, उन्होंने अपनी सौ वर्ष से भी ज़्यादा की उम्र में सुभाषचंद्र बोस जैसा दिलदार आदमी नहीं देखा.

विमान हादसा

गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस

इतिहास के मुताबिक़, सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु अगस्त, 1945 में फॉरमोसा, ताइवान में एक विमान हादसे हुई थी.

हालांकि 'कर्नल' निज़ामुद्दीन इस बात का खंडन करते हैं.

उन्होंने बताया, "जापान ने नेताजी को तीन हवाई जहाज़ दिए थे. जब मैंने उन्हें सितांग नदी के किनारे वर्ष 1947 में आख़िरी बार छोड़ा तब वो जापानी अफसरों के साथ मोटरबोट पर बैठने के पहले भावुक हो गए थे. मैंने कहा, मुझे भी अपने साथ ले चलिए, लेकिन उन्होंने कहा कि, तुम यहीं रुको जिससे दूसरों का ख़्याल रखा जा सके."

वैसे नेताजी बोस की मृत्यु से जुड़ी जानकारी जुटाने वाले और 'इंडियाज़ बिगेस्ट कवरअप' नामक किताब लिखने वाले अनुज धर का भी मानना है कि सुभाष चंद्र बोस उस विमान में थे ही नहीं जिसका हादसा हुआ था.

लेकिन अनुज धर निज़ामुद्दीन के उन दावों को ख़ारिज करते हैं, जिनमें कहा गया है कि नेताजी 1945 से लेकर 1947 तक बर्मा में थे.

दावों पर सवाल

नेताजी क़िताब
इमेज कैप्शन, सुभाष बोस की रहस्यमई मृत्यु पर लेखक अनुज धर की किताब ने कई सवाल खड़े किए हैं.

उन्होंने कहा, "जितने दस्तावेज़ मिले हैं उनके हिसाब से नेताजी इस दौरान रूस में थे. रही बात निज़ामुद्दीन की तो उन्हें कम से कम एक फ़ोटो या कोई प्रमाण तो दिखाना चाहिए अपने और नेताजी के दिनों का."

अब सच्चाई क्या है इसे पता लगाने में अनुज धर जैसे तमाम लोग लगे हैं.

कुछ दिन पहले ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पोती आजमगढ़ में निज़ामुद्दीन से मिलकर लौटीं हैं.

वहीँ पिछले वर्ष नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से अपने चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बाद निज़ामुद्दीन का एक भरी जनसभा में झुक कर पैर छुआ था.

(अगले भाग में निज़ामुद्दीन का वो अंश जिसमे वे नेताजी के हिटलर की मुलाक़ात को याद करते हैं)

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